भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ भक्तिसुधा सन्ताप होता है। देखो, जिस समय ध्रुवजीने भगवत्तादात्म्यको प्राप्त होकर श्वासनिरोध किया था, उस समय सारे संसारका ही श्वास निरुद्ध हो गया था। ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि भगवान् सर्वात्मा हैं; अतः यदि भगवद्भक्त सन्तप्त होता है तो सारा संसार ही सन्तप्त हो उठता है। ये गोपांगनाएँ तो भगवान्की अत्यन्त अन्तरंग हैं। ये भगवद्विप्रयोगके कारण चिरकालसे सन्तप्त थीं। अब उस विरहव्यथाका अन्त होनेवाला था। इसीसे भगवान्को रमणकी इच्छा हुई। अतः इसका यह भी अर्थ हो सकता है— 'चर्षणीनां व्रजाङ्गनाजनानां शोकापनोदेन चर्षणीनां गतिभक्षणपराणां कर्म तत्फलभोग- परिनिष्ठानां जगतामेव शुचो मृजन् उद्गात्।' अर्थात् चर्षणी यानी व्रजांगनाओंकी शोकनिवृत्ति करके चर्षणी-कर्म और कर्म-फल-भोगमें लगे हुए संसारी लोगोंका शोक निवृत्त करते हुए चन्द्रदेव प्रकट हुए। इसीसे उन्हें उडुराज अर्थात् नक्षत्रमण्डलका राजा कहा है। वे परम सौभाग्यशाली और अत्यन्त पुण्यात्मा हैं; क्योंकि उनके कारण गोपांगनाओंकी शोकनिवृत्ति होनेसे सारे संसारका ही सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः ये उडुराज 'उडुषु राजत इति उडुराजः' हैं अर्थात् नक्षत्रोंमें अत्यन्त शोभायमान हैं। इधर जिस प्रकार जीवोंकी शोकनिवृत्ति करनेके कारण यह उडुराज पुण्यात्मा है, उसी प्रकार मानो श्रीकृष्णचन्द्र भी उडुराज ही हैं; क्योंकि उन्होंने भी चर्षणी यानी व्रजांगनाओंका शोकापनोदन करके सारे संसारका ही शोक निवृत्त किया है। अतः 'उडुराज' शब्दसे उनका भी अन्वादेश होता है। जैसे इस ओर ताराओंमें अत्यन्त देदीप्यमान चन्द्रमा है, उसी प्रकार उधर गोपांगनाओंमें नायक-रूपसे अत्यन्त देदीप्यमान भगवान् श्रीकृष्ण हैं। इसीसे आचार्योंने यह भी कल्पना की है कि जिस समय भगवान्ने 'अमना' और 'अप्राण' होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर गोपांगनाओंके साथ रमण करनेका संकल्प किया, उस समय उनमें मन तो था नहीं। मनका अधिष्ठाता चन्द्रमा है। जिस प्रकार सूर्य आदि अधिष्ठातादेवताओंसे अधिष्ठित हुए बिना नेत्रादिमें रूपादिके प्रकाशनका सामर्थ्य नहीं होता, उसी प्रकार मन भी चन्द्रमासे अधिष्ठित हुए बिना संकल्पमें समर्थ नहीं हो सकता था। किंतु यहाँ भगवान्के तो मन ही नहीं था; अतः वे मनके बिना रमण कैसे करते ? यद्यपि अपने दिव्य ऐश्वर्यसे वे बिना मनके भी रमण कर सकते थे तथापि लोकमर्यादाका अतिलंघन न करके भगवान्ने नवीन अप्राकृत मनका निर्माण किया; क्योंकि वस्तुकी सरसता अथवा नीरसताका आस्वादन तो मनसे ही होता है। भगवान्का मन अप्राकृत था, इसलिये उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा भी अप्राकृत ही होना चाहिये था। जिस प्रकार चन्द्रमा ताराओंके सहित शोभायमान होता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंके मन उडुस्थानीय हैं और भगवान्का मन उन उडुओंका अधिनायक चन्द्रमा है। अतः जिस प्रकार नक्षत्रोंसे चन्द्रमाकी शोभा है, उसी प्रकार गोपांगनाओंके मनोंसे भगवान्के मनकी शोभा है। यहाँ यह शंका होती है कि इस अप्राकृत चन्द्रमाकी वस्तुतः आवश्यकता क्या थी ? यदि भगवान्के रचे हुए नवीन अप्राकृत मनका नियमन करनेके लिये इसकी आवश्यकता मानी जाय तो ठीक नहीं; क्योंकि भगवान् तो सर्वशक्तिमान् हैं, वे स्वयं ही उस मनको कार्यसम्पादनकी योग्यता प्रदान कर सकते थे। यदि कहें कि व्रजांगनाओंके मनोंके अधिष्ठाता जो प्राकृत चन्द्रमा हैं, वे नक्षत्रोंके रूपमें उदित हैं, उनकी रक्षा करनेके लिये ही भगवान्के अप्राकृत मनके अधिष्ठाता अप्राकृत चन्द्रमाका उदय हुआ है तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि उनका नियमन भी भगवान् स्वयं ही कर सकते थे। यदि उद्दीपनके लिये इसका उदय माना जाय तो भगवान्को इसके लिये भी किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है और यदि अन्धकारकी निवृत्तिके लिये इसका उदय मानें तो यह काम भी प्राकृत चन्द्रमासे ही निष्पन्न हो सकता था;