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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

२४० भक्तिसुधा ऐश्वर्यवत्त्व अर्थात् नियन्तृत्व देखता है और भगवान्— परम ऐश्वर्यवान् परमात्मामें उसके नियम्य और आधेयरूपसे समस्त भूतोंको देखता है, वही श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। इनमें जो उत्तमा भक्ति है, वह भी तीन प्रकारकी है। जहाँ भगवदाकाराकारित अन्तःकरणसे समस्त विद्यमान जगत्का भगवद्रूपसे ग्रहण किया जाय, वह प्रथम कोटिकी उत्तमा-भक्ति है। ऊपर जो उत्तमा- भक्तिका लक्षण बतलाया है, वह प्रथम कोटिकी ही है। दूसरी कोटिकी उत्तमा-भक्ति वह है, जहाँ भगवदाकाराकारित द्रुत अन्तःकरणसे प्रपंचमिथ्यात्व- निश्चयपूर्वक सबकी भगवद्रूपताका निश्चय किया जाय; जैसे कि कहा है— तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्। त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) और जहाँ प्रपंचके मिथ्यात्व और सत्यत्व दोनों ही भावोंसे रहित द्रुतचित्तसे केवल भगवान्‌का ही ग्रहण हो, वह तीसरी कोटिकी उत्तमा भक्ति है; जैसे— ध्यायतःचरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥ प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७-१८) इस प्रकार द्रुतचित्तकी भगवदाकारा मानसी वृत्तिको 'मा' कहते हैं; अयोगोंकी जो मा-प्रीति अर्थात् मति है, वही 'अयोगमा' है, उस अयोगमामें उपाश्रित हुए अर्थात् व्रजांगनाओंकी ऐसी प्रीतिमती बुद्धिसे आकर्षित हुए भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् अपने प्रति जो ऐसी प्रीतिमती बुद्धि है, उसके परतन्त्र हुए भगवान् उन गोपांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि भगवान् प्रेम-मधु-मधुकर हैं और जो प्रेम- मधु-आकर सुमनसोंके सुमनस हैं, उनके प्रति भगवान्‌का आकर्षण होना उचित ही है। उधर जिनका चित्त समस्त सुमनाओंके सुमनस श्रीभगवान्‌के प्रति आकर्षित होता है, वे सुमना कहे जाते हैं। श्रीभगवान्‌के प्रति आकर्षित होना ही उनका सुमनस्त्व है। अतः शोभन स्वभाववालोंका सिद्धान्त यही है कि भगवान्‌से प्रीति करें। वही वाक् सुन्दर है, जिसे भगवान्‌का गुणगान होता है, वे ही कर्णपुट धन्य हैं, जिनसे भगवत्कथाओंका श्रवण होता है और वे ही चरण धन्य हैं, जिनसे भगवद्धामोंमें गमन होता है। इसीसे अर्जुनसे भी भगवान्ने यही कहा है— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ (गीता १२।८; १८।६५) यह बात तो अमना भगवान्‌के विषयमें है। ये व्रजांगनाएँ तो सुमनसोंकी शिरोमणि हैं। अतः उनका जो मन है, वह तो प्रेमका आकर है ही। उनके प्रेमकणसे ही समस्त संसार प्रेममय हो रहा है। अतः इनके प्रेममधु-आकर मनका प्रेम-मधु-मधुप भगवान् समाश्रयण करेंगे ही। इसीसे भगवान्ने गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। अथवा 'योगमायामुपाश्रितः'—इस पदका यह तात्पर्य समझो—'अन्यत्र चञ्चलापि भगवत्य- चञ्चला या मा सा अगमा तस्यामुपाश्रितो यः' अर्थात् अन्यत्र चंचला होनेपर भी जो भगवान्‌के प्रति अचंचला है, उस मा—लक्ष्मीको अगमा कहते हैं। उस अगमामें जो भगवान् उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। यह बात गोपांगनाओंके प्रेमसौष्ठवकी द्योतक है। इसीके पोषणमें यह भी अर्थ किया जाता है—'अगमा दुरवगममाहात्म्या या मा वृषभानुनन्दिनी तस्यामुपाश्रितः'—जिन श्रीवृषभानुनन्दिनीका माहात्म्य अत्यन्त दुर्बोध है, उनमें आश्रित जो भगवान् उन्होंने

रमणकी इच्छा की। इसका तात्पर्य यह है कि लक्ष्मीजीका माहात्म्य तो सुज्ञेय है, किंतु श्रीवृषभानु- नन्दिनीकी महिमा अत्यन्त दुर्बोध है; क्योंकि जिन श्रीभगवान्‌के कृपाकटाक्षकी अपेक्षा समस्त देवगण रखते हैं, वे ही इनके कृपाकटाक्षकी बाट निहारा करते हैं। वे वृषभानुनन्दिनी कैसी हैं? 'न गच्छतीति अगा, अगा अचला सदैकरूपा मा अङ्गशोभा सौन्दर्यलक्ष्मीः यस्याः सा'—अर्थात् जिनके अंगकी शोभा सर्वथा अक्षुण्ण है, उन्हीं श्रीराधिकाजीके अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्यसे मोहित हुए श्रीभगवान्‌ने उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यहाँतक अज्ञ और मुमुक्षुओंकी दृष्टिसे अर्थ किये गये; अब मुक्तोंकी दृष्टिसे व्याख्या करते हैं— 'ताः ज्ञानीरूपाः प्रजा वीक्ष्य ता आहूय ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उन ज्ञानीरूपा प्रजाओंको देखकर उनका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। वे ज्ञानीरूपा प्रजाएँ कैसी हैं?—'ताः'—तदात्मिका अर्थात् भगवद्रूपा हैं, क्योंकि ऐसा कहा भी है—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्ति- र्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि और कैसी हैं?—'रात्रीः' अर्थात् भगवान्‌में अशेष-विशेष-समर्पण करनेवाली हैं। यहाँ पूर्ण स्वात्मसमर्पण है; क्योंकि अन्य-निष्ठाओंमें अपना पृथक् अस्तित्व रह ही जाता है अथवा 'रात्रीः' पदका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि वह आत्मस्वरूपा होनेके कारण रात्रियोंके समान हैं; क्योंकि ये आत्मस्वरूपा हैं और व्यवहारका अविषय होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये आत्मा रात्रिरूप ही है अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि जितना व्यावहारिक प्रपंच है, वह जिसकी दृष्टिमें रात्रिरूप अर्थात् असत् है, वह ज्ञानीरूपा प्रजा रात्रि है अथवा जिस प्रकार रात्रि अस्पष्टप्रकाशवाली होती है, उसी प्रकार यह ज्ञानीरूपा प्रजा भी अस्पष्टप्रकाशा अर्थात् अव्यक्त गति है; जैसा कि कहा भी है— 'अव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचाराः' यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥ (नारदपरिव्राजकोपनिषद ४।३४) पुनः यह ज्ञानीरूपा प्रजा कैसी है ? 'शरद्यपि जाड्यमये अविद्यालेशावशेष- युक्तेऽपि अन्तःकरणे उत्फुल्लानि मल्लिकोप- लक्षितशान्तिदान्त्याद्यशेषपुष्पाणि यासां हृदि इति शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।' अर्थात् शरदमें यानी जिनके अविद्यालेशावशेषयुक्त अन्तःकरणमें भी शान्ति, दान्ति आदि मल्लिकोपलक्षित समस्त पुण्य विकसित हो रहे हैं। अथवा— 'विवेकविचाररूपैः शरैरर्दिताः खण्डिताः इति शारदाः उत्फुल्लमल्लिकाः उत्फुल्लमल्लिका- द्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् विवेक-विचाररूप शरोंसे खण्डित उत्फुल्लमल्लिकादि उपलक्षित संसारसुख हैं जिनमें, वे रात्रियाँ 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। अथवा— 'शरदा निमित्तेन शान्त्यावहेन उत्फुल्ल- मल्लिकाभासानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् शान्ति आदिके कारण जिनके लिये संसारसुख केवल पुष्परूप यानी देखनेमात्रके लिये रह गये, ऐसी प्रजाओंको देखकर भगवान्‌ने योगमायाका आश्रय ले, उन प्रजाओंका आवाहनकर उनके अन्तःकरणमें रमण करनेका विचार किया; क्योंकि ज्ञानीरूपा प्रजाका रमण अपने आत्मभूत भगवान्‌के ही साथ होता है। ज्ञानी लोग आत्मरति ही हुआ करते हैं। इसीसे ज्ञानीको लक्ष्य करके कहा है— 'एकभक्तिर्विशिष्यते', क्योंकि उसकी भक्ति, रति, मति एकमात्र भगवान्‌में ही होती है। भगवान्‌की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये कोई ऐसा भी कहते हैं कि भगवान्‌की यह लीला मुमुक्षुओंके ही लिये है। इस लीलाके व्याजसे भगवान्‌ने निवृत्तिपक्षका ही पोषण किया है। भगवान्‌ने

२४२ भक्तिसुधा इस लीलाद्वारा यह प्रदर्शित किया है कि जिनके एक रोमकें सौन्दर्यकणसे भी अनन्तकोटि कन्दर्पोंका दर्प दलित हो जाता है, उन्हीं श्रीहरिके साथ सुरम्य यमुनाकूलमें अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंपर्यन्त रमण करके भी व्रजबलाएँ सन्तुष्ट नहीं हुईं तो साधारण सांसारिक लोग इन बाह्यविषयोंसे किस प्रकार सन्तुष्ट हो सकते हैं? इस लीलाद्वारा भगवान्‌ने अपनेमें अनुरक्तोंकी अनुरक्ति और संसारसे विरक्तोंकी विरक्ति दोनों ही पुष्ट की है। इसी प्रकार भगवान् श्रीरामने भी सीताहरणके पश्चात् शोकाकुल होकर विषयासक्त पुरुषोंकी दुर्दशाका प्रदर्शन किया था—‘कामिन्ह कै दीनता देखाई।’ (रा०च०मा० ३।३९।२) भगवान् श्रीराम स्वयं तो अच्युत हैं, उन्हें कोई भी परिस्थिति कैसे विचलित कर सकती है? और अपनी आह्लादिनी- शक्ति श्रीजनकनन्दिनीजीसे उनका वियोग होना भी कब सम्भव है? परंतु इस नरना

ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः॥ —ऐसी जो मुमुक्षुरूपा प्रजा है, उसे देखकर अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि निष्काम कर्मरूप भगवदाराधन करनेसे—क्योंकि निष्काम कर्म ही सबसे पहला भगवदाराधन है—जिसमें शान्ति- दान्तिरूप पुष्प विकसित हो रहे हैं। ये पुष्प मुमुक्षुओंको अत्यन्त अपेक्षित भी हैं; जैसा कि कहा है— 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा- त्मन्येवात्मानं पश्यति।' (जाबालोपनिषद् खण्ड ९) इस प्रकार निष्काम-कर्मद्वारा साधनचतुष्टयसम्पन्न हुई प्रजाओंको देखकर उनके हृदयोंमें श्रुतियोंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि जो पुरुष भगवदाराधनद्वारा शुद्धान्तःकरण नहीं है, उनके अन्तःकरणमें श्रुतियोंका ब्रह्मपरत्व निश्चित नहीं होता। अशुद्ध अन्तःकरणमें ऐसा होना असम्भव है। अतः उन मुमुक्षुओंके अन्तःकरणोंमें उनका परम तात्पर्य निश्चयकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः अगामायां स्वस्माद- गच्छत्सु गोपदारेषु या माया कृपा तां उपाश्रितः। अर्थात् अपने पाससे न जानेवाली गोपांगनाओंके प्रति (माया) कृपाका आश्रय लेकर। अथवा— 'अगा अचला मा मतिः यस्याः सा अगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णसे कभी नहीं हटता था, जिनके मन, देह और इन्द्रियवर्ग भगवान्‌से तनिक भी बिछुड़ना नहीं चाहते थे, उन गोपांगनाओंमें उपाश्रित हो भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। जब भगवान्‌का वेणुनाद सुनकर समस्त व्रजवनिताएँ भगवान्‌के पास दौड़ आयीं और भगवान्‌ने उन्हें पातिव्रतका उपदेश देते हुए घर लौट जानेको कहा तो वे कहने लगीं— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्वशत्युत करावपि गृहकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्होंने कहा—जो चित्त गृहकृत्योंमें लग सकता था, उसे तो आपने हर लिया। रहे हाथ, सो वे भी उसी समय घरके धन्धोंमें प्रवृत्त होते हैं, जब चित्त इनका साथ दे और तभी चरण भी चल सकते हैं। किंतु अब, जब कि आपने वेणुनादद्वारा हमारा चित्त हर लिया है, हमारा मन उनमें कैसे लग सकता है? अब तो आपसे विमुख होकर ये चरण आपके चरणोंको छोड़कर एक पग भी नहीं चल सकते। अतः हम किस प्रकार व्रजको जायें और करें तो क्या करें? इससे सिद्ध हुआ कि व्रजांगनाओंके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और देह—ये सब भगवत्परतन्त्र हैं। 'अयोगमायामुपाश्रितः'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है— 'अयोगाय मायाः* शब्दो यस्यां सा अयोगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहारमें उपयोगी जितने पुत्र, पति आदि हैं, उनके अयोग अथवा लौकिक, वैदिक व्यवहारोंके अयोग—असम्बन्धके लिये जिसमें शब्द है, उस मुरलीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। व्रजांगनाएँ लौकिक-वैदिक कर्मोंमें परिनिष्ठित थीं। उनका लौकिक-वैदिक-कर्मोंसे विच्छेद करानेके लिये अथवा उन्हें भगवद्व्यतिरिक्त सम्बन्धोंसे छुड़ानेके लिये इस मुरलिकाका शब्द अत्यन्त समर्थ है; क्योंकि इसीसे आकर्षित होकर वे सारे सम्बन्धों और कृत्योंको तिलांजलि देकर भगवान्‌की सन्निधिमें आती हैं। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय भगवता सम्बन्धाय माया कृपा यस्याः कात्यायन्यास्तां

  • 'माइमाने शब्दे च'।

२४४ भक्तिसुधा कात्यायनीमुपाश्रितः भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे ।' अर्थात् योग (भगवान्‌के साथ सम्बन्ध) करानेके लिये जिसकी माया-कृपा है, उस कात्यायनीदेवीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा- 'योगाय सम्बन्धाय मां मतिम् आययति प्रापयति या सा योगमाया कात्यायनी तामुपाश्रितः।'

  • योग अर्थात् सम्बन्धके लिये जो मां- मतिको प्राप्त कराती है, वह कात्यायनीदेवी ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि कात्यायनीदेवीके अर्चनद्वारा ही ऐसा अदृष्ट हुआ था कि जिससे गोपांगनाओंको भगवान्‌की प्राप्ति हुई। अथवा- 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह सम्बन्धाय भगवतः श्रीकृष्णस्य मां मतिम् आययति या सा वृषभानुनन्दिनी योगमाया तामुपाश्रितः ।'
  • व्रजांगनाओंके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये भगवान्‌की बुद्धिको प्रवृत्त करनेवाली जो श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं, वे ही योगमाया हैं, उनका आश्रयकर उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। लोकमें तो सापत्न्य-भाववश ईर्ष्या रहा करती है; परंतु इधर श्रीवृषभानुनन्दिनी परम करुणामयी हैं; उनमें सापत्न्यभाव नहीं है। उनके कारण उनकी लीला-भूमिके जीव- जन्तुओंका भी पारस्परिक विरोध निवृत्त हो जाता है। इसीसे वहाँ समस्त ऋतुओंका एकत्र समावेश होता है। तो फिर स्वयं उन वृषभानुदुलारीमें ही विरोध कैसे रह सकता है ? वे तो यही चाहती हैं कि सारा संसार मेरे ही समान भगवान्‌के अतिविशुद्ध सौन्दर्यसुधारसका पान करे। यह बात सर्वथा निश्चित ही है कि जबतक जीव भगवान्‌से तादात्म्य प्राप्त नहीं करता, तबतक वह परम पदका अधिकारी नहीं हो सकता और न उसका दुःख ही निवृत्त हो सकता है। इसीसे यह भी देखा जाता है कि जो लोग आध्यात्मिक मार्गका अनुसरण करते हुए परब्रह्म परमात्माकी ओर अग्रसर हो रहे हैं, उनकी भी अन्य लोकोंके प्रति ऐसी भावना नहीं रहती कि वे हमारी ओर न आयें। महर्लोकवासियोंके विषयमें भी यही कहा है कि वे सर्वसुखसम्पन्न होनेपर भी केवल इसीलिये दुःखी रहते हैं कि उनकी अपेक्षा निम्नतर लोकोंमें रहनेवाले जीव उस अति विलक्षण भगवत्सुखका समास्वाद नहीं कर सकते। उन अज्ञानियोंके प्रति करुणा होनेके कारण ही उनके हृदयमें खेद होता है- 'यच्चित्ततोऽदः कृपयानंदंविदाम्।' (श्रीमद्भा० २।२।२७) अतः भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गमें प्रवृत्त होनेवाले जितने लोग हैं, वे यही चाहते हैं कि अन्य पुरुष भी उन्हींके मार्गका अनुसरण करें। इसीसे उनमें सम्प्रदायवृद्धिकी भावना देखी जाती है। इस प्रकार जब सामान्य साधकोंमें भी अपने साथ ही भगवान्‌की ओर सब लोगोंको जानेकी प्रवृत्ति देखी जाती है तो साक्षात् प्रेमरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सहृदयता एवं लोकहितैषिताके विषयमें तो कहा ही क्या जा सकता है ? उनमें किसी प्रकारकी ईर्ष्या कैसे रह सकती है? वस्तुतः ईर्ष्या तो वहीं रहा करती है, जहाँ स्वामी परिच्छिन्न और अल्पसुख प्रदान करनेवाला होता है। किंतु यहाँ श्रीराधिकारमण तो अपरिच्छिन्न- अनन्त-सुखमय और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। इसलिये उन्हें किसी प्रकारकी ईर्ष्या क्यों होने लगी? अतः अपना आश्रय लेनेपर वे उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेके लिये भगवान्‌की मतिको प्रेरित कर देती हैं। अथवा- 'योगाय भगवता श्रीकृष्णेन सह सम्बन्धाय, मां सर्वेषां मुक्तमुमुक्षुविषयिणां मतिम् आययति प्रापयति इति योगमाया तामुपाश्रितः ।' -जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ तादात्म्य प्राप्त करानेके लिये मुक्त, मुमुक्षु और विषयी लोगोंकी मतिका सम्पादन करती हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनी योगमाया हैं, उनमें उपाश्रित श्रीभगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। श्रीवृषभानुसुताकी कृपासे ही मनुष्योंकी

