भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

श्रीकृष्ण या गोपियाँ? सो कोई नहीं, बल्कि उन दोनोंका जिस प्रेमपाशसे बन्धन है, वह प्रेमशृंखला ही उनकी ध्येय होगी; क्योंकि उसके अधीन तो वे दोनों ही हैं। जिस प्रकार यदि किसी ऊँट या बैलको पकड़ना होता है तो उसकी नकेल या नाथ ही पकड़ते हैं, उसी प्रकार इस प्रेम-बन्धनको पकड़नेसे श्रीकृष्ण और गोपियाँ दोनों ही स्वाधीन हो जायँगे। इसके सिवा इस लीलासे सर्वसाधारणको यह भी उपदेश मिलेगा कि इस प्रकारके नायक-नायिकाओंमें जैसा उत्कट स्नेह होता है, वैसा ही उन्हें भी अपने इष्टदेवोंके प्रति रखना चाहिये। इन व्रजांगनाओंमें जो अन्यपूर्विका हैं, उनसे यह उपदेश भी मिलता है कि जिस प्रकार वे लौकिक- वैदिक शृंखलाओंका विच्छेद करके भगवत्परायण रहती थीं, उसी प्रकार साधकोंको भी सारे व्यवधानोंको छोड़कर अपने ध्येयमें संलग्न होना चाहिये। साधारण पुरुषोंको इससे भगवान्‌की उदारता और करुणाका भी ज्ञान होता है। प्राणियोंमें सदा ही कोई-न-कोई त्रुटि तो रहा ही करती है। उस समय अपनी हीनताको देखकर अनाश्वास हो जाना स्वाभाविक ही है। जहाँ ऐसा नियम है कि प्राणी वैदिक एवं स्मार्त उपासना करके ही भगवान्‌को प्राप्त करनेकी योग्यता पा सकता है, वहाँ जो सर्वसाधनहीन स्थूलदर्शी लोग हैं, उन्हें ऐसी आशा होना कि भगवान् हमपर भी उन गोपांगनाओंके समान कृपा करेंगे, बहुत बड़ा आश्वासन है। आगे चलकर कहा है कि वे गोपियाँ जारभावसे भगवान्‌को प्राप्त हुईं—‘जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।’ (श्रीमद्भा० १०।२९।११) अहो! जो गोपांगनाएँ वैदिक और स्मार्त-शृंखलाओंका उल्लंघन करके भगवत्परायण हुईं और जिन भगवान्‌का सर्वथा शुद्ध- भावसे आश्रय लेना चाहिये था, उनका ऐसे दूषित भावसे आश्रय लिया, उन गोपांगनाओंका भी भगवान्‌ने कल्याण कर दिया। यह ऐसी ही बात हुई जैसे पूतनाने विषलिप्त स्तनपान कराकर भी परमपद प्राप्त किया। जिन भगवान्‌का सर्वस्व समर्पण करके अर्चन करना चाहिये था, उन्हें विषपान कराना महान् अपराध था तो भी विषयके माहात्म्यसे उसने सद्गति प्राप्त की। उसी प्रकार यद्यपि कामबुद्धिसे भगवान्‌का आश्रय लेना अत्यन्त अनुचित है; क्योंकि यह सोपाधिक प्रेम है—कामवासनाकी पूर्तितक ही रहनेवाला है—और भगवान्‌को सर्वभूतान्तरात्मा होनेके कारण निरुपाधिक प्रेमसे ही अभ्यर्चित होना चाहिये तथापि उनका परम हित ही हुआ। इसके सिवा इसमें एक दोष यह भी हो सकता था कि जो भगवान् उनके वास्तविक परमपति थे, उनमें तो उन्होंने जारबुद्धि की और जो अस्वाभाविक प्राकृत पति थे, उनमें पतिबुद्धि की। जिस प्रकार तरंगोंका मुख्य पति तो समुद्र ही है, तरङ्गान्तरोंसे तो उनका आगन्तुक-सम्बन्ध है, उसी प्रकार जीवका स्वाभाविक-सम्बन्ध तो अपने आश्रयभूत परब्रह्मसे ही है, अन्य जीवोंसे तो केवल आगन्तुक- सम्बन्ध है, इसलिये वह अनित्य भी है, अतः सर्वान्तर्यामी भगवान्‌का जारबुद्धिसे आश्रय लिया गया—यह भी एक बड़ा दोष था। ये सारे अनौचित्य ‘अपि’ शब्दसे सूचित होते हैं। किंतु ये सब दोष होनेपर भी भगवान्‌से सम्बन्धित होनेके कारण गुण हो गये। यह आलम्बनका ही माहात्म्य था। उस जारबुद्धिसे यह गुण हो गया कि जिस प्रकार जारके प्रति परकीया नायिकाका स्वकीयाकी अपेक्षा अधिक प्रेम होता है, वैसे ही उन्हें भी भगवान्‌के प्रति अतिशय प्रेम हुआ। अतः इससे उपासकोंको बड़ा आश्वासन मिलता है। इससे बहुत त्रुटिपूर्ण होनेपर भी उन्हें भगवत्कृपाकी आशा बनी रहती है और प्रेममार्गमें आशा बहुत बड़ा अवलम्बन है; क्योंकि जीव, आशा होनेपर ही प्रपन्न हो सकता है। इस प्रकार भगवान्‌ने अन्यपूर्विका और अनन्यपूर्विका दोनोंकी प्रवृत्ति अपनी ओर ही दिखलाकर प्रेममार्गको सबके लिये सुलभ कर दिया है। यह द्वितीय ‘ता:’ का तात्पर्य हुआ। अब तृतीय ‘ता:’ का अर्थ करते हैं। इस ‘ता:’ का अर्थ है ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवत्स्वरूपा।