भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 260

२४८ भक्तिसुधा विभक्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दका स्वयं ही आस्वादन करते हैं। इसीसे भगवान् अपनी स्वरूपभूता व्रजांगनाओंमें रमणेच्छा उत्पन्न करके भी पहले स्वयं कुछ कालतक 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सर्वसंकल्पशून्य और निःस्पृह ही रहे। किंतु अब उन्होंने भी रमणकी इच्छा की। परंतु यह रमण कैसा है? यहाँ एक ही परमतत्त्वको अनेकों नायकों और नायिकाओंके रूपमें प्रकटकर अपने ही स्वरूपभूत आनन्दका रसास्वादन करना है। वास्तवमें 'भज सेवायाम्' या 'रमु क्रीडायाम्' के अनुसार एक प्रकार असाधारण भावसे तादात्म्यापत्ति अथवा जो स्वरूपभूत आनन्द है, उसको अपने अनन्य भक्तोंमें स्थापित करना ही यह भजनानन्दरूप रमण है। इससे आपातदृष्टिसे यह जान पड़ता है कि यदि उस कूटस्थ परमानन्द तत्त्वका अन्यत्र संक्रमण किया गया तो अपने स्वरूपसे च्युत होनेके कारण उसे अच्युत नहीं कहा जा सकता। इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये ही कहा है- 'भगवानपि' अर्थात् जो अप्रच्युत स्वभाव भगवान् अपने अचिन्त्यानन्त ऐश्वर्यके माहात्म्यसे अपने स्वरूपभूत परमानन्दका अन्यत्र संचार करके भी सदा अच्युत ही रहते हैं, उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। जिस प्रकार चिन्तामणि, कल्पतरु एवं कामधेनु आदि अपने समीपस्थ लोगोंको उनके संकल्पित पदार्थ देकर भी स्वयं अक्षुण्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार भक्तोंको प्रेम प्रदान करनेपर भी भगवत्स्वरूपमें कोई च्युति नहीं होती। किंतु यहाँ पुनः सन्देह होता है कि इस प्रकार स्वरूपानन्दका अन्यत्र संक्रमण होनेसे भगवत्स्वरूप भले ही अविकारी रहे तथापि वह स्वरूपानन्द तो अपने स्थानका त्याग करनेके कारण विकारी हो ही जायगा। वह कूटस्थ या अविकारी नहीं रह सकता। इसीसे कहा है- 'योगमायामुपाश्रितः'। भगवान्‌की योगमाया एक ऐसी शक्ति है, जो उस पदार्थको अन्यत्र ले जानेपर भी विकृत नहीं होने देती। इसीसे भगवान् अपने कूटस्थ परमानन्दको अन्यत्र दूसरोंमें संक्रमित करके भी स्वयं अविकृत ही रहते हैं और उनके उस आनन्दमें भी कोई विकार नहीं होता है। इसीसे यह देखा जाता है कि यद्यपि भगवान्ने अपने कई भक्तोंको स्वात्मसमर्पण किया है तो भी उनमें कोई च्युति नहीं हुई; वे ज्यों-के-त्यों अविकारी ही बने हुए हैं। श्रीब्रह्माजी कहते हैं— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति। सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् हे देव! आप इन घोष-निवासियोंको क्या देंगे? आप विश्वफलात्मा हैं; आपसे बढ़कर और दूसरी क्या वस्तु हो सकती है, जिसे देकर आप उनसे उऋण होंगे? प्राणी विविध प्रकारके ऐहिक- आमुष्मिक सुखको ही परम पुरुषार्थ समझता है, किंतु जिनके आँगनमें उस सुखका परमोद्गम स्थान साक्षात् परब्रह्म मूर्तिमान् होकर धूलिधूसरित हुआ खेल रहा है, उनके लिये वे क्षुद्र सौख्यकण कैसे फलरूप हो सकते हैं? जिन्हें जो वस्तु अप्राप्त होती है, वही उन्हें फलरूपसे स्वीकृत हुआ करती है। अतः जिन्हें आप आत्मीय-रूपसे अहर्निश प्राप्त हैं, उन्हें सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् होकर भी आप क्या दे सकते हैं? इसलिये इनके तो आपको ऋणी ही रहना पड़ेगा। इस विषयमें कुछ निश्चय न होनेके कारण मेरा चित्त मोहित हो रहा है। यदि कहें कि मैं अपनेको ही समर्पण कर दूँगा तो इसमें भी कोई महत्त्वकी बात न होगी; क्योंकि जो पूतना दम्भसे माताके समान आचरण दिखलाती हुई आपका अनिष्ट करनेके लिये स्तनोंमें विष लगाकर आयी थी, उसे भी उसके कुलसहित आपने अपने स्वरूपको ही प्राप्त करा दिया था; फिर जिनके धन, धाम, स्वजन, प्रिय, आत्मा, प्राण और चित्त आपहीपर निछावर हैं, उन व्रजवासियोंको