श्रीरामलीलारहस्य २४५ भगवान्‌के प्रति प्रवृत्ति होती है; अन्यथा उनका चित्त अनेक प्रकारके ऐहिक-आमुष्मिक भोगोंमें ही आसक्त रहता है। किंतु यदि वे विचारपूर्वक देखें तो भगवत्प्राप्ति ही उनका परम स्वार्थ है—'स्वार्थ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥' (रा०च०मा० ७।९६।१) शास्त्रोंमें जैसे स्वार्थकी निन्दा की गयी है, वैसे ही उसकी महत्ता भी कम नहीं बतलायी गयी, जैसा कि कहा है— 'स्वकार्यं साधयेद्धीमान् कार्यध्वंसो हि मूर्खता।' अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषको अपना काम बना लेना चाहिये, कामको बिगाड़ देना ही मूर्खता है। कृतार्थताकी सभीने प्रशंसा की है; किंतु इसका तात्पर्य क्या है? कृतार्थताका अर्थ है काम पूरा कर लेना। यह काम दूसरोंका नहीं है; क्योंकि दूसरोंके कामोंकी तो कभी पूर्ति नहीं हो सकती। अतः सिद्धान्त यही है कि स्वकार्यसिद्धि ही कृतार्थता है। स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा अत्यन्त प्रयत्न करके भी कितने स्वप्न-पुरुषोंका कल्याण कर सकेगा? उन सबके कल्याणका एकमात्र साधन तो यही है कि वह स्वयं जग जाय। इसी प्रकार संसारका परम कल्याण भी अपने ही कल्याणमें है। यदि लोकदृष्टिसे देखें तो भी जबतक तुम स्वयं कृतकृत्य नहीं हो, तबतक तुम्हारी बात कौन सुनेगा? इस दृष्टिसे स्वार्थसाधन ही परम कर्तव्य है। परंतु स्वार्थकी निन्दा भी कम नहीं की गयी। स्वार्थसे बढ़कर कोई बुराई नहीं मानी गयी। अतः समझना चाहिये कि यहाँ 'स्व' शब्दके अर्थमें भेद है। जो पुरुष शरीरको ही 'स्व' समझता है, वह क्षुद्र है। यह 'स्व' जितना ही विस्तृत होगा, उतना ही स्वार्थ परमार्थरूप हो जायगा। जो पुरुष 'स्व' शब्दका अर्थ शरीर समझेगा, उसका सिद्धान्त 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' हो जायगा। जो सारे संसारको अपना आत्मा मानेगा, उसकी दृष्टिमें लोककल्याण ही आत्मकल्याण होगा और जो स्वयं प्रकाशपूर्ण परब्रह्ममें आत्मबुद्धि करेगा, वह उस कर्तृत्व- भोक्तृत्वादिशून्य शुद्ध परब्रह्ममें जो कर्तृत्वादिका आरोप हो रहा है, उसकी निवृत्ति करेगा। इससे उसके यज्ञादि सारे कर्म ही आत्मार्थ होंगे। इस प्रकार देखते हैं कि वास्तविक स्वार्थ तो बहुत ही ऊँचा है। देह, इन्द्रिय, चित्त और चिदाभासको सुख पहुँचानेके लिये जितनी चेष्टाएँ की जाती हैं, वे वस्तुतः स्वार्थ नहीं हैं; क्योंकि ये देहादि तो आत्मा नहीं हैं, बल्कि अनात्मा हैं। यदि कहो कि आत्मा न सही आत्मीय तो हैं ही; अतः आत्मीय होनेके कारण भी उनके उद्देश्यसे जो कर्म किया जायगा, वह स्वार्थ ही कहा जायगा—सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि उनमें आत्मीयताकी प्रतीति भी भ्रमके ही कारण है। आत्मा तो असंग है; इसलिये उसका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता—'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः 'स्व' शब्दवाच्य आत्माके लिये जो चेष्टा है, वह तो परम कल्याणमयी ही है; क्योंकि सबके आत्मा तो भगवान् कृष्ण ही हैं; वे केवल मायासे ही देहवान् प्रतीत होते हैं— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सर्वात्मा हैं, अतः यथार्थ स्वार्थ भगवत्प्राप्ति ही है। यहाँ 'अखिलात्मनाम्' पदसे सविशेषात्मा समझने चाहिये; क्योंकि सविशेषा- त्माओंका ही आत्मा निर्विशेष आत्मा है, जैसे कि घटाकाशादिका अधिष्ठान महाकाश है। अतः भक्त, मुमुक्षु और मुक्तोंको भी भगवद्विषयिणी सुमति प्रदान करनेवाली श्रीराधिकाजी ही हैं। भावुक भक्तजन तो उस ऐकान्तिकी भगवन्निष्ठाके सामने कैवल्य और अपुनरावर्तनरूप मोक्षपदको भी कुछ नहीं समझते; इसीसे भगवान् कहते हैं— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) किंतु भगवान्‌के मुख्य भक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उन्हें किस सुमतिकी अपेक्षा है? वे तो आप्तकाम

हुआ करते हैं। यह ठीक है; परंतु भगवद्विषयिणी भक्तिरूपा स्निग्धमति उन्हें भी अभिलषित होती है। देखो, सनकादिकी भी क्या अभिलाषा थी ? कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) वे कहते हैं— भगवन् ! यदि हमारा चित्त भ्रमरके समान आपके चरणकमलोंमें निरत रहे, यदि हमारी वाणी तुलसीके समान आपकी पादकान्तिका आश्रय ले और यदि हमारे कर्णकुहर आपके गुणगणसे पूरित रहें तो हमें भले ही अपने पापपुंजोंके कारण नरकोंमें भी जाना पड़े—इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है। इस प्रकार श्रीराधिकाजी जैसे भक्तोंको भगवन्निष्ठा और मुक्तोंको भगवद्रति प्रदान करती हैं, वैसे ही वे अन्य (विषयी और मुमुक्षु) लोगोंको भी प्रमा— भगवत्-साक्षात्काररूपा मति प्राप्त कराती हैं अर्थात् मुमुक्षु और विषयी पुरुषोंकी भगवान्‌के प्रति इष्ट-बुद्धि कराती हैं, इसलिये वे योगमाया हैं। उन योगमायारूपा श्रीराधिकाजीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा— 'योगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा स्वाङ्गकान्तिर्योगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो संयोगके लिये मति प्रदान करती है, वह—अपने अंगकी कान्ति ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर, अथवा— 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह उद्दीपनविधया संयोगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा शरद्घनशोभा तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो उद्दीपन-विभाव होनेके कारण व्रजांगनाओंके साथ संयोग करनेकी मति प्रदान करती है, वह शरद्-ऋतु या वनकी शोभा ही योगमाया है। उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। अथवा— 'श्रीकृष्णस्य योगे सम्प्रयोग एव मा शोभा यस्याः सा वृषभानुनन्दिनी योगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्रके सम्प्रयोगमें ही जिनकी शोभा है, वे श्रीवृषभानुसुता ही योगमा हैं, उनमें उपाश्रित हुए भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि— प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥ (रा०च०मा० २।९७।६) जैसे भानु बिना प्रभाकी, चन्द्रमा बिना चन्द्रिकाकी और सरोवर बिना कमलिनीकी शोभा नहीं है, वैसे ही परमानन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णके बिना श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है। इसीसे जिस समय उन्हें भगवान्का सम्प्रयोग प्राप्त था, उस समय उनकी कैसी शोभा थी ? किंतु जब श्रीश्यामसुन्दरका वियोग हुआ तो सारा वृन्दावन ही श्रीहीन हो गया; उस समय रसिकशिरोमणिभूता श्रीवृषभानुसुताकी जो दशा थी, उसका तो वर्णन ही कैसे किया जा सकता है? उसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि— 'यस्या योगे सम्प्रयोग एव श्रीकृष्णस्य मा शोभा सा श्रीवृषभानुसुता योगमा तस्यामुपाश्रितः'— जिनके संयोगमें ही श्रीकृष्णचन्द्रकी शोभा है, वे वृषभानुनन्दिनी ही योगमा हैं अर्थात् जैसे श्रीकृष्णचन्द्रसे विप्रयुक्ता श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है, वैसे ही श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दरकी शोभा नहीं है। जिस प्रकार प्रभाशून्य सूर्य, चन्द्रिकाहीन चन्द्र और मधुरिमारहित अमृत फीके हैं, उसी प्रकार अपनी आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीकीर्तिसुताके बिना श्रीनन्दनन्दनकी शोभा नहीं है। यदि ऐसी बात न होती तो जिनके कृपाकटाक्षके लिये ब्रह्मा और रुद्रादि देवगण भी लालायित रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी भी जिनके विशाल वक्षःस्थलमें अविचल रूपसे निवास करती हुई उनके तुलसीगन्धयुक्त पदपद्मपरागकी कामना करती हैं१, वे ही भगवान् १. श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासस्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७)

श्रीरासलीलारहस्य २४७ श्रीकृष्णचन्द्र लक्ष्मीकी उपेक्षा करके वेणु-निनादद्वारा समस्त गोपांगनाओंके सहित उन्हें बुलानेका प्रयास क्यों करते ? इससे सिद्ध होता है कि उन श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य विलक्षण ही था। समस्त व्रजांगनाएँ भी श्रीराधिकारूपा होकर ही भगवान्‌को प्राप्त करती हैं। इसीसे लोकमें भगवान्‌को रुक्मिणी-रमण या सत्यभामा- वल्लभ न कहकर श्रीराधा-रमण या गोपीवल्लभ ही कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि भगवान्‌की यथार्थ शोभा श्रीराधिकाजीसे ही है। अथवा—‘योगाय व्रजाङ्गनानां रासादिमुख- प्रापणाय या माया वयुनात्मिका¹ सङ्कल्पशक्ति- स्तामुपाश्रितः’। अर्थात् गोपांगनाओंको रसादि-सुख प्राप्त करानेके लिये जो माया-ज्ञानात्मक संकल्प उसे आश्रयकर भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि वहाँ किसी अन्य बाह्यसाधन

