भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वत्र ‘ताः इमाः’ आदि सर्वनामोंसे ही वर्णन किया गया है। एक बार भगवान्ने भी उद्धवजीसे कहा था— तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण। क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।११) हे उद्धव! उन व्रजांगनाओंने अपने परम प्रियतम मेरे साथ वे अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ आधे क्षणके समान बिता दी थीं। जिस प्रकार समाधिस्थ योगियोंको अत्यन्त दीर्घ काल भी कुछ मालूम नहीं होता, उसी प्रकार मेरे साथ उन्हें वे रात्रियाँ कुछ भी न जान पड़ीं। किंतु अब मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये कल्पके समान हो जाती थीं। यहाँ ‘मया’ शब्दमें भी विलक्षणता है। इससे अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध परब्रह्म भी ग्रहण किया जा सकता है। उसके साथ योग होनेपर भी समय कुछ मालूम नहीं होता। अतः इससे पूर्ण योगीन्द्र भी ग्रहण किये जा सकते हैं। परंतु यहाँ अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध ब्रह्म अभिप्रेत नहीं है, बल्कि वृन्दावनगोचर परमानन्द- कन्द श्रीकृष्णचन्द्र ही अभिप्रेत हैं। फैली हुई वस्तु यदि इकट्ठी हो जाय तो उसमें कुछ विलक्षणता हो ही जाती है। अतः जो व्यापक पूर्णतत्त्व श्यामसुन्दररूपमें वृन्दारण्यमें गोचर हुआ, उसमें विलक्षणता होनी ही चाहिये। अथवा ‘वृन्दावने गाः चारयतीति वृन्दावन- गोचरः’—वृन्दावनमें गौएँ चरानेके कारण भगवान् वृन्दावन-गोचर हैं। जो परब्रह्म निर्विशेष है, वही यदि वृन्दावनमें गौ चरानेवाला हो जाय तो उसके प्रति प्रेमातिशय होना ही चाहिये; क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म स्वारसिकी प्रीतिका विषय नहीं हो सकता। उसका विषय तो यह वृन्दावनस्थ कृष्ण ही हो सकता है। स्वारसिकी प्रीति प्रायः सजातीयोंमें ही होती है। भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम तो मनुष्यरूपमें अभिव्यक्त हुए; फिर गोप होनेके कारण उनके सजातीय ही थे। इसलिये ऐश्वर्यादिशून्य होनेके कारण उनके प्रति गोपोंका निःसंकोच भाव रहता था। इसीसे गोपालरूपसे प्रकट हुए भगवान्के प्रति उन गोपालिकाओंकी निःशंक प्रीति हुई। अथवा ‘वृन्दावने वृन्दावनवर्तिनां गाः इन्द्रियाणि चारयति स्वस्मिन् प्रवर्तयति इति वृन्दावनगोचरः’— वे वृन्दावनवर्ती गोप, बालक, गोपांगना, वत्स, पशु, पक्षी और सरीसृप सभीकी इन्द्रियोंको अपने प्रति प्रवृत्त करते हैं, इसलिये वृन्दावनगोचर हैं। अहो! जो भगवान् ब्रह्मादिकी भी इन्द्रियोंके अगोचर हैं, जो बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी इन्द्रियोंके भी विषय नहीं होते, वे ही अपनी असीम कृपासे वृन्दावनवर्ती जीवोंकी समस्त इन्द्रियोंके विषय हो रहे हैं। इसीसे कहा है— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।११) उन परम पुण्यवान् व्रजवासियोंने उन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ क्रीड़ाएँ कीं, जो सत्पुरुषोंके लिये साक्षात् ब्रह्मानन्दमूर्ति, भावुक भक्तोंके परम इष्टदेव और मायामोहित पुरुषोंके लिये नरबालक थे। भावुकोंका तो ऐसा कथन है कि जो ब्रह्म औपनिषदोंके लिये केवल वृत्तिव्याप्य है, बड़े-बड़े भक्तोंकी भी केवल भावनाका ही विषय है और जो अज्ञानियोंके लिये एक बालकमात्र है, वही जिन्हें खेलनेको मिल गया, उन व्रजवासियोंके सौभाग्यकी क्या महिमा कही जाय? ‘ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः॥’ (श्रीमद्भा० १०।१५।१९) उन गँवार ग्वालबालोंके साथ वे ग्रामीणोंकी-सी ही चेष्टाएँ किया करते थे। यह उनके प्रेमातिशयका ही फल था।