भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished778 पृष्ठ
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- श्रीरामलीलारहस्य * २३१ परमरस समर्पण करनेवाली उन रात्रियोंको देखकर। यहाँ 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है। उनमें मुख्य विलक्षणता तो यही थी कि जिन भगवान् श्रीकृष्णके विप्रयोगमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगोंके समान बीतता था, उन्होंने इन रात्रियोंको अपने सहवास-सौभाग्यके लिये नियुक्त किया था। व्रजांगनाएँ संसारमें सबसे बड़ा सौभाग्य क्या समझती थीं ? वे कहती हैं— अक्ष्णवतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतौर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) यहाँ व्रजांगनाओंने संसारभरमें सबसे बड़ा फल यही बताया है कि जिन्हें विधाताने नेत्र दिये हैं, वे अपने समवयस्क बालकोंके साथ पशुओंको गोष्ठमें प्रवेश कराते हुए दोनों नन्दकुमारोंके अनुरक्त- कटाक्षमोक्षमण्डित वंशी-विभूषित मुखारविन्दका पान करें। इसके सिवा यदि कोई और भी फल हो सकता हो तो हम उसे जानतीं नहीं। स्मरण रहे, ये श्रुतियाँ हैं—साक्षात् श्रुतिदेवियाँ हैं, यदि ये ही नहीं जानतीं तो और कौन जानेगा ? इस श्लोकमें 'व्रजेशसुतयोः' यह तो द्विवचन है, किंतु 'वक्त्रम्' एकवचन है। इसका क्या रहस्य है ? इसका तात्पर्य यह है कि गोपांगनाओंका अभिमत तो केवल भगवान् श्रीकृष्णका ही मुखचन्द्र है; परंतु परकीया थीं न, इसलिये अपना भाव छिपानेके लिये द्विवचन दिया। किंतु जबतक वे प्रेमातिशयसे विभोर न हुईं, तबतक तो भावगोपन कर लिया, पर प्रेमातिरेक होनेपर वे अपनेको न सम्हाल सकीं और उनके मुखसे 'वक्त्रम्'...... 'अनुवेणु जुष्टम्' निकल ही गया। उस वेणुजुष्ट मुखका विशेषण 'अनुरक्तकटाक्ष- मोक्षम्' दिया है। यह उसकी मधुरता और लावण्य सूचित करनेके लिये है अर्थात् जिन भगवान् श्रीकृष्णके मुखचन्द्रपर अनुरागिणी गोपांगनाओंके कटाक्षबाण छूटते थे; अथवा जिस मुखमें अनुरागिणी व्रजांगनाओंके लिये कटाक्षमोक्ष होता था। अतः भगवान्का रसस्वरूप मुख ही व्रजबालाओंका ध्येय है, उन्हें भगवत्सम्बन्ध ही परम अभिलषित था। इसीके लिये वे दूसरोंसे ईर्ष्या भी करती थीं। एक जगह वे कहती हैं— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) उन्हें इस समय यह भी ध्यान नहीं था कि ये हरिणियाँ चेतन हैं या अचेतन और इन्हें वस्तुतः भगवान्के प्रति अनुराग है या नहीं। इसीसे वे कहती हैं कि इन हरिणियोंका जो प्रेमरसप्लुत नेत्रोंसे निरीक्षण है, उसके द्वारा वे मानो भगवान्की पूजा ही करती हैं। यही नहीं, वे वहाँकी भीलनियोंके सौभाग्यकी भी सराहना करती हैं— पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) वृन्दारण्यके जो तृण-गुल्म-लतादि हैं, उनसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका संयोग होनेके कारण उनमें जो भगवान्के पादपद्मोंमें लगा हुआ प्रियतमाओंका कुचकुंकुम लग गया है, उसके सौगन्ध्यसे विमुग्ध होकर कामज्वरसे सन्तप्त हुई भीलनियाँ उस कुंकुमको अपने हृदय और मुखमें लगाकर उस तापको शान्त करती हैं। वे बड़ी भाग्यशीला हैं। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ अनुरागिणी व्रजांगनाओंका संयोग करानेवाली इन रात्रियोंकी विलक्षणताका वर्णन कौन कर सकता है ? जबसे भगवान्ने कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तभीसे गोपांगनाओंकी दृष्टि इन्हीं रात्रियोंपर लगी रहती थी। इन रात्रियोंका