२४८ भक्तिसुधा विभक्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दका स्वयं ही आस्वादन करते हैं। इसीसे भगवान् अपनी स्वरूपभूता व्रजांगनाओंमें रमणेच्छा उत्पन्न करके भी पहले स्वयं कुछ कालतक 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सर्वसंकल्पशून्य और निःस्पृह ही रहे। किंतु अब उन्होंने भी रमणकी इच्छा की। परंतु यह रमण कैसा है? यहाँ एक ही परमतत्त्वको अनेकों नायकों और नायिकाओंके रूपमें प्रकटकर अपने ही स्वरूपभूत आनन्दका रसास्वादन करना है। वास्तवमें 'भज सेवायाम्' या 'रमु क्रीडायाम्' के अनुसार एक प्रकार असाधारण भावसे तादात्म्यापत्ति अथवा जो स्वरूपभूत आनन्द है, उसको अपने अनन्य भक्तोंमें स्थापित करना ही यह भजनानन्दरूप रमण है। इससे आपातदृष्टिसे यह जान पड़ता है कि यदि उस कूटस्थ परमानन्द तत्त्वका अन्यत्र संक्रमण किया गया तो अपने स्वरूपसे च्युत होनेके कारण उसे अच्युत नहीं कहा जा सकता। इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये ही कहा है- 'भगवानपि' अर्थात् जो अप्रच्युत स्वभाव भगवान् अपने अचिन्त्यानन्त ऐश्वर्यके माहात्म्यसे अपने स्वरूपभूत परमानन्दका अन्यत्र संचार करके भी सदा अच्युत ही रहते हैं, उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। जिस प्रकार चिन्तामणि, कल्पतरु एवं कामधेनु आदि अपने समीपस्थ लोगोंको उनके संकल्पित पदार्थ देकर भी स्वयं अक्षुण्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार भक्तोंको प्रेम प्रदान करनेपर भी भगवत्स्वरूपमें कोई च्युति नहीं होती। किंतु यहाँ पुनः सन्देह होता है कि इस प्रकार स्वरूपानन्दका अन्यत्र संक्रमण होनेसे भगवत्स्वरूप भले ही अविकारी रहे तथापि वह स्वरूपानन्द तो अपने स्थानका त्याग करनेके कारण विकारी हो ही जायगा। वह कूटस्थ या अविकारी नहीं रह सकता। इसीसे कहा है- 'योगमायामुपाश्रितः'। भगवान्‌की योगमाया एक ऐसी शक्ति है, जो उस पदार्थको अन्यत्र ले जानेपर भी विकृत नहीं होने देती। इसीसे भगवान् अपने कूटस्थ परमानन्दको अन्यत्र दूसरोंमें संक्रमित करके भी स्वयं अविकृत ही रहते हैं और उनके उस आनन्दमें भी कोई विकार नहीं होता है। इसीसे यह देखा जाता है कि यद्यपि भगवान्ने अपने कई भक्तोंको स्वात्मसमर्पण किया है तो भी उनमें कोई च्युति नहीं हुई; वे ज्यों-के-त्यों अविकारी ही बने हुए हैं। श्रीब्रह्माजी कहते हैं— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति। सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् हे देव! आप इन घोष-निवासियोंको क्या देंगे? आप विश्वफलात्मा हैं; आपसे बढ़कर और दूसरी क्या वस्तु हो सकती है, जिसे देकर आप उनसे उऋण होंगे? प्राणी विविध प्रकारके ऐहिक- आमुष्मिक सुखको ही परम पुरुषार्थ समझता है, किंतु जिनके आँगनमें उस सुखका परमोद्गम स्थान साक्षात् परब्रह्म मूर्तिमान् होकर धूलिधूसरित हुआ खेल रहा है, उनके लिये वे क्षुद्र सौख्यकण कैसे फलरूप हो सकते हैं? जिन्हें जो वस्तु अप्राप्त होती है, वही उन्हें फलरूपसे स्वीकृत हुआ करती है। अतः जिन्हें आप आत्मीय-रूपसे अहर्निश प्राप्त हैं, उन्हें सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् होकर भी आप क्या दे सकते हैं? इसलिये इनके तो आपको ऋणी ही रहना पड़ेगा। इस विषयमें कुछ निश्चय न होनेके कारण मेरा चित्त मोहित हो रहा है। यदि कहें कि मैं अपनेको ही समर्पण कर दूँगा तो इसमें भी कोई महत्त्वकी बात न होगी; क्योंकि जो पूतना दम्भसे माताके समान आचरण दिखलाती हुई आपका अनिष्ट करनेके लिये स्तनोंमें विष लगाकर आयी थी, उसे भी उसके कुलसहित आपने अपने स्वरूपको ही प्राप्त करा दिया था; फिर जिनके धन, धाम, स्वजन, प्रिय, आत्मा, प्राण और चित्त आपहीपर निछावर हैं, उन व्रजवासियोंको

श्रीरासलीलारहस्य २४९ आप क्या देंगे? उनके तो आप ऋणी ही रहेंगे। अहो! जिन व्रजबालकोंका उच्च स्वरसे किया हुआ हरिगुण-गान तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है, उनके चरणकमलोंकी वन्दना हम बारम्बार करते हैं। इस लोकमें वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने इस गोकुलमें किसी वनवीथिकाके पास तृण-गुल्मादिरूपसे जन्म लिया है; क्योंकि उन्हें उन कृष्णप्राणा गोप- वधूटियोंके पद-पद्मपरागसे अभिषिक्त होनेका सुअवसर प्राप्त होता है।* इससे यहाँ यही कहना है कि भगवान् अनेकोंको स्वात्मसमर्पण करके भी पूर्णरूपसे ही अवशिष्ट रहते हैं। अतः भगवान्‌की यह योगमाया शक्ति ही है, जिससे वे सदा सब कुछ करते हुए भी अक्षुण्ण ही रहते हैं। उन्होंने रमणकी इच्छा कैसे की? इसपर कहते हैं—'ताः कात्यायन्यर्चनव्रतसन्तुष्टेन भगवता वरत्वेन प्रदत्ताः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः रात्रीः वीक्ष्य।' अर्थात् कात्यायनी-पूजन एवं व्रतादिसे सन्तुष्ट हुए श्रीभगवान्‌ने जिन्हें वररूपसे दिया था, उन शरदोत्फुल्लमल्लिका रात्रियोंको देखकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। उन रात्रियोंको ग्रहणकर और उनमें आधिदैविकी रात्रियोंका निवेशकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। ऐसा करके उन्होंने उन रात्रियोंको पूर्ण बना दिया; क्योंकि आधिदैविकी रात्रियाँ भगवद्रूपा हैं। इस प्रकार उन सबको पूर्णिमारूप बनाकर और ऋतुको भी शरद्-ऋतुमें ही परिणत कर दिया अर्थात् समस्त रात्रियोंमें ऋतु-परिवर्तनका क्रम न रखकर केवल एक ही ऋतु रखा और उनमें मल्लिकादि समस्त पुष्प विकसित कर दिये। इस प्रकार उन रात्रियोंको समस्त उद्दीपन-सामग्रियोंसे सम्पन्नकर मुरली- ध्वनिद्वारा गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यदि विचार किया जाय तो स्वरूपतः अशेष- विशेष-शून्य पूर्ण परब्रह्म एवं अचिन्त्यानन्द निखिल- गुणगणास्पद श्रीभगवान् ये एक ही हैं; क्योंकि सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य एक स्वप्रकाशतत्त्व ही 'भगवत्' शब्दका लक्ष्य है। जैसा कि कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) अर्थात् जो अद्वय ज्ञानस्वरूप तत्त्व है; तत्त्वज्ञ लोग उसीको तत्त्व समझते हैं। वह 'ब्रह्म', 'परमात्मा' या 'भगवान्' ऐसा कहा जाता है। अतः अद्वितीय परब्रह्म ही भगवान् है। जिस प्रकार 'गच्छतीति गौः' इस व्युत्पत्तिसे 'गमेर्डोः' आदि सूत्रोंके अनुसार सिद्ध हुआ 'गो' शब्द केवल गमन करनेवालेका ही वाचक नहीं होता; क्योंकि गमन करनेवाले तो सभी पशु हैं, बल्कि गल-कम्बलादियुक्त 'गो' का ही वाचक होता है, उसी प्रकार यह अद्वय पदार्थ ही भगवत्-पदवाच्य है। किंतु इसका यौगिक अर्थ लेनेपर तो भगोपलक्षित अचिन्त्यानन्तगुणगणास्पद परमेश्वर ही 'भगवत्' शब्दका अर्थ है। इससे यही सिद्ध हुआ कि परमार्थतः जो एक अद्वयतत्त्व सर्वभेदरहित और स्वप्रकाश है, वही अपनी अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय लीलाशक्तिसे निखिल ब्रह्माण्डका अधीश्वर भी है। उस भगवान्‌ने ही रमणकी इच्छा की। यहाँ दोनों प्रकारसे विरोध प्रतीत होता है। यदि उसके निर्विशेषरूपपर विचार करते हैं तो 'असङ्गो न हि सज्यते' (बृहदारण्यक० ३।९।२६) इस श्रुतिके अनुसार उसका रमण होना असम्भव है। जो स्वप्रकाश, असंग और अद्वय है—वह किसको देखकर, किसलिये, किसके साथ, कैसे रमण करेगा? और यदि भगवान्‌के सविशेषस्वरूपपर ध्यान देते हैं तो वे भी सब प्रकारके ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यसे पूर्ण तथा अचिन्त्यानन्दरूप अपने ऐश्वर्यमें सन्तुष्ट रहनेके कारण आप्तकाम एवं पूर्णकाम हैं। उन्हें किसीको देखकर रमणकी इच्छा कैसे हो सकती है? जो अनाप्तकाम होता है, वही

  • 'वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥' (श्रीमद्भा० १०।४७।६३) 'तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३४)

२५० भक्तिसुधा अपनेसे भिन्न किसी पदार्थको देखकर उसकी आसक्तिवश रमणकी इच्छा कर सकता है। इसीसे 'योगमायामुपाश्रितः' ऐसा कहा है। योगमाया अर्थात् अघटित घटनाके लिये जो माया है—उस योगमायाका सन्निधिमात्रसे आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। तात्पर्य है कि इस योगमायाके प्रभावसे ही उस स्वप्रकाश, असंग एवं अद्वय ब्रह्मकी अपनेसे भिन्न प्रतीत होनेवाली गोपांगनाओंके साथ रमण करनेमें प्रवृत्ति हो गयी। यही उस मायाकी अघटितघटनाशक्ति है। यह वही माया है, जिसके विषयमें श्रुति कहती है— ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरो० १।३) अर्थात् अपने गुणोंसे आच्छादित जिस भगवच्छक्तिका ऋषियोंने ध्यानयोगसे साक्षात्कार किया था, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत तथा कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी कारणभूता उस अचिन्त्यानन्त मायाशक्तिसे ही भगवान्का अपनेसे भिन्न किसीको देखना, अपनेसे भिन्नकी इच्छा करना और अपनेसे भिन्नके साथ रमण करना सम्भव है? तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान् स्वयंप्रकाश, कूटस्थ और अद्वय होनेके कारण अपनेसे भिन्न किसी औरको नहीं देख सकते तथापि अपनी इस लीला-शक्तिसे उन्होंने अपनेसे भिन्न रूपसे प्रादुर्भूत जो अपनी ही स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ हैं, उन्हें देखकर रमण करनेकी इच्छा की। यह जितना भी अघटनघटन है, उसके सम्पादनमें भगवान्की माया समर्थ है। इसीसे इन समस्त विरोधोंका निराकरण हो जाता है। इसी प्रकार सगुणपक्षमें भी समझना चाहिये। वहाँ भी भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् एवं सम्पूर्ण वैराग्य और ऐश्वर्यसम्पन्न होनेपर भी इस योगमाया अर्थात् योग-सम्प्रयोगके लिये जो माया—कृपा है, उसका आश्रय लेकर ही वररूपसे दी हुई उन रात्रियोंको देखकर भक्तानुग्रह- परवश हुए उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेकी इच्छाको स्वीकार करते हैं। अतः यहाँ भी उनकी रमणेच्छामें योगमाया ही प्रधान कारण है। रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या इस प्रकार जिस समय भगवान्ने उन शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और गोपांगनाओंको देखकर रमणकी इच्छा की— तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः। स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन् प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२) अन्वय—'तदा चर्षणीनां शुचो मृजन् दीर्घदर्शनः प्रियः प्रियाया इव करैर्धृतेन अरुणेन प्राच्याः ककुभः मुखं विलिम्पन् उडुराजः उदगात्।' भावार्थ—उसी समय लोगोंके शोकका मार्जन करता हुआ तथा जिस प्रकार दीर्घकालमें मिलनेवाला प्रियतम अपनी प्रियतमाके शोककी निवृत्ति करता है, उसी प्रकार अपने शीतल करों (किरणों या हाथों)-में धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाके मुखका लेपन करता हुआ चन्द्रमा उदित हुआ। 'तदा' अर्थात् जिस क्षणमें भगवान्को रमणकी इच्छा हुई, उसी समय चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि सेवककी यह रीति है कि जिस समय स्वामीकी इच्छा हो, उसी समय सेवामें उपस्थित हो जाय। ये उडुराज क्यों उदित हुए? क्योंकि ये उद्दीपन विभाव हैं अर्थात् भगवान्की जो रमणेच्छा है, उसे और भी उद्दीप्त करनेके लिये ही इनका प्राकट्य हुआ है। 'उडुराज' शब्दका अर्थ है 'उडूनां तारकाणां राजा' अर्थात् तारोंका राजा। इससे उस समय चन्द्रदेवका सपरिवार उदित होना ध्वनित होता है। उनके अभ्युदयसे ही चर्षणी—जो समस्त प्राणी उनके शरत्कालीन सूर्यसे प्राप्त हुए तापसे तप्त थे, उनकी मनोग्लानि शान्त हो गयी। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं—

श्रीरासलीलारहस्य २५१

सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥ (रा०च०मा० ४।१७।६) वे उदित किस प्रकार हुए ?—'प्राच्याः ककुभः मुखं करैर्धृतेन अरुणेन विलिम्पन्' अर्थात् अपनी शीतल और सुकोमल किरणोंमें धारण किये हुए अरुण रागसे पूर्व दिशाके मुखको लेपित करते हुए। मानो इस प्रकार नायक-नायिकाकी रीतिको प्रदर्शित करते हुए चन्द्रदेव यहाँ शृंगाररसके उद्दीपन बने हुए हैं। यद्यपि चन्द्रमाका सम्बन्ध सभी दिशाओंसे है तथापि उनमें पूर्वांदिक् ही प्रधान है। अतः पूर्व दिशाके साथ संश्लिष्ट होकर अपनी किरणोंमें धारण किये हुए अरुणसे उसका मुखलेपन करता हुआ और स्वयं भी अनुरक्त होता हुआ वह उदित हुआ अर्थात् प्राची दिशासे संश्लिष्ट होनेपर चन्द्रमाने उसे भी अनुरक्त किया और वह स्वयं भी अनुरंजित हुआ। इससे पूर्वांदिक्संसर्गसे उसका अनुराग होना स्वयं सिद्ध है, जैसे नायिकाके प्राप्त होते ही नायक अनुरक्त हो जाता है। इसका भी विशेषण है 'दीर्घदर्शनः' यह 'उडुराजः' और 'प्रियः' दोनोंहीका विशेषण हो सकता है। 'दीर्घं बहूनां रात्रीणामन्ते दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पश्चात् हुआ हो, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। पूर्व दिशाके साथ चन्द्रमाका ठीक-ठीक सम्बन्ध पूर्णिमाको ही होता है, इसलिये चन्द्रमा दीर्घदर्शन है। इधर दृष्टान्त पक्षमें यह प्रियका भी विशेषण है अर्थात् जिसका दर्शन बहुत कालके पश्चात् हुआ है—ऐसा कोई प्रियतम जिस प्रकार 'शान्तमैः करैः' अपने सुखावह कर-व्यापारोंसे प्रियतमाका शोक निवृत्त करता है, उसी प्रकार चन्द्रमा अपनी किरणोंसे पूर्व दिशाके मुखको रागरंजित करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार कर-व्यापारोंसे भी शृंगाररसका उद्दीपन ही सूचित होता है। इसे प्रकृत प्रसंगमें दूसरी तरह भी लगाते हैं— 'यथा उडुराजः चर्षणीनां शुचो मृजन् शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन च प्राच्या ककुभः मुखं विलिम्पन् उद्गातथा दीर्घदर्शनः प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्याः मुखं शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन च विलिम्पन् चर्षणीनां गोपीजनानां शुचः शोकाश्रूणि मृजन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा मनुष्योंका शोकापनोदन करता हुआ तथा अपनी शीतल किरणोंसे उनमें धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाका मुख लेपन करता हुआ उदित हुआ, उसी प्रकार बहुत कालके बाद दिखायी देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुसुताके मुखारविन्दको अपने करकमलोंमें धारण किये हुए कुंकुमसे लेपनकर गोपीजनोंके शोकाश्रुओँका मार्जन करते हुए प्रकट हुए। यहाँ 'चर गतिभक्षणयोः' इस धातुपाठके अनुसार 'चर्षणीनाम्' इस पदका अर्थ गति और भक्षणपरायण है। 'गति' शब्दसे कर्म और 'भक्षण' शब्दसे कर्मफल समझना चाहिये। अतः इससे वे मनुष्य* विवक्षित हैं, जो केवल कर्म और कर्मफलमें ही आसक्त हैं। इन संसारी लोगोंके सर्वविध तापका निराकरण करता हुआ उडुराज—चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि वह उदित होकर उद्दीपन-विभाव-रूपसे परमानन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रके चित्तमें रमणकी इच्छा उत्पन्न करेगा, जो कि श्रीकृष्ण-प्रेमियोंको बहुत कालसे अभिलषित है। अतः भगवान्‌की प्रेयसी व्रजांगनाओंके शोकका मार्जन होनेसे सारे संसारका शोक मार्जित हो जायगा; क्योंकि यह नियम है कि जिस क्रियासे भगवद्भक्तोंका शोक निवृत्त होता है, उससे सारे संसारका ही शोक निवृत्त हो जाता है और जिससे भगवद्भक्त सन्तप्त होते हैं, उससे सभीको


  • 'चर्षणी' शब्द मनुष्य अर्थमें रूढ़ है। यह बात निम्नलिखित श्लोकसे सिद्ध होती है— अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणीयः सुताः। यत्र वै मानुषी जातिर्ब्राह्मणा चोपकल्पिता ॥ (श्रीमद्भा० ६।६।४२) अर्यमाकी पत्नी मातृका नामवाली थी। उसके 'चर्षणी' संज्ञक पुत्र हुए। उन चर्षणीयोंमें ही ब्रह्माजीने मानुषी जातिकी कल्पना की।

२५२ भक्तिसुधा सन्ताप होता है। देखो, जिस समय ध्रुवजीने भगवत्तादात्म्यको प्राप्त होकर श्वासनिरोध किया था, उस समय सारे संसारका ही श्वास निरुद्ध हो गया था। ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि भगवान् सर्वात्मा हैं; अतः यदि भगवद्भक्त सन्तप्त होता है तो सारा संसार ही सन्तप्त हो उठता है। ये गोपांगनाएँ तो भगवान्‌की अत्यन्त अन्तरंग हैं। ये भगवद्विप्रयोगके कारण चिरकालसे सन्तप्त थीं। अब उस विरहव्यथाका अन्त होनेवाला था। इसीसे भगवान्‌को रमणकी इच्छा हुई। अतः इसका यह भी अर्थ हो सकता है— 'चर्षणीनां व्रजाङ्गनाजनानां शोकापनोदेन चर्षणीनां गतिभक्षणपराणां कर्म तत्फलभोग- परिनिष्ठानां जगतामेव शुचो मृजन् उद्गात्।' अर्थात् चर्षणी यानी व्रजांगनाओंकी शोकनिवृत्ति करके चर्षणी-कर्म और कर्म-फल-भोगमें लगे हुए संसारी लोगोंका शोक निवृत्त करते हुए चन्द्रदेव प्रकट हुए। इसीसे उन्हें उडुराज अर्थात् नक्षत्रमण्डलका राजा कहा है। वे परम सौभाग्यशाली और अत्यन्त पुण्यात्मा हैं; क्योंकि उनके कारण गोपांगनाओंकी शोकनिवृत्ति होनेसे सारे संसारका ही सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः ये उडुराज 'उडुषु राजत इति उडुराजः' हैं अर्थात् नक्षत्रोंमें अत्यन्त शोभायमान हैं। इधर जिस प्रकार जीवोंकी शोकनिवृत्ति करनेके कारण यह उडुराज पुण्यात्मा है, उसी प्रकार मानो श्रीकृष्णचन्द्र भी उडुराज ही हैं; क्योंकि उन्होंने भी चर्षणी यानी व्रजांगनाओंका शोकापनोदन करके सारे संसारका ही शोक निवृत्त किया है। अतः 'उडुराज' शब्दसे उनका भी अन्वादेश होता है। जैसे इस ओर ताराओंमें अत्यन्त देदीप्यमान चन्द्रमा है, उसी प्रकार उधर गोपांगनाओंमें नायक-रूपसे अत्यन्त देदीप्यमान भगवान् श्रीकृष्ण हैं। इसीसे आचार्योंने यह भी कल्पना की है कि जिस समय भगवान्‌ने 'अमना' और 'अप्राण' होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर गोपांगनाओंके साथ रमण करनेका संकल्प किया, उस समय उनमें मन तो था नहीं। मनका अधिष्ठाता चन्द्रमा है। जिस प्रकार सूर्य आदि अधिष्ठातादेवताओंसे अधिष्ठित हुए बिना नेत्रादिमें रूपादिके प्रकाशनका सामर्थ्य नहीं होता, उसी प्रकार मन भी चन्द्रमासे अधिष्ठित हुए बिना संकल्पमें समर्थ नहीं हो सकता था। किंतु यहाँ भगवान्‌के तो मन ही नहीं था; अतः वे मनके बिना रमण कैसे करते ? यद्यपि अपने दिव्य ऐश्वर्यसे वे बिना मनके भी रमण कर सकते थे तथापि लोकमर्यादाका अतिलंघन न करके भगवान्‌ने नवीन अप्राकृत मनका निर्माण किया; क्योंकि वस्तुकी सरसता अथवा नीरसताका आस्वादन तो मनसे ही होता है। भगवान्‌का मन अप्राकृत था, इसलिये उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा भी अप्राकृत ही होना चाहिये था। जिस प्रकार चन्द्रमा ताराओंके सहित शोभायमान होता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंके मन उडुस्थानीय हैं और भगवान्‌का मन उन उडुओंका अधिनायक चन्द्रमा है। अतः जिस प्रकार नक्षत्रोंसे चन्द्रमाकी शोभा है, उसी प्रकार गोपांगनाओंके मनोंसे भगवान्‌के मनकी शोभा है। यहाँ यह शंका होती है कि इस अप्राकृत चन्द्रमाकी वस्तुतः आवश्यकता क्या थी ? यदि भगवान्‌के रचे हुए नवीन अप्राकृत मनका नियमन करनेके लिये इसकी आवश्यकता मानी जाय तो ठीक नहीं; क्योंकि भगवान् तो सर्वशक्तिमान् हैं, वे स्वयं ही उस मनको कार्यसम्पादनकी योग्यता प्रदान कर सकते थे। यदि कहें कि व्रजांगनाओंके मनोंके अधिष्ठाता जो प्राकृत चन्द्रमा हैं, वे नक्षत्रोंके रूपमें उदित हैं, उनकी रक्षा करनेके लिये ही भगवान्‌के अप्राकृत मनके अधिष्ठाता अप्राकृत चन्द्रमाका उदय हुआ है तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि उनका नियमन भी भगवान् स्वयं ही कर सकते थे। यदि उद्दीपनके लिये इसका उदय माना जाय तो भगवान्‌को इसके लिये भी किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है और यदि अन्धकारकी निवृत्तिके लिये इसका उदय मानें तो यह काम भी प्राकृत चन्द्रमासे ही निष्पन्न हो सकता था;

