भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २१९

शराब और कूँडा आदि भेदवती प्रतीत होती है; परंतु निरुपाधिक रूपसे उसमें कोई भेद नहीं है। अतः श्रुतियोंका परम तात्पर्य भले ही एक ही वस्तुमें हो, किंतु उनका अवान्तर तात्पर्य तो अन्यमें ही हो सकता है। इन अवान्तर तात्पर्योंको लेकर ही सारे वाद- विवाद होते हैं, परंतु इससे भी कोई हानि नहीं है; क्योंकि उन विभिन्न अर्थोंका भी महातात्पर्य तो एकमात्र भगवान्में ही है। अतः जो लोग अत्यन्त अश्रद्धालु हैं, उनका ईश्वरखण्डन भी अच्छा ही है; क्योंकि उस अवस्थामें भी वे खण्डनात्मक रूपसे भगवान्का ही चिन्तन करेंगे। भगवान् तो ऐसे कृपालु हैं कि 'भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।' (रा०च०मा० १।२८।१) किसी प्रकार उनका चिन्तन किया जाय, वे कृपा ही करते हैं। इसीलिये शिशुपाल और कंसादिको भी अन्तमें भगवद्धामकी ही प्राप्ति हुई बतलायी गयी है। किंतु वेनकी अधोगति हुई, क्योंकि उसका भगवान्के प्रति वैर भी नहीं था। उसकी तो उपेक्षादृष्टि थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि शास्त्रमें सभी प्रकारके अधिकारियोंके उद्धारका साधन विद्यमान है। यहाँतक कि श्रुतिमें नास्तिकवादका मूल भी मिलता है; यथा— 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत।' (छान्दोग्य० ६।२।१) कहीं-कहीं 'असत्' शब्दका अर्थ 'अव्यवहार्य' भी है। जैसे—कहते हैं कि मिट्टीमें घट नहीं है; क्योंकि यद्यपि उसमें कारणरूपसे घट है तथापि अव्यवहार्य होनेके कारण उसे असत् कहा जाता है। किंतु यहाँ तो 'असत्' का तात्पर्य शून्यमें ही है; क्योंकि आगे—'कथमसतः सज्जायेत।' (छान्दोग्य० ६।२।२) ऐसा कहकर उसका खण्डन कर दिया गया है। अतः जिस प्रकार भगवान् ही अनेक रूपसे प्रकट होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही लीलाविशेषके विकासार्थ अन्य- पूर्विकात्वकी प्रतीति होती थी। भगवान् तो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा हैं। उनके साथ प्राकृत प्राणियोंका संसर्ग कैसे हो सकता था? अतः ये सब व्रजांगनाएँ स्वरूपतः तो सच्चिदानन्दरूपा ही थीं। पहले यह भी बतलाया जा चुका है कि अभिधानरूपा श्रुतियाँ और अभिधेयरूप देवता ये सभी वस्तुतः एक ही हैं, परंतु मूलतः अभिन्न होनेपर भी साधकोंके कल्याणार्थ भगवान्को शब्दका आविर्भाव करना ही पड़ता है; अन्यथा महाप्रलयमें भी भगवान्ने जीवोंको मुक्त क्यों नहीं कर दिया? इसका कारण यही था कि वहाँ कल्याणकारिणी सामग्रीका अभाव था। अतः परम दयालु और करुणामय होनेपर भी भगवान् कल्याणका क्रम रखते हैं। यदि उन पापी, पुण्यात्मा सभीका अक्रमसे उद्धार कर दिया करते तो बात ही बिगड़ जाती। अतः प्रपंचके मूलभूत अनादि अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उन्होंने सभी प्रकारके वाक्योंका आविर्भाव किया है। श्रुतिरूप अभिधान और उनका लक्ष्य ब्रह्म, ये ऐसे ही हैं, जैसे तरंग और समुद्र। यह तरंग और समुद्ररूप भेद इसीलिये है कि इसके बिना उनका ऐक्यबोध नहीं हो सकता। यदि भेद न हो तो लक्षण कैसे बने? जीव अपने अनादि अज्ञानका निवारण तभी कर सकता है, जब वह परब्रह्मके साथ उसके कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंचका अभेद अनुभव करे और उस भेदका निवारण महावाक्यरूपसे उत्पन्न होनेवाले बोधके द्वारा ही हो सकता है। किंतु सब लोग आरम्भमें ही उस अभेदका अनुभव नहीं कर सकते। अतः उस योग्यताकी प्राप्तिके लिये अन्यपरा श्रुतियोंद्वारा अन्यान्य पदार्थोंका निरूपण किया गया है। वास्तवमें तो समस्त श्रुतियाँ और उनके प्रतिपाद्य भी अनन्य ही हैं। यहाँ व्रजांगनाओंमें अनन्यपरा श्रुतियाँ ही अनूढा हैं और अन्यपरा ही ऊढा हैं। परंतु जिस समय 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इस सिद्धान्तका निश्चय हो जायगा, उस समय यही निश्चय होगा कि वस्तुतः ब्रह्मपरमें ही लीलावश