भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ भक्तिसुधा
उपासना करनी चाहिये, कोई निर्गुणोपासनामें प्रवृत्त हो सकते हैं और कोई अभेदचिन्तनके अधिकारी हैं। अपने-अपने अधिकारानुसार ये सब भगवान्का ही भजन करनेवाले हैं। सब लोगोंकी गति निष्प्रपंच ब्रह्ममें ही नहीं हो सकती। अतः भगवत्साक्षात्कारके लिये क्रमशः इन सभी सोपानोंका अतिक्रमण करना होता है। यद्यपि यह बात अपने अधीन ही है कि हम कर्म न करें, परंतु ऐसे कितने आदमी हैं, जो बिना कर्म किये रह सकते हों ? यही बात मनके विषयमें भी है। यद्यपि सभी चाहते हैं कि मन निस्पन्द हो जाय और उसकी निस्पन्दता है भी अपने ही अधीन तथापि इसमें सफलता पानेवाले कितने लोग हैं ? अतः सब जीवोंके यथायोग्य साधनकी व्यवस्था करनेके लिये ही भगवान् प्रपंचाकारमें परिणत हो जाते हैं। यही उनकी प्राप्तिका क्रम है। इस क्रमसे बढ़ते-बढ़ते जबतक जीव निष्प्रपंच ब्रह्ममें परिनिष्ठित नहीं होता, तबतक उसे कृतार्थता नहीं हो सकती। यहाँ यह प्रश्न होता है कि भगवान्ने प्रपंचकी रचना की ही क्यों ? इसपर हमें यही कहना है कि आरोप होनेपर ही उसके अधिष्ठानका अनुसन्धान किया जाता है। अधिष्ठान है, इसलिये आरोपकी कल्पना नहीं की जाती, जैसे कि कहा है— ‘सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः ।’ जिस प्रकार यदि मृत्तिका है तो यह नहीं कह सकते कि घट बनना ही चाहिये; हाँ, घड़ेको देखकर उसकी कारणभूता मृत्तिकाका अनुमान अवश्य किया जाता है। कार्य तो कारणका व्यभिचारी हो सकता है, किंतु कारण कार्यका व्यभिचारी नहीं होता। अतः हम प्रपंचरूप कार्यकी अपेक्षासे उसके कारणभूत परब्रह्मका निश्चय करते हैं; परब्रह्मके प्रपंच-निर्माणके प्रयोजनका अनुमान नहीं कर सकते। इसी प्रश्नके उत्तरमें यह विचार भी आ जाता है कि कार्यमें कारणके सर्वांशकी अनुवृत्ति नहीं हुआ करती। जिस प्रकार मालामें सर्पका अध्यास होनेपर जो ‘अयं सर्पः’ ऐसा बोध होता है, उस समय उसमें मालाके आकार एवं इदमंशका तो अनुवेध होता है, किंतु बहुमूल्यत्वका अनुवेध नहीं होता। इसके सिवा इसका दूसरा न्याय यह भी हो सकता है— विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत्। समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् ॥ अर्थात् विषय (अधिष्ठान)-के रूपसे ही अध्यस्त पदार्थ रूपित होता है, किंतु उसके सभी गुणोंकी उसमें अनुवृत्ति नहीं होती। इसी प्रकार सम्पूर्ण प्रपंचका महाकारण जो परब्रह्म है, वह सच्चिदानन्द- स्वरूप है। उसके सत् और चिदंशकी तो समस्त पदार्थोंमें अनुवृत्ति होती देखी गयी है; परंतु आनन्दांशका सर्वत्र अनुवेध नहीं होता। इस प्रकार क्योंकि लीलाविशेषके लिये भगवान् ही प्रपंचरूपसे स्थित हुए हैं, भिन्न श्रुतियाँ भी उन्हींके विभिन्न रूपोंका प्रतिपादन करती हैं। कई श्रुतियाँ भगवान्के निर्विशेषरूपका प्रतिपादन करनेवाली हैं— ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्’ (कठ० १।३।१५) और कई उनके सविशेषरूपका प्रतिपादन करती हैं, जैसे— ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः ।’ (मुण्ड० २।१।४) —इत्यादि। और कोई अन्नमयरूपसे उन्हींका प्रतिपादन करती हैं—जैसे ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’ (तैत्तिरीय० ३।२) इसी प्रकार और भी सब श्रुतियाँ भिन्न-भिन्न रूपसे एक ब्रह्मका ही प्रतिपादन करती हैं। परंतु एक ही वस्तुमें—एक ही सत्तामें अनेक विकल्पोंका होना सम्भव नहीं है। क्रियामें तो विकल्प होना बहुत सम्भव है, जैसे हम घोड़ेपर चढ़कर जा भी सकते हैं और नहीं भी जा सकते; परंतु वस्तुमें ऐसा भेद नहीं हो सकता। अतः एक ही ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी, यह सत्ताभेदसे तो माना जा सकता है; परंतु एक सत्तामें ऐसा होना सम्भव नहीं है; जिस प्रकार एक ही मृत्तिका उपाधिभेदसे तो घट,