: In the user prompt, let's inspect line 59: "हृदयारण्ये रन्तुं मनश्चक्रे तदैव उडुराजः मोहजैशत-" -> wait, let's look at the letter between 'ह' and 'श': Could it be "जै"? Wait, look at 'ज' in 'उडुराजः' on the same line! In 'उडुराजः', 'ज' has a top bar, vertical line, then from the middle, a line goes left and curves down and up. Now look at the letter in question: Does it have a vertical line on the right? Yes. Does a line go left from the middle? Wait, look at the loop: it is at the bottom, like 'न'! Wait, compare it with 'न' in 'जनानां' in line 58: 'न' has a vertical line, a horizontal line going left from the bottom, curving into a small loop. Now look at the letter in question: It looks very similar to 'न'! Wait, could it be 'नै'? Yes, 'न' with 'ै' = 'नै'. Wait, why did I wonder if there's an 'े' on 'ह'? If it were "मोहेनैशत-", it would be "मोहेन नैशतमोव्याप्त...". But there is no space, and 'ह' has no 'े'. Wait, could it be "मोहैर्नै

हुआ। इससे सिद्ध होता है कि जिस समय भगवान् अपने भक्तके हृदयमें रमण करनेकी इच्छा करते हैं, तभी यह भजनानन्दचन्द्र उदित हो जाता है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ?—'चर्षणीनां गतिभक्षण- शीलानां कर्मतत्फलव्यासक्तमनसां जनानां शुचः आर्त्तीः स्वात्मभूतपरप्रेमास्पदभगवद्विप्रयोगवेदनाः ताः मृजन्।' अर्थात् यह चर्षणी यानी कर्म और कर्मफलभोगमें आसक्त-चित्त पुरुषोंके शोक—अपने आत्मभूत परप्रेमास्पद भगवान्के वियोगसे होनेवाली वेदनाका मार्जन करता हुआ उदित हुआ अथवा कर्म और कर्म-फल-भोगजनित श्रान्ति ही आर्ति है या जितनी भी वेदनाएँ सम्भव हैं, वे सभी आर्ति हैं, उन सभीका मार्जन करते हुए भगवान् उदित हुए। यहाँ 'शुचः' में बहुवचन है; इसलिये यह शोकोपलक्षित समस्त संसारका भी उपलक्षण है। किसके द्वारा शोकमार्जन करता हुआ उदित हुआ ?—'शन्तमैः करैः—स्वयं शन्तमाः परमसुखरूपाः अन्येषु कराः कं सुखं रान्ति समर्पयन्तीति कराः तैः भगवदीयगुण- गणगानतानवितानादिभिः।' शन्तम करोंसे अर्थात् जो स्वयं परम सुखरूप हैं और दूसरोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं; उन भगवद्- गुणगानादिसे भक्तोंका शोक निवृत्त करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार यह भजनानन्दरूप चन्द्रका उदय समस्त शोकोंकी निवृत्ति करनेवाला है; क्योंकि जिस समय जीव भगवद्भजनमें प्रवृत्त होता है, उसी समय उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई ॥ (रा०च०मा० १।३५।८) यह मनरूप मत्तगजेन्द्र संसारानलमें जल रहा है; जिस समय यह भगवद्भजनमें लगता है, उसी समय मानो शीतल गंगाजलमें अवगाहन करने लगता है। अब यह विचार करना चाहिये कि ये जो भजनानन्दचन्द्र, भक्तिरूपा प्रभा और गुणगानवितानादि- रूप शन्तम कर हैं, इनमें भेद क्या है? क्योंकि बिना भेदके कोई व्यवहार नहीं हो सकता। वस्तुतः भगवद्भक्तिरूपा प्रभा और भगवदीय गुणगणगानतानादि भजनानन्दचन्द्रके अन्तर्गत ही हैं। इनका भेद 'राहोः शिरः' के समान केवल व्यवहारके लिये है। यद्यपि राहुका सिर राहुसे कोई पृथक् पदार्थ हो ऐसी बात नहीं है तथापि लोकमें इसका इस प्रकार सम्बन्ध- ग्रहणपूर्वक व्यवहार अवश्य होता है। जैसे 'देवदत्त हाथोंसे वृक्ष काटता है' इस वाक्यमें 'देवदत्त' कर्ता है और 'हाथ' करण हैं। इसलिये इन दोनोंमें भेद होना चाहिये। परंतु वस्तुतः देवदत्त क्या है? वह हाथ, पाँव, सिर आदिका संघात ही तो है। वह अवयवी है और हाथ-पाँव आदि उसके अवयव हैं। नैयायिकोंके मतानुसार अवयव कारण होता है और अवयवी उसका कार्य होता है। लोकमें कार्य अपने कारणके द्वारा ही सारे व्यापार किया करता है। इसलिये अवयवीमें मुख्यताका व्यपदेश होता है और अवयवमें गौणताका। इसी प्रकार भक्तिरूपा प्रभा और भगवद्गुणगानरूप किरणें अवयव हैं तथा भजनानन्दचन्द्र अवयवी है। अतः भजनान्द कार्य है और भक्ति तथा भगवद्गुणगानादि उसके कारण हैं। यह भजनानन्दचन्द्र हृदयारण्यको सुशोभित भी करता है; क्योंकि जहाँ चन्द्रालोकका विस्तार नहीं होता, वह स्थल रमणके योग्य भी नहीं होता। इसी प्रकार जिस हृदयमें भजनानन्दचन्द्रकी भक्तिरूपा प्रभाका विस्तार नहीं हुआ है, वह भगवान्‌का रमण-स्थल होनेयोग्य भी नहीं है तथा वह भजनानन्दचन्द्र और क्या करते हुए उदित हुआ ?—'प्राच्याः—प्राचि भवा प्राची तस्याः बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं प्रधानं भागं अरुणेन कुङ्कुमेनेव रागेण विलिम्पन्।' अर्थात् वह प्राची यानी अपनेसे पूर्व उत्पन्न हुई बुद्धिके सत्त्वमय प्रधान भागको, अरुण कुंकुमद्वारा मुखलेपनके समान अनुरक्त करता हुआ उदित हुआ। यही भजनानन्दचन्द्रका कार्य है। जिस प्रकार अग्निसे पिघले हुए लाखमें रंग भर देनेपर वह उसी रंगका हो जाता है, उसी प्रकार यह बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको

श्रीरासलीलारहस्य २५५ द्रवीभूत करके उसमें भगवत्स्वरूपरूपी रंग भर देता है। इससे वह बुद्धिसत्त्व भगवन्मय हो जाता है और फिर किसी समय उसे भगवान्‌की विस्मृति नहीं होती। तथा वह भजनानन्दचन्द्र है कैसा?—‘ककुभः —कं सुखं तद्रूपतया कुषु कुत्सितेष्वपि भाति शोभत इति ककुभः।’ ‘क’ सुखको कहते हैं। वह सुखरूपसे कुत्सितोंमें भी भासमान है, इसलिये ‘ककुभ’ है। उस भजनानन्द- चन्द्रका आलोक पड़नेपर तो चाण्डाल भी कृतकृत्य हो सकता है, यथा— अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।७) अर्थात् हे प्रभो! जिसकी जिह्वापर आपका नाम विराजमान है, वह श्वपच भी इन (भक्तिहीन द्विजों)- की अपेक्षा श्रेष्ठ है। जो आपका नामोच्चारण करते हैं, उन महानुभावोंने तो सब प्रकारके तप, होम, स्नान और वेदपाठ कर लिये। यही नहीं, आपके नामोंका श्रवण या कीर्तन करनेसे तथा कभी आपको प्रणाम या स्मरण कर लेनेसे चाण्डाल भी शीघ्र ही सवन- कर्मका अधिकारी हो सकता है; फिर हे भगवन्! जिन्हें साक्षात् आपका दर्शन हुआ हो उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद् यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात्॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।६) सवनकर्मका अधिकार केवल द्विजोंको ही है। अतः इस श्लोकमें जो ‘सद्यः’ शब्द है, उसका ‘तत्काल’ अर्थ करके कोई-कोई ऐसा कहने लगते हैं कि भगवत्स्मरणके प्रभावसे चाण्डाल भी उसी जन्ममें सवनाधिकारी यानी द्विज हो सकता है। परंतु ऐसी बात नहीं है। ‘सद्यः’ का अर्थ शीघ्र है और शीघ्रता सापेक्ष हुआ करती है। शास्त्रसिद्धान्त तो ऐसा है कि पशु एवं तिर्यक् योनियोंको भोग चुकनेपर जब जीवको मनुष्य-शरीर प्राप्त होता है तो सबसे पहले उसे पुल्कसयोनि मिलती है। उससे उत्तरोत्तर कई जन्मोंमें स्वधर्म-पालन करते-करते वह वैश्य होता है; और तभी उसे द्विजोचित कृत्योंका अधिकार प्राप्त होता है। अतः यहाँ ‘सद्यः’ शब्दसे यही तात्पर्य है कि यदि चाण्डाल स्वधर्मनिष्ठ रहकर भगवच्चिन्तन करेगा तो उसे एक-दो जन्मके पश्चात् ही द्विजत्वकी प्राप्ति हो जायगी; अनेकों जन्मोंमें नहीं भटकना पड़ेगा। यह क्रम स्वधर्मनिष्ठोंके ही लिये है। स्वधर्मका आचरण न करनेपर तो शूद्रको भी पुनः चाण्डाल- योनि प्राप्त होती है। जैसे कहा है— कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च। वेदाक्षरविचारेण शूद्रश्चाण्डालतामियात्॥ अर्थात् कपिला गौका दूध पीनेसे, ब्राह्मणीके साथ मैथुन करनेसे और वेदाक्षरका विचार करनेसे शूद्र चाण्डालत्वको प्राप्त हो जाता है और यदि शूद्र स्वधर्ममें ही तत्पर रहे तो उसी जन्ममें देहपातके अनन्तर स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है। ‘स्वधर्मे संस्थितः सम्यक् शूद्रोऽपि स्वर्गमश्नुते।’ अतः स्वधर्मका अतिक्रमण कभी न करना चाहिये। यदि कहो कि तत्क्षण ही क्यों न माना जाय? तो ऐसा हो नहीं सकता; क्योंकि जाति नित्य है, वह नामस्मरणमात्रसे परिवर्तित नहीं हो सकती। यदि नामस्मरणमात्रसे जाति-परिवर्तन हो सकता तो गर्दभीको भी नाम सुनाकर कामधेनु बनाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं होता। जाति जन्मसे होती है, अतः उसका परिवर्तन जन्मान्तरमें ही हो सकता है। जिस प्रकार गौ एवं गर्दभादि योनियाँ हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण और चाण्डालादि भी योनियाँ हैं। श्रुति कहती है— ‘ब्राह्मणयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ तात्पर्य यह है कि चाहे जाति-परिवर्तन हो या

