भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २४९ आप क्या देंगे? उनके तो आप ऋणी ही रहेंगे। अहो! जिन व्रजबालकोंका उच्च स्वरसे किया हुआ हरिगुण-गान तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है, उनके चरणकमलोंकी वन्दना हम बारम्बार करते हैं। इस लोकमें वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने इस गोकुलमें किसी वनवीथिकाके पास तृण-गुल्मादिरूपसे जन्म लिया है; क्योंकि उन्हें उन कृष्णप्राणा गोप- वधूटियोंके पद-पद्मपरागसे अभिषिक्त होनेका सुअवसर प्राप्त होता है।* इससे यहाँ यही कहना है कि भगवान् अनेकोंको स्वात्मसमर्पण करके भी पूर्णरूपसे ही अवशिष्ट रहते हैं। अतः भगवान्‌की यह योगमाया शक्ति ही है, जिससे वे सदा सब कुछ करते हुए भी अक्षुण्ण ही रहते हैं। उन्होंने रमणकी इच्छा कैसे की? इसपर कहते हैं—'ताः कात्यायन्यर्चनव्रतसन्तुष्टेन भगवता वरत्वेन प्रदत्ताः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः रात्रीः वीक्ष्य।' अर्थात् कात्यायनी-पूजन एवं व्रतादिसे सन्तुष्ट हुए श्रीभगवान्‌ने जिन्हें वररूपसे दिया था, उन शरदोत्फुल्लमल्लिका रात्रियोंको देखकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। उन रात्रियोंको ग्रहणकर और उनमें आधिदैविकी रात्रियोंका निवेशकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। ऐसा करके उन्होंने उन रात्रियोंको पूर्ण बना दिया; क्योंकि आधिदैविकी रात्रियाँ भगवद्रूपा हैं। इस प्रकार उन सबको पूर्णिमारूप बनाकर और ऋतुको भी शरद्-ऋतुमें ही परिणत कर दिया अर्थात् समस्त रात्रियोंमें ऋतु-परिवर्तनका क्रम न रखकर केवल एक ही ऋतु रखा और उनमें मल्लिकादि समस्त पुष्प विकसित कर दिये। इस प्रकार उन रात्रियोंको समस्त उद्दीपन-सामग्रियोंसे सम्पन्नकर मुरली- ध्वनिद्वारा गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यदि विचार किया जाय तो स्वरूपतः अशेष- विशेष-शून्य पूर्ण परब्रह्म एवं अचिन्त्यानन्द निखिल- गुणगणास्पद श्रीभगवान् ये एक ही हैं; क्योंकि सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य एक स्वप्रकाशतत्त्व ही 'भगवत्' शब्दका लक्ष्य है। जैसा कि कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) अर्थात् जो अद्वय ज्ञानस्वरूप तत्त्व है; तत्त्वज्ञ लोग उसीको तत्त्व समझते हैं। वह 'ब्रह्म', 'परमात्मा' या 'भगवान्' ऐसा कहा जाता है। अतः अद्वितीय परब्रह्म ही भगवान् है। जिस प्रकार 'गच्छतीति गौः' इस व्युत्पत्तिसे 'गमेर्डोः' आदि सूत्रोंके अनुसार सिद्ध हुआ 'गो' शब्द केवल गमन करनेवालेका ही वाचक नहीं होता; क्योंकि गमन करनेवाले तो सभी पशु हैं, बल्कि गल-कम्बलादियुक्त 'गो' का ही वाचक होता है, उसी प्रकार यह अद्वय पदार्थ ही भगवत्-पदवाच्य है। किंतु इसका यौगिक अर्थ लेनेपर तो भगोपलक्षित अचिन्त्यानन्तगुणगणास्पद परमेश्वर ही 'भगवत्' शब्दका अर्थ है। इससे यही सिद्ध हुआ कि परमार्थतः जो एक अद्वयतत्त्व सर्वभेदरहित और स्वप्रकाश है, वही अपनी अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय लीलाशक्तिसे निखिल ब्रह्माण्डका अधीश्वर भी है। उस भगवान्‌ने ही रमणकी इच्छा की। यहाँ दोनों प्रकारसे विरोध प्रतीत होता है। यदि उसके निर्विशेषरूपपर विचार करते हैं तो 'असङ्गो न हि सज्यते' (बृहदारण्यक० ३।९।२६) इस श्रुतिके अनुसार उसका रमण होना असम्भव है। जो स्वप्रकाश, असंग और अद्वय है—वह किसको देखकर, किसलिये, किसके साथ, कैसे रमण करेगा? और यदि भगवान्‌के सविशेषस्वरूपपर ध्यान देते हैं तो वे भी सब प्रकारके ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यसे पूर्ण तथा अचिन्त्यानन्दरूप अपने ऐश्वर्यमें सन्तुष्ट रहनेके कारण आप्तकाम एवं पूर्णकाम हैं। उन्हें किसीको देखकर रमणकी इच्छा कैसे हो सकती है? जो अनाप्तकाम होता है, वही

  • 'वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥' (श्रीमद्भा० १०।४७।६३) 'तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३४)