भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ। इससे सिद्ध होता है कि जिस समय भगवान् अपने भक्तके हृदयमें रमण करनेकी इच्छा करते हैं, तभी यह भजनानन्दचन्द्र उदित हो जाता है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ?—'चर्षणीनां गतिभक्षण- शीलानां कर्मतत्फलव्यासक्तमनसां जनानां शुचः आर्त्तीः स्वात्मभूतपरप्रेमास्पदभगवद्विप्रयोगवेदनाः ताः मृजन्।' अर्थात् यह चर्षणी यानी कर्म और कर्मफलभोगमें आसक्त-चित्त पुरुषोंके शोक—अपने आत्मभूत परप्रेमास्पद भगवान्के वियोगसे होनेवाली वेदनाका मार्जन करता हुआ उदित हुआ अथवा कर्म और कर्म-फल-भोगजनित श्रान्ति ही आर्ति है या जितनी भी वेदनाएँ सम्भव हैं, वे सभी आर्ति हैं, उन सभीका मार्जन करते हुए भगवान् उदित हुए। यहाँ 'शुचः' में बहुवचन है; इसलिये यह शोकोपलक्षित समस्त संसारका भी उपलक्षण है। किसके द्वारा शोकमार्जन करता हुआ उदित हुआ ?—'शन्तमैः करैः—स्वयं शन्तमाः परमसुखरूपाः अन्येषु कराः कं सुखं रान्ति समर्पयन्तीति कराः तैः भगवदीयगुण- गणगानतानवितानादिभिः।' शन्तम करोंसे अर्थात् जो स्वयं परम सुखरूप हैं और दूसरोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं; उन भगवद्- गुणगानादिसे भक्तोंका शोक निवृत्त करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार यह भजनानन्दरूप चन्द्रका उदय समस्त शोकोंकी निवृत्ति करनेवाला है; क्योंकि जिस समय जीव भगवद्भजनमें प्रवृत्त होता है, उसी समय उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई ॥ (रा०च०मा० १।३५।८) यह मनरूप मत्तगजेन्द्र संसारानलमें जल रहा है; जिस समय यह भगवद्भजनमें लगता है, उसी समय मानो शीतल गंगाजलमें अवगाहन करने लगता है। अब यह विचार करना चाहिये कि ये जो भजनानन्दचन्द्र, भक्तिरूपा प्रभा और गुणगानवितानादि- रूप शन्तम कर हैं, इनमें भेद क्या है? क्योंकि बिना भेदके कोई व्यवहार नहीं हो सकता। वस्तुतः भगवद्भक्तिरूपा प्रभा और भगवदीय गुणगणगानतानादि भजनानन्दचन्द्रके अन्तर्गत ही हैं। इनका भेद 'राहोः शिरः' के समान केवल व्यवहारके लिये है। यद्यपि राहुका सिर राहुसे कोई पृथक् पदार्थ हो ऐसी बात नहीं है तथापि लोकमें इसका इस प्रकार सम्बन्ध- ग्रहणपूर्वक व्यवहार अवश्य होता है। जैसे 'देवदत्त हाथोंसे वृक्ष काटता है' इस वाक्यमें 'देवदत्त' कर्ता है और 'हाथ' करण हैं। इसलिये इन दोनोंमें भेद होना चाहिये। परंतु वस्तुतः देवदत्त क्या है? वह हाथ, पाँव, सिर आदिका संघात ही तो है। वह अवयवी है और हाथ-पाँव आदि उसके अवयव हैं। नैयायिकोंके मतानुसार अवयव कारण होता है और अवयवी उसका कार्य होता है। लोकमें कार्य अपने कारणके द्वारा ही सारे व्यापार किया करता है। इसलिये अवयवीमें मुख्यताका व्यपदेश होता है और अवयवमें गौणताका। इसी प्रकार भक्तिरूपा प्रभा और भगवद्गुणगानरूप किरणें अवयव हैं तथा भजनानन्दचन्द्र अवयवी है। अतः भजनान्द कार्य है और भक्ति तथा भगवद्गुणगानादि उसके कारण हैं। यह भजनानन्दचन्द्र हृदयारण्यको सुशोभित भी करता है; क्योंकि जहाँ चन्द्रालोकका विस्तार नहीं होता, वह स्थल रमणके योग्य भी नहीं होता। इसी प्रकार जिस हृदयमें भजनानन्दचन्द्रकी भक्तिरूपा प्रभाका विस्तार नहीं हुआ है, वह भगवान्का रमण-स्थल होनेयोग्य भी नहीं है तथा वह भजनानन्दचन्द्र और क्या करते हुए उदित हुआ ?—'प्राच्याः—प्राचि भवा प्राची तस्याः बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं प्रधानं भागं अरुणेन कुङ्कुमेनेव रागेण विलिम्पन्।' अर्थात् वह प्राची यानी अपनेसे पूर्व उत्पन्न हुई बुद्धिके सत्त्वमय प्रधान भागको, अरुण कुंकुमद्वारा मुखलेपनके समान अनुरक्त करता हुआ उदित हुआ। यही भजनानन्दचन्द्रका कार्य है। जिस प्रकार अग्निसे पिघले हुए लाखमें रंग भर देनेपर वह उसी रंगका हो जाता है, उसी प्रकार यह बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको