भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० भक्तिसुधा अपनेसे भिन्न किसी पदार्थको देखकर उसकी आसक्तिवश रमणकी इच्छा कर सकता है। इसीसे 'योगमायामुपाश्रितः' ऐसा कहा है। योगमाया अर्थात् अघटित घटनाके लिये जो माया है—उस योगमायाका सन्निधिमात्रसे आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। तात्पर्य है कि इस योगमायाके प्रभावसे ही उस स्वप्रकाश, असंग एवं अद्वय ब्रह्मकी अपनेसे भिन्न प्रतीत होनेवाली गोपांगनाओंके साथ रमण करनेमें प्रवृत्ति हो गयी। यही उस मायाकी अघटितघटनाशक्ति है। यह वही माया है, जिसके विषयमें श्रुति कहती है— ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरो० १।३) अर्थात् अपने गुणोंसे आच्छादित जिस भगवच्छक्तिका ऋषियोंने ध्यानयोगसे साक्षात्कार किया था, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत तथा कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी कारणभूता उस अचिन्त्यानन्त मायाशक्तिसे ही भगवान्का अपनेसे भिन्न किसीको देखना, अपनेसे भिन्नकी इच्छा करना और अपनेसे भिन्नके साथ रमण करना सम्भव है? तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान् स्वयंप्रकाश, कूटस्थ और अद्वय होनेके कारण अपनेसे भिन्न किसी औरको नहीं देख सकते तथापि अपनी इस लीला-शक्तिसे उन्होंने अपनेसे भिन्न रूपसे प्रादुर्भूत जो अपनी ही स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ हैं, उन्हें देखकर रमण करनेकी इच्छा की। यह जितना भी अघटनघटन है, उसके सम्पादनमें भगवान्की माया समर्थ है। इसीसे इन समस्त विरोधोंका निराकरण हो जाता है। इसी प्रकार सगुणपक्षमें भी समझना चाहिये। वहाँ भी भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् एवं सम्पूर्ण वैराग्य और ऐश्वर्यसम्पन्न होनेपर भी इस योगमाया अर्थात् योग-सम्प्रयोगके लिये जो माया—कृपा है, उसका आश्रय लेकर ही वररूपसे दी हुई उन रात्रियोंको देखकर भक्तानुग्रह- परवश हुए उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेकी इच्छाको स्वीकार करते हैं। अतः यहाँ भी उनकी रमणेच्छामें योगमाया ही प्रधान कारण है। रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या इस प्रकार जिस समय भगवान्ने उन शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और गोपांगनाओंको देखकर रमणकी इच्छा की— तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः। स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन् प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२) अन्वय—'तदा चर्षणीनां शुचो मृजन् दीर्घदर्शनः प्रियः प्रियाया इव करैर्धृतेन अरुणेन प्राच्याः ककुभः मुखं विलिम्पन् उडुराजः उदगात्।' भावार्थ—उसी समय लोगोंके शोकका मार्जन करता हुआ तथा जिस प्रकार दीर्घकालमें मिलनेवाला प्रियतम अपनी प्रियतमाके शोककी निवृत्ति करता है, उसी प्रकार अपने शीतल करों (किरणों या हाथों)-में धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाके मुखका लेपन करता हुआ चन्द्रमा उदित हुआ। 'तदा' अर्थात् जिस क्षणमें भगवान्को रमणकी इच्छा हुई, उसी समय चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि सेवककी यह रीति है कि जिस समय स्वामीकी इच्छा हो, उसी समय सेवामें उपस्थित हो जाय। ये उडुराज क्यों उदित हुए? क्योंकि ये उद्दीपन विभाव हैं अर्थात् भगवान्की जो रमणेच्छा है, उसे और भी उद्दीप्त करनेके लिये ही इनका प्राकट्य हुआ है। 'उडुराज' शब्दका अर्थ है 'उडूनां तारकाणां राजा' अर्थात् तारोंका राजा। इससे उस समय चन्द्रदेवका सपरिवार उदित होना ध्वनित होता है। उनके अभ्युदयसे ही चर्षणी—जो समस्त प्राणी उनके शरत्कालीन सूर्यसे प्राप्त हुए तापसे तप्त थे, उनकी मनोग्लानि शान्त हो गयी। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं—