भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

२२० भक्तिसुधा अब्रह्मपरत्वकी प्रतीति हुआ करती है। अतः गोपियोंका दूसरे गोपोंके साथ ब्याहा जाना भी केवल विभ्रम ही है। वस्तुतः उनके परमपति तो एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही थे। उनका अन्यपूर्विकात्व तभीतक अनिवार्य रहेगा, जबतक भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वात्मकता सुनिश्चित नहीं होगी। परंतु इस बातका निश्चय भी शास्त्राधारपर ही हो सकेगा; अन्यथा साधारण पुरुषोंको तो अविचारवश रासक्रीड़ामें व्यभिचारकी ही गन्ध आयेगी। परंतु श्रीमद्भागवतमें तो कहा है कि जिन गोपोंकी स्त्रियाँ रासक्रीड़ामें सम्मिलित हुई थीं, उन्होंने भी उन्हें अपने पास ही देखा—'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥' (श्रीमद्भा० १०। ३३।३८) यदि कहा जाय कि यह उनकी भ्रान्ति थी तो हम कहते हैं कि गोपोंको उनके पत्नीत्वकी ही भ्रान्ति क्यों न मानी जाय। यह प्रसंग तो श्रीमद्भागवतमें आता ही है कि एक वर्षके लिये सर्वथा भगवान् ही गोपाल और वत्सरूप हो गये थे। सम्भव है, ये व्रजांगनाओंके पति गोपरूप गोविन्द ही हों। रासलीलाका प्रयोजन अतः सिद्ध हुआ कि यह अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही अन्यपूर्विकात्वकी प्रतीति थी, जिस प्रकार कि अनन्यपरा श्रुतियोंमें ही अन्यपरत्वकी प्रतीति होती है। यहाँ जिस तरह प्रपंच-रचनामें दो हेतु बतलाये गये हैं—एक तो भगवान्‌की लीला और दूसरा जीवोंको कल्याणके साधन प्राप्त कराना, उसी प्रकार इस रासलीलाके भी दो ही प्रयोजन थे। प्रथम तो भगवान्‌की यह लीला प्रेमरसके विकासके लिये थी। यहाँ एक ही तत्त्व भगवान् श्रीकृष्ण और गोपीरूपसे आविर्भूत हुआ है। यह प्रेमलीला थी, इसलिये यहाँ उसे नायक और नायिकारूपमें परिणत होनेकी आवश्यकता थी; क्योंकि प्रेमका मुख्य आलम्बन नायकके लिये नायिका है और नायिकाके लिये नायक। साहित्यशास्त्रमें शृंगाररस सबसे उत्कृष्ट माना गया है। वस्तुतः उसके द्वारा परमानन्दकी जैसी स्फुट स्फूर्ति होती है, वैसी और किसी रससे नहीं होती। शृंगार अथवा प्रेमरस स्वतः निर्विशेष है। जिस समय उसका आलम्बन भगवान् होते हैं तो वह परम पवित्र प्रेम माना जाता है और जिस समय उसका आलम्बन अस्थि-मांसमय नायक या नायिका होते हैं तो अत्यन्त अधोगतिमूलक काम कहते हैं। किंतु यहाँ नायक-नायिकारूपमें भी शुद्ध सच्चिदानन्दघन ही हैं। अतः रसवृद्धिके साथ यहाँ निकृष्ट आलम्बनजनित मलिनताकी तनिक भी सम्भावना नहीं है। इन नायिकाओंमें जो अनन्यपूर्विका थीं, उन्हें स्वकीया कहा गया है और जो अन्यपूर्विका थीं, उन्हें परकीया। स्वकीया नायिकाको नायकका सहवास सुलभ होता है, किंतु परकीयामें स्नेहकी अधिकता रहती है। कई प्रकारकी लौकिक-वैदिक अड़चनोंके कारण वह स्वतन्त्रतापूर्वक अपने प्रियतमसे नहीं मिल सकती, इसलिये उस व्यवधानके समय उसके हृदयमें जो विरहाग्नि सुलगती रहती है, उससे उसके प्रेमकी निरन्तर अभिवृद्धि होती रहती है। इसीलिये कुछ महानुभावोंने स्वकीया नायिकाओंमें भी परकीया-भाव माना है; अर्थात् स्वकीया होनेपर भी उसका प्रेम परकीया नायिकाओंका-सा था। वस्तुतः तो सभी व्रजांगनाएँ स्वकीया ही थीं; क्योंकि उनके परमपति भगवान् श्रीकृष्ण ही थे; परंतु उनमेंसे कई अन्य पुरुषोंके साथ विवाहिता थीं और कई अविवाहिता। अतः स्वकीया-परकीया या ऊढ़ा और अनूढ़ा कहना उचित है। इस प्रकार प्रेमोत्कर्षके लिये ही भगवान्ने यह विलक्षण लीला की थी। इस लीलाका दूसरा प्रयोजन जीवोंका कल्याण है। यहाँ जो अनन्यपूर्विका नायिका हैं, उनका जो भगवान्‌के प्रति अतिशय अनुराग है, उससे होनेवाली लीला आगे चलकर लोगोंको ध्येय होगी। यह बात पहले कही जा चुकी है कि इस प्रकारकी काम- विजय-लीलाका चिन्तन करनेसे लोगोंको कामजयरूप फल प्राप्त होगा। इसके सिवा यह भी देखना है कि इस प्रकारके उपासकोंका ध्येय क्या होगा? भगवान्