भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहेतु होता है, वैसे ही भगवान् भी अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीके कृपापात्रोंपर ही अनुग्रह करते हैं। जिस प्रकार मंगलमय सुधासिन्धुमें जो मधुरिमा है, वह उसका स्वरूप ही है, उसी प्रकार परमानन्दसिन्धु भगवान्की जो आह्लादिनी-शक्ति है, वह भगवान्से अभिन्न ही है। जिस प्रकार घटादिका प्रकाश अन्तःकरण- वृत्युपहित चेतनसे ही होता है, किंतु अन्तःकरणके प्रकाशके लिये किसी अन्य अन्तःकरणकी आवश्यकता नहीं होती तथा अन्तःकरणादि तो स्वतन्त्रतासे चेतनके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर सकते हैं, किंतु घटादि अन्तःकरणवृत्युपहित होनेपर ही उसका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर सकते हैं, उसी प्रकार यहाँ जो वृषभानुनन्दिनी हैं, वे तो परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके साथ निरपेक्षभावसे असाधारण रमणरूप सम्बन्धका भोग कर सकती हैं, किंतु अन्य गोपांगनाएँ ऐसा नहीं कर सकतीं। अतः उनमें भी भगवान्का सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये श्रीवृषभानुदुलारीका सम्बन्धसम्पादन करना पड़ता है। अतः पहले वे इनसे तन्मय हो लेती हैं, उसके पश्चात् भगवान्से सम्बन्ध प्राप्त करती हैं। इसीलिये योगमायाका आश्रय लिया। अथवा ‘योगाय सम्बन्धाय या माया वञ्चना तामुपाश्रितोऽपि ताः वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे’—योग जो असाधारण सम्बन्ध उसके लिये भी माया यानी वंचनाका आश्रय लेकर उन्होंने रमणके लिये मन किया। भगवान् रमणके लिये भी मायाका आश्रय लिया करते हैं। इसीसे जब ऋषि-पत्नियां गयी थीं, उस समय भी उन्होंने मायाका ही आश्रय लिया था, और उन्हें भी पातिव्रतका ही उपदेश किया था। किंतु भगवान् श्रीकृष्ण तो परब्रह्म हैं। उनका सम्बन्ध भला किसको अभीष्ट न होगा ? उनका संसर्ग ही तो परम कल्याण है। उसमें लौकिक भावोंका आरोप करना अर्थात् पारमार्थिक तत्त्वमें अपारमार्थिक भावोंका निवेश करना माया ही है। अतः ‘योगे सम्बन्धे या माया वञ्चना सा योगमाया’ ऐसा तात्पर्य समझना चाहिये। अथवा ‘अयोगमाया’ ऐसा पद मानें तो ‘अयोगाय असम्बन्धाय या माया वञ्चना सा अयोगमाया’ अयोग यानी असम्बन्धके लिये जो माया—वंचना, उसीका नाम अयोगमाया है अर्थात् अपने साथ सम्बन्ध न होने देनेके लिये जो माया है, उसका उन्होंने आश्रय लिया। ‘ताः वीक्ष्य’ वे जो पूर्वोक्त प्रकारकी गोपांगनाएँ थीं, जो इस प्रकार स्वस्वरूपानुसन्धानमें तत्पर थीं, उन्हें दयार्द्र-दृष्टिसे देखकर वंचनाको भूलकर उन्होंने रमण करनेके लिये मन किया। अथवा— ‘युज्यते इति योगा सदासंश्लिष्टरूपा या वृषभानुनन्दिनी तस्यां या माया कृपा तामाश्रित्य रन्तुं मनश्चक्रे।’ अपनी स्वस्वरूपभूता जो वृषभानुनन्दिनी उनकी प्रसन्नताके लिये रमण करनेको मन किया अर्थात् उन्हें जो रासाभिलाषा हुई, उसकी पूर्तिके लिये उन व्रजांगनाओंको देखकर रमण करनेकी इच्छा की। अथवा ‘न गच्छतीति अगा अगा चासौ मा इति अगमा, अगमायां उपाश्रितः यः स भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे’ अर्थात् जो अचला (नित्यसंगिनी) लक्ष्मीरूपा वृषभानुनन्दिनी हैं, उनमें अनुरक्त जो भगवान् उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह रासलीला श्रीराधिकाजीकी ही प्रसन्नताके लिये है। भावुकोंका ऐसा मत है कि भगवान्के जितने कृत्य हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनीकी प्रसन्नताके लिये हैं और श्रीवृषभानुसुताके जितने कृत्य हैं, वे श्रीहरिकी तुष्टिके लिये हैं। यहाँ जो अन्यान्य गोपांगनाएँ हैं, वे सब श्रीराधिकाजीकी ही अंशांशभूता हैं। यहाँ जो ‘अपि’ है, उसका तात्पर्य यह भी मालूम होता है कि व्रजदेवियोंको तो पहलेहीसे भगवान्के साथ रमणकी इच्छा थी। इस समय मानो परीक्षित्के चित्तमें इस बातका सन्ताप था कि अहो ! व्रजांगनाओंने कात्यायनी-अर्चनादि कठोर तपस्या करके भगवान्को प्रसन्न किया और भगवान्ने भी प्रसन्न होकर उन्हें अभीष्ट वर दिया; किंतु अब, जब