२५६ भक्तिसुधा न हो, परंतु नामस्मरणसे चाण्डाल भी परम पवित्र अवश्य हो सकता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि उसकी अस्पृश्यता निवृत्त हो जाती है। अपवित्रता दो प्रकारकी है; जातिनिमित्तक और कर्मनिमित्तक। कर्मनिमित्तक पातित्य पुण्य-कर्मसे निवृत्त हो सकता है; किंतु जातिनिमित्तक पातित्य कर्मसे निवृत्त नहीं हो सकता। चाण्डालका पातित्य जातिनिमित्तक है। अतः चाण्डाल शरीर रहते हुए उसकी अव्यवहार्यताका प्रयोजक पातित्य निवृत्त नहीं हो सकता। किंतु भगवत्स्मरणसे वह कर्मजनित पातित्यसे मुक्त होकर शुद्धान्तःकरण हो जाता है और उसके द्वारा वह भगवत्प्राप्ति भी कर सकता है; उसका कुल पवित्र हो जाता है और उसे परलोकमें वह गति प्राप्त होती है, जो भक्तिहीन ब्राह्मणके लिये भी दुर्लभ है। इसीसे भगवान्ने भी कहा है— मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९।३२) अतः सिद्ध हुआ कि वह भजनानन्दचन्द्र कुत्सितोंको भी सुख प्रदान करता है, इसलिये ककुभ है। 'प्रियः' भी उस भजनानन्दचन्द्रका ही विशेषण है। वह भजनानन्दचन्द्र मानो विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभी प्राणियोंके परम प्रेमका आस्पद है। वह लोकमनोऽभिराम होनेके कारण विषयी पुरुषोंको और भवौषध होनेके कारण मुमुक्षुओंको प्रिय है तथा जीवन्मुक्तोंको भी वह अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि इसीके कारण उन्हें भगवत्सान्निध्यरूप परमोत्कृष्ट वैभव प्राप्त हुआ है। इसीसे श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) अतः बहुतसे अद्वैतनिष्ठ तत्त्वज्ञजन भी कल्पित भेदको स्वीकारकर निश्छलभावसे अति तत्परतापूर्वक भगवान्‌की भक्ति किया करते हैं, जैसा कि कहा है— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्॥ स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ अर्थात् पूर्ण अद्वैतपद सुभक्तोंद्वारा फलाभिसन्धिरूप कैतव (कपट)-से रहित होकर उपासित होता है; क्योंकि जो लोग लौकिक या पारलौकिक अभिलाषाओंसे पूर्ण होंगे, उनकी उपासना कैतवशून्य नहीं हो सकती। हाँ, जो मुक्त हो गया है उसे अवश्य किसी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रहती; अतः वही निष्कपट उपासना भी कर सकता है। इससे निश्चय हुआ कि सुभक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उनके द्वारा वह अद्वयतत्त्व अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उपासित होता है। जिन लोगोंने समस्त प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है, वे ही किसी पदार्थमें आसक्ति और प्राप्तव्य-बुद्धि न होनेके कारण अद्वयभावसे उसकी अकैटव उपासना कर सकते हैं, परंतु यहाँ शंका होती है कि यदि उन जीवन्मुक्तोंको कोई प्रयोजन ही नहीं होता तो वे भजनमें प्रवृत्त ही क्यों होंगे? इस सम्बन्धमें हमारा कथन है कि जीवन्मुक्त महात्माओंपर शास्त्रका शासन नहीं होता; क्योंकि वे कृतकृत्य हो जाते हैं, जैसा कि कहा है— गुणातीतः स्थितप्रज्ञो विष्णुभक्तश्च कथ्यते। एतस्य कृतकृत्यत्वाच्छास्त्रमस्मान्निवर्तते॥ अर्थात् प्रथम कोटिमें साधक यथाविधि वैदिक और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उपासनाद्वारा चित्तके दोषोंको निवृत्त करता है; फिर श्रवण, मनन और निदिध्यासनद्वारा भगवान्‌का साक्षात्कार करनेपर वह गुणातीत, जीवन्मुक्त या स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। इसी क्रमसे कर्म और उपासनामें पूर्वमीमांसा, श्रवणमें उत्तरमीमांसा, मननमें न्याय और वैशेषिक तथा निदिध्यासनमें सांख्य और योगदर्शनका कार्य समाप्त हो जाता है। इस प्रकार कृतकृत्य हो जानेके कारण फिर अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण शास्त्र यद्यपि उस महापुरुषसे निवृत्त हो जाता है तथापि अपने पूर्वाभ्यासके कारण उससे कर्म और उपासना स्वभावतः होते रहते हैं। श्रीमद्मधुसूदन स्वामी कहते

श्रीरासलीलारहस्य २५७ हैं—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' अर्थात् जिस प्रकार उनमें स्वभावसे ही अद्वेष्टृत्वादि गुण रहते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌का भजन करना भी उनका स्वभाव ही है। यहाँ एक शंका यह भी होती है कि भक्ति तो भेदमें होती है और तत्त्वज्ञोंकी अभेददृष्टि रहा करती है, फिर वे भक्तिभावमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? इसपर वे कहते हैं—‘विभेदभावमाहृत्य' अर्थात् वे भेदभावका अध्याहार करके भगवान्‌का भजन करते हैं। इस प्रकारका काल्पनिक भेद सब प्रकार मंगलमय ही है। इसीसे कहा है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् प्राप्ते बोधे मनीषिणा। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिश्चेत्सा तु मुक्तिशताधिका ॥ अर्थात् द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नहीं होता; जिस समय विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय तो भक्तिके लिये कल्पना किया हुआ द्वैत अद्वैतकी भी अपेक्षा सुन्दर है। यदि पारमार्थिक अद्वैतबुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैतबुद्धि रखी जाय तो ऐसी भक्ति तो सैकड़ों मुक्तियोंसे भी बढ़कर है। भाष्यकार भगवान् श्रीशंकराचार्यजीकी भक्ति भी ऐसी ही थी; इसीसे वे कहते हैं— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः॥ अर्थात् हे नाथ! यद्यपि आपका और मेरा भेद नहीं है तथापि मैं आपका ही हूँ, आप मेरे नहीं हैं; क्योंकि तरंग ही समुद्रका होता है, समुद्र तरंगका कभी नहीं होता। इसी विषयमें किसी भावुकका कथन है— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ अर्थात् प्रियतमा चाहे तो प्रणयविधिसे प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहार करे और चाहे उसके चरणयुगलकी परिचर्यामें लगी रहे—बात एक ही है। इसी प्रकार जिसे परमार्थबोध प्राप्त हो गया है, वह चाहे तो निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और चाहे भगवान्‌के भजन-पूजनमें लगा रहे—कोई भेद नहीं है। जो लोग विचारशून्य हैं, उन्हींकी दृष्टिमें भगवान्‌का आत्मत्वेन साक्षात्कार उनका अपमान है। यदि विचार करके देखा जाय तो इस प्रकारका अभेद तो प्रेमातिशयकी रीति ही है। प्रेमका अतिरेक होनेपर तो भेदभावकी तिलांजलि हो ही जाती है। जो अरसिक हैं, उत्कृष्ट प्रेमातिशयके रहस्यको जाननेवाले नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें प्रियतमाका प्रियतमके वक्षःस्थलमें विहार करना अयुक्त हो सकता है; किंतु रसिकजन तो जानते हैं कि प्रेमातिरेकमें ऐसा ही हुआ करता है। अतः अभेदरूपसे स्वरूप-साक्षात्कार हो जानेपर भी काल्पनिक भेद स्वीकार करके निष्कपट भावसे भक्ति हो ही सकती है। तत्त्वज्ञोंके यहाँ ऐसी ही भक्ति स्वीकार है। इस प्रकार यह भजनानन्दचन्द्र विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभीके लिये प्रिय है। इसके सिवा और भी वह भजनानन्दचन्द्र कैसा है?–'दीर्घदर्शनः–दीर्घं अनपबाध्यं दर्शनं यस्य' अर्थात् जिसका दर्शन-ज्ञान किसीसे बाधित नहीं होता। जो ज्ञान भ्रमात्मक होता है, वह तो ज्ञानान्तरसे बाधित हो जाता है; किंतु यह भजनानन्दचन्द्र ज्ञानान्तरसे बाधित होनेवाला नहीं है, यह ज्ञानान्तराबाध्य भजनानन्दचन्द्र चर्षणियोंके शोकका मार्जन करता तथा प्राग्भवा तमोव्याप्ता बुद्धिके सत्त्वात्मक प्रधान भागको अनुरागात्मक कुंकुमसे लेपन करता हुआ उदित हुआ, जिस प्रकार कोई चिरप्रोषित प्रियतम प्रवाससे लौटकर अपनी प्रियतमाके शोकाश्रुओंका मार्जन करते हुए करधृत कुंकुमसे उसके मुखका लेपन करता है। अथवा यों समझिये कि जिस समय भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय प्राची— नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीका मुख विलेपन करते

