भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २५१

सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥ (रा०च०मा० ४।१७।६) वे उदित किस प्रकार हुए ?—'प्राच्याः ककुभः मुखं करैर्धृतेन अरुणेन विलिम्पन्' अर्थात् अपनी शीतल और सुकोमल किरणोंमें धारण किये हुए अरुण रागसे पूर्व दिशाके मुखको लेपित करते हुए। मानो इस प्रकार नायक-नायिकाकी रीतिको प्रदर्शित करते हुए चन्द्रदेव यहाँ शृंगाररसके उद्दीपन बने हुए हैं। यद्यपि चन्द्रमाका सम्बन्ध सभी दिशाओंसे है तथापि उनमें पूर्वांदिक् ही प्रधान है। अतः पूर्व दिशाके साथ संश्लिष्ट होकर अपनी किरणोंमें धारण किये हुए अरुणसे उसका मुखलेपन करता हुआ और स्वयं भी अनुरक्त होता हुआ वह उदित हुआ अर्थात् प्राची दिशासे संश्लिष्ट होनेपर चन्द्रमाने उसे भी अनुरक्त किया और वह स्वयं भी अनुरंजित हुआ। इससे पूर्वांदिक्संसर्गसे उसका अनुराग होना स्वयं सिद्ध है, जैसे नायिकाके प्राप्त होते ही नायक अनुरक्त हो जाता है। इसका भी विशेषण है 'दीर्घदर्शनः' यह 'उडुराजः' और 'प्रियः' दोनोंहीका विशेषण हो सकता है। 'दीर्घं बहूनां रात्रीणामन्ते दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पश्चात् हुआ हो, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। पूर्व दिशाके साथ चन्द्रमाका ठीक-ठीक सम्बन्ध पूर्णिमाको ही होता है, इसलिये चन्द्रमा दीर्घदर्शन है। इधर दृष्टान्त पक्षमें यह प्रियका भी विशेषण है अर्थात् जिसका दर्शन बहुत कालके पश्चात् हुआ है—ऐसा कोई प्रियतम जिस प्रकार 'शान्तमैः करैः' अपने सुखावह कर-व्यापारोंसे प्रियतमाका शोक निवृत्त करता है, उसी प्रकार चन्द्रमा अपनी किरणोंसे पूर्व दिशाके मुखको रागरंजित करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार कर-व्यापारोंसे भी शृंगाररसका उद्दीपन ही सूचित होता है। इसे प्रकृत प्रसंगमें दूसरी तरह भी लगाते हैं— 'यथा उडुराजः चर्षणीनां शुचो मृजन् शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन च प्राच्या ककुभः मुखं विलिम्पन् उद्गातथा दीर्घदर्शनः प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्याः मुखं शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन च विलिम्पन् चर्षणीनां गोपीजनानां शुचः शोकाश्रूणि मृजन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा मनुष्योंका शोकापनोदन करता हुआ तथा अपनी शीतल किरणोंसे उनमें धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाका मुख लेपन करता हुआ उदित हुआ, उसी प्रकार बहुत कालके बाद दिखायी देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुसुताके मुखारविन्दको अपने करकमलोंमें धारण किये हुए कुंकुमसे लेपनकर गोपीजनोंके शोकाश्रुओँका मार्जन करते हुए प्रकट हुए। यहाँ 'चर गतिभक्षणयोः' इस धातुपाठके अनुसार 'चर्षणीनाम्' इस पदका अर्थ गति और भक्षणपरायण है। 'गति' शब्दसे कर्म और 'भक्षण' शब्दसे कर्मफल समझना चाहिये। अतः इससे वे मनुष्य* विवक्षित हैं, जो केवल कर्म और कर्मफलमें ही आसक्त हैं। इन संसारी लोगोंके सर्वविध तापका निराकरण करता हुआ उडुराज—चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि वह उदित होकर उद्दीपन-विभाव-रूपसे परमानन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रके चित्तमें रमणकी इच्छा उत्पन्न करेगा, जो कि श्रीकृष्ण-प्रेमियोंको बहुत कालसे अभिलषित है। अतः भगवान्‌की प्रेयसी व्रजांगनाओंके शोकका मार्जन होनेसे सारे संसारका शोक मार्जित हो जायगा; क्योंकि यह नियम है कि जिस क्रियासे भगवद्भक्तोंका शोक निवृत्त होता है, उससे सारे संसारका ही शोक निवृत्त हो जाता है और जिससे भगवद्भक्त सन्तप्त होते हैं, उससे सभीको


  • 'चर्षणी' शब्द मनुष्य अर्थमें रूढ़ है। यह बात निम्नलिखित श्लोकसे सिद्ध होती है— अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणीयः सुताः। यत्र वै मानुषी जातिर्ब्राह्मणा चोपकल्पिता ॥ (श्रीमद्भा० ६।६।४२) अर्यमाकी पत्नी मातृका नामवाली थी। उसके 'चर्षणी' संज्ञक पुत्र हुए। उन चर्षणीयोंमें ही ब्रह्माजीने मानुषी जातिकी कल्पना की।