भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकि प्रेमातिशयके कारण भगवत्-सम्भोगकी प्रतीक्षाकमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगके समान हो रहा था, भगवान् क्यों उपेक्षा कर रहे थे? इस समय भगवान्की उदासीनता देखकर मानो महाराज परीक्षित् मन-ही-मन उनकी निन्दा कर रहे थे, इतनेहीमें श्रीशुकदेवजी कहने लगे—'भगवानपि ता रात्री:' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) अर्थात् व्रजांगनाएँ तो पहलेसे ही अभिलाषा रखती थीं; परंतु आज भगवान्ने भी उनके साथ तादात्म्यापत्तिरूप रमणकी इच्छा की। इससे यह भी सूचित होता है कि भगवान्की इच्छा भक्तोंकी भावनाका अनुसरण किया करती है। कहा भी है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ × × × × स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० ३।९।११; १०।१४।२) भावुक लोग अपनी-अपनी भावनामयी बुद्धिसे अरूप, अनाम, अप्रमेय परब्रह्मका जिस-जिस रूपसे ध्यान करते हैं, वैसा ही रूप भगवान्को धारण करना पड़ता है। इसीसे यद्यपि अभीतक भगवान्को रमणकी इच्छा नहीं थी तथापि गोपांगनाओंकी भावनाके अधीन होनेसे उनमें भी रमणेच्छाका प्रादुर्भाव हो गया। किंतु इन व्रजांगनाओंका भाव तो 'तत्सुखसुखित्व' है। इन्हें अपने सुखकी कुछ भी इच्छा नहीं है। संसारमें तो अपने सुखकी कामनासे ही सबसे प्रीति की जाती है—'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'। (बृहदारण्यक० २।४।५) तथापि गोपांगनाओंका प्रेम तो लोक तथा वेदसे अतीत ही है। अतः उन्हें अपने लिये भगवान्में प्रेम नहीं था, बल्कि वे तो भगवान्के लिये ही प्राण धारण करती थीं। उनका तो यही लक्ष्य था कि हे मनमोहन ! ये प्राण और देह आपके काम आते हैं, इसीसे हम इन्हें धारण करती हैं, नहीं तो हमें इनकी क्या आवश्यकता है? भगवान्का वियोग होनेपर भी उन्होंने इसीलिये अपने शरीरादिको रख छोड़ा था कि वे भगवत्सेवाके साधन थे। उनका कहना था कि श्रीकृष्णसे वियुक्त होकर भी जो हम जीवित हैं, इसका मुख्य कारण यही है कि हमारे प्राण हमारे अधीन नहीं हैं। विधाताने शरीर तो हमें दिया है; किंतु प्राण श्रीकृष्णके अधीन कर दिये हैं। उनका कथन था—'भवदायूषां नः' अर्थात् आप ही हमारी आयु हैं। अतः उनका जीवन भगवान्के सुखके लिये ही था। हाँ, उन्हें सुख पहुँचानेमें उनको भी सुख मिलता ही था। जो पुरुष भगवान्को सुगन्धित माला और पुष्प समर्पण करता है, उसे भी सान्निध्यवश उनका सुवास मिलता ही है। किंतु यह सुखानुभव आनुषंगिक है, उसमें अपना सुख अभिमत नहीं होता। इस प्रकार जैसे गोपांगनाएँ भगवान्के ही सुखमें सुख माननेवाली हैं, वैसे ही भगवान् भी उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये सारी लीलाएँ करते हैं। यह तो उनका पारस्परिक भाव है। किंतु इसका पर्यवसान कहाँ होता है? इस सम्बन्धमें कह सकते हैं कि वह लोककल्याणके ही लिये है। परंतु यदि वे दोनों ही निरपेक्ष हैं, दोनोंको ही आप्तकाम होनेके कारण सुखकी अपेक्षा नहीं है तो फिर यह लीला किसे सुख पहुँचानेके लिये है? ठीक है, सिद्धान्त भी यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण और गोपांगनाओंके रूपमें एक ही परमानन्द-सुधासिन्धु प्रस्फुटित हुआ है तो दोनों ही आप्तकाम हैं। इससे लीलाका कोई प्रयोजन ही नहीं रहता और लीला हुई ही थी, यहाँ यह भी प्रश्न हो सकता है कि यह विभाग ही क्यों हुआ? वस्तुतः यदि विचार किया जाय तो इसका प्रयोजन कुछ भी नहीं है, 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) यह विभाग केवल आत्मसुखके ही लिये है। किंतु यह विभाग चाहे लोककल्याणके लिये हो और चाहे 'एकाकी न रेमे'—अकेला रममाण नहीं