२५८ भक्तिसुधा हुए उडुराज ( श्रीकृष्णचन्द्र) उस विहारस्थलमें उदित हो गये। यहाँ ‘उडुराज’ शब्दमें उपमालंकार है अर्थात् श्रीकृष्णरूप चन्द्र जो कि चन्द्रमाके समान हैं, वे प्रियतमा श्रीराधिकाजीका मुखविलिम्पन करते हुए उस विहारस्थलमें इसी प्रकार प्रकट हुए, जैसे चन्द्रमा प्राची दिशाको अनुरंजित करते हुए उदित होते हैं। उडुराज जिस प्रकार प्राची दिशाके मुख यानी प्रधान भागको करों (किरणों)-से अनुरंजित करते हैं, उसी प्रकार यहाँ क्रीड़ाभूमिमें श्रीकृष्णचन्द्र करकमलोंमें ली हुई होलिका-रोलिका (होलीके गुलाल)-से श्रीराधिकाजीका मुखमण्डल अनुरंजित करते हैं। जिस प्रकार उदयकालीन चन्द्रमा उदयरागसे प्राची दिशा और समस्त आकाशको अरुण कर देता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् कृष्णने प्रकट होकर अपने शन्तम-कर अर्थात् मंगलमय कर-व्यापारोंसे समस्त व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको अरुण कर दिया। यहाँ ‘शन्तमैः करैः’ यह भगवान्‌के समस्त मंगलमय अंगोंका उपलक्षण है। वे अंग मंगलमय हैं और मंगलकारक भी हैं; क्योंकि भगवान् ‘आनन्दमात्रकरपाद- मुखोदरादि’ तथा— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दमूर्तये । सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे ॥ —आदि वाक्योंके अनुसार शुद्ध सन्मात्र, चिन्मात्र और आनन्दमात्र तत्त्व हैं तथा ‘एष ह्येवानन्दयति’ इस श्रुतिके अनुसार वे ही सब प्राणियोंको आनन्दित भी करते हैं, अतः वे आनन्दप्रद भी हैं। उन्होंने नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीके समान अन्य व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको भी सुखमय और सुखावह कर- व्यापारोंसे अरुण किया तथा उनके कर्णरन्ध्रोंको वेणुरागसे और हृदयाकाशोंको प्रेमरागसे रंजित कर दिया। इस प्रकार वे उदित हुए। यहाँ ‘करैः’ में जो बहुवचन है, वह स्वरूपोंकी बहुलताके अभिप्रायसे भी हो सकता है; क्योंकि यहाँ रासलीलामें भगवान्‌को अनेक रूपसे आविर्भूत होना है। अतः भगवान्‌के अनेक रूपोंकी अपेक्षासे बहुवचनका प्रयोग उचित ही है। व्रजांगनाओंको जो भगवान्‌के साथ विहारावसर प्राप्त न होनेका शोक था, उसे भी अपने शन्तम-कर यानी सुखप्रद लीलामय विहारविशेषोंसे ही निवृत्त करते हुए भगवान् प्रकट हुए। यहाँ ‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ इस सूत्रके अनुसार ‘मृजन्’ में भविष्यदर्थमें वर्तमानका प्रयोग हुआ है अर्थात् भगवान् अपने साथ विहार करनेका सुअवसर न मिलनेके कारण जो गोपांगनाओंको शोक था, उसकी निवृत्ति करेंगे, इसीलिये उदित हुए हैं। यहाँ— रलयोर्डलयोश्चैव सषयोर्बवयोस्तथा। वदन्त्येषां च सावर्ण्यमलङ्कारविदो जनाः ॥* इस वचनके अनुसार ‘उडुराजः’ की जगह ‘उरुराजः’ भी समझा जाता है अर्थात् जिस समय भगवान् वृन्दारण्यमें पधारे, उस समय श्रीयशोदा और नन्दबाबाको विकलता होनेकी सम्भावना हुई; क्योंकि जिस प्रकार फणि मणिको नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वे भगवान्‌से विलग नहीं रह सकते थे। अतः भगवान् अनेक रूपसे प्रकट हुए अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रकट होनेपर भी वे एक रूपसे श्रीयशोदाजीके शयनागारमें ही रहे। इसीसे उन्हें ‘उरुधा—बहुधा राजते यः स उरुराजः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उरुराज—अनेक रूपसे सुशोभित होनेवाले कहा है। यहाँ ‘प्रियः’ यह उडुराजका विशेषण है। जिस प्रकार रसिक और भक्त पुरुष दोनोंको ही चन्द्रमा प्रिय है, उसी प्रकार भगवान् भी सबके परम-प्रेमास्पद हैं। चन्द्रमामें रसिकोंका प्रेम तो शृंगाररसका उद्दीपन विभाव होनेके कारण है; किंतु साथ ही वह भक्तोंको भी अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि उसके मध्यमें जो श्यामता है, वह उन्हें हृदयाकाशमें स्थित ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूपका स्मरण दिलाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे भी अपने प्रियतमके प्रति प्रेमियोंके अनुरागकी वृद्धि होती है। देखो, चन्द्रमा अत्यन्त दूर देशमें है तो भी वह समुद्रकी अभिवृद्धिका हेतु होता है। जान पड़ता

  • अर्थात् अलंकाररहस्यज्ञ महानुभाव र और ल, ड और ल, स और ष तथा ब और व इनकी सवर्णता बतलाते हैं।

है कि मानो समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंद्वारा चन्द्रमासे मिलना चाहता है। इससे यह सूचित होता है कि प्रिय वस्तु चाहे कितनी ही दूर रहे; किंतु प्रेमीको उसके प्रति अनुरागकी वृद्धि होती है। इसीसे जब-जब पूर्णचन्द्रका उदय होता है, तभी-तभी समुद्र अत्यन्त उत्सुकतासे उससे मिलनेके लिये उत्ताल तरंगोंसे उछलने लगता है। यह सब देखकर प्रेमियोंकी ऐसी भावना हो जाती है कि जिस प्रकार यह समुद्र अपने प्रियतमतक पहुँचनेके प्रयत्नमें बारम्बार असफल होते रहनेपर भी हताश नहीं होता, उसी प्रकार हमें भी अपने प्रियतमसे निराश या निरपेक्ष नहीं होना चाहिये। इस प्रकार प्रेमियोंको प्रेमरीति सिखानेवाला, भगवान् कृष्णमें रमणेच्छा उत्पन्न करानेवाला तथा समस्त जीवोंको आनन्दित करनेवाला होनेके कारण चन्द्रमा सब प्रकारसे प्रेमास्पद ही है। इसी प्रकार सर्वान्तरात्मा श्रीभगवान् भी सभीके परम-प्रेमास्पद हैं; क्योंकि कोई पुरुष कैसा ही नास्तिक या देहाभिमानी क्यों न हो, उसे भी अपनी आत्मामें ही निरतिशय प्रेम होता है। यह चन्द्रमा कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घ- कालान्तरे अनेकरात्र्यवसाने दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पीछे होता है; क्योंकि पूर्णचन्द्र एक मासके अनन्तर ही उदित होता है। यदि इसे भगवान्‌का विशेषण माना जाय तो इस प्रकार अर्थ होगा—'दीर्घमबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिनका दर्शन दीर्घ यानी अबाध्य है; क्योंकि 'न हि द्रष्टुर्दृष्टे- र्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्' इस सूत्रके अनुसार सर्वसाक्षी भगवान्‌की दर्शनशक्तिका लोप कभी नहीं होता। भगवान् कृष्ण प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही 'प्रियः'—परप्रेमास्पद हैं तथा सर्वान्तरतम प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही सर्वद्रष्टा हैं। जो सर्वद्रष्टा है, वह किसीका दृश्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह जिसका दृश्य होगा, उसका द्रष्टा नहीं हो सकता और ऐसा होनेपर उसका सर्वद्रष्टृत्व बाधित हो जायगा। अतः सर्वद्रष्टा श्रीभगवान्की दर्शनशक्तिका किसी समय लोप नहीं होता। दर्शन दो प्रकारका है—बौद्धदर्शन और पौरुषेय- दर्शन। भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणका उन इन्द्रियोंके विषयोंसे संश्लिष्ट होकर तदाकार हो जाना बौद्धदर्शन है। यह बुद्धिका परिणाम है। यहाँ बुद्धि ही इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको व्याप्तकर उनके आकारमें परिणत हो जाती है। इसीको कहीं-कहीं पौरुषेयदर्शन भी कहा है। बुद्धिमें जो पुरुषत्वका आरोप होता है, उसीके कारण बुद्धिनिष्ठ दर्शन पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमें जो विवेक-ज्ञान और शब्दादि- ज्ञान है, इनका अपनेमें आरोप करके यह पुरुष 'अहं विवेकवान्' और 'अहं शब्दज्ञानवान्' प्रतीत होता है। वस्तुतः तो यह आरोप भी बुद्धिमें ही है। पुरुषसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि यह आरोप बुद्धिनिष्ठ है तो इसकी पुरुषनिष्ठता प्रतीत नहीं होनी चाहिये, बुद्धिनिष्ठता ही अनुभूत होनी चाहिये। किंतु बुद्धि प्रकृतिका विकार होनेके कारण जड़ है, अतः यह आरोप अनुभवका विषय (दृश्य) ही होना चाहिये, अनुभवरूप नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात तो है नहीं; इसलिये इसे बुद्धिनिष्ठ ही क्यों माना जाय? इसका उत्तर यह है कि यह बुद्धिनिष्ठ आरोप बुद्धिमें पुरुषत्वकी भ्रान्ति करानेके कारण बुद्धिनिष्ठ होनेपर भी पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है; इसीसे वस्तुतः वह आरोप अनुभवका विषय होनेपर भी अनुभवरूप-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार सिद्धान्ततः यही निश्चय हुआ कि बौद्ध बोध ही पौरुषेय बोध-सा प्रतीत होता है। पौरुषेय बोध बुद्धिबोधसे भिन्न नहीं है। इसीसे कहा है—'एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्'। यहाँ तत्तदाकारवृत्ति ही 'ख्याति' कही गयी है। व्युत्थान- अवस्थामें पुरुष ख्यात्याकार हो जाता है—'वृत्ति- सारूप्यमितरत्र'। वृत्तियाँ शान्त, घोर और मूढ़भेदसे