भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 778 में से

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पृष्ठ 234

पहले 'ताः' से तो वे गोपांगनाएँ विवक्षित थीं, जिनका भगवान्‌के साथ भृंगीकीट-न्यायसे साधनद्वारा अभेद हुआ था। दूसरे 'ताः' से वे गोपांगनाएँ कही गयीं जो समुद्र और तरंगके समान मूलतः अभिन्न थीं। यह समुद्र अचिन्त्यानन्द-सुधा-सिन्धु है। इससे एक तो तरंगोंका अभेद और दूसरा जैसे उसकी सुधासे सुधागत माधुर्यका अभेद। यह बहुत बड़ा अन्तर है। इस प्रकारकी स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ ही तीसरे 'ताः' से कही गयी हैं। जिस प्रकार जलमें मधुरता, शीतलता आदि कई गुण हैं, उसी प्रकार भगवान्‌में भी कई शक्तियाँ हैं। भगवान्‌की परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीवृष- भानुनन्दिनी और उन्हींकी अवान्तर विकासरूपा ललिता- विशाखा आदि तीसरे 'ताः' से अभिप्रेत हैं। उन श्रीवृषभानुनन्दिनीकी पदनख-चन्द्रिकाकी जो विभिन्न दीप्तियाँ हैं, उन्हींके अन्तर्गत ये ललिता-विशाखा आदि हैं। भगवान्‌की सर्वान्तरतम दिव्यातिदिव्य शक्ति तो श्रीराधिका ही हैं, उन्हींकी अंशभूता उनकी प्रधान सहचरी हैं। यद्यपि उनमें तारतम्य है तथापि वे हैं सब-की-सब परमान्तरंगा ही। यहाँ जो 'अपि' शब्द आया है, उसका अर्थ 'च', 'और' समझना चाहिये अर्थात् शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और उन त्रिविध गोपांगनाओंको देखकर भगवान्‌ने रमण करनेको मन किया। किंतु उन्होंने मन किया कैसे? इसपर कहते हैं कि स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म भगवान्‌ने आप्तकाम होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर मन बनाया। योगमायाका आश्रय लेनेसे क्या अभिप्राय है? 'योगाय स्वेन सह तासां संश्लेषाय या माया कृपा तामुपाश्रित्य' अर्थात् योग यानी अपने साथ संश्लेष करनेके लिये जो माया-कृपा, उसका आश्रय लेकर। यहाँ 'माया' शब्दका अर्थ कृपा है, 'माया कृपायां दम्भे च'। अतः कृपापरतन्त्र भगवान्‌ने स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म होकर भी केवल कृपावश मन किया। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि— 'युज्यते—सदा संश्लिष्यत इति योगा, महा- लक्ष्मीः परमान्तरङ्गशक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी, तस्या माया कृपा योगमाया, तामुपाश्रित्य।' अर्थात् जो युक्त यानी सदा संश्लिष्ट रहती हैं, वे परमान्तरंग-शक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी ही योगा हैं, उनकी माया—कृपा ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर रमणकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि अपनी कृपाके अधीन होकर नहीं, बल्कि जो श्रीवृषभानुसुताकी कृपापात्रभूता तथा उनके चरणकमल- मकरन्दका आस्वादन करनेवाली व्रजांगनाएँ हैं, उनकी प्रसन्नता-सम्पादन करनेके लिये ही भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि ऐसा करनेसे ही वे अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीको प्रसन्न कर सकते थे। जो मधुरभावके उपासक हैं, उनकी यह पद्धति है कि वे पहले अपने आचार्योंका आश्रय लेते हैं, फिर उनकेद्वारा गोपांगनाओंकी प्रसन्नताका लाभ करते हैं, उनकी प्रसन्नतासे उन्हें प्रधान-प्रधान यूथेश्वरियोंका प्रसाद प्राप्त होता है और तत्पश्चात् श्रीहरिकी चिरसंगिनी श्रीराधिकाजीकी कृपा होती है। इस प्रकार श्रीप्रियाजीके कृपापात्र होनेपर ही भगवान्‌का अनुग्रह होता है। इसमें यह भी भेद है कि शुद्ध परब्रह्मका पदार्थोंके साथ सम्बन्ध नहीं होता— 'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः यह मानना पड़ता है कि वृत्युपहित चेतन ही पदार्थोंका प्रकाशक होता है। यदि शुद्ध चेतन ही पदार्थोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता तो उसकी सत्ता तो सर्वत्र है; परंतु घटकुड्यादिमें पदार्थोंको प्रकाशित करनेका सामर्थ्य नहीं है। इसके सिवा चेतनकी सत्तामात्रसे ही पदार्थोंकी प्रतीति भी नहीं होती; क्योंकि चेतनका संश्लेष तो सन्निकृष्ट- असन्निकृष्ट सभी वस्तुओंके साथ है। परंतु प्रकाश केवल उन्हीं वस्तुओंका होता है, जिनके साथ प्रमाणजन्य-वृत्त्यभिव्यक्त चेतनका संसर्ग होता है। उसी प्रकार यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णका सम्बन्ध सभी व्रजांगनाओंसे है तथापि जिस प्रकार स्वप्रकाश चेतन अन्तःकरणादिवृत्युपहित होकर ही वस्तुओंके प्रकाशका

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