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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

श्रीरासलीलारहस्य २१९

शराब और कूँडा आदि भेदवती प्रतीत होती है; परंतु निरुपाधिक रूपसे उसमें कोई भेद नहीं है। अतः श्रुतियोंका परम तात्पर्य भले ही एक ही वस्तुमें हो, किंतु उनका अवान्तर तात्पर्य तो अन्यमें ही हो सकता है। इन अवान्तर तात्पर्योंको लेकर ही सारे वाद- विवाद होते हैं, परंतु इससे भी कोई हानि नहीं है; क्योंकि उन विभिन्न अर्थोंका भी महातात्पर्य तो एकमात्र भगवान्में ही है। अतः जो लोग अत्यन्त अश्रद्धालु हैं, उनका ईश्वरखण्डन भी अच्छा ही है; क्योंकि उस अवस्थामें भी वे खण्डनात्मक रूपसे भगवान्का ही चिन्तन करेंगे। भगवान् तो ऐसे कृपालु हैं कि 'भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।' (रा०च०मा० १।२८।१) किसी प्रकार उनका चिन्तन किया जाय, वे कृपा ही करते हैं। इसीलिये शिशुपाल और कंसादिको भी अन्तमें भगवद्धामकी ही प्राप्ति हुई बतलायी गयी है। किंतु वेनकी अधोगति हुई, क्योंकि उसका भगवान्के प्रति वैर भी नहीं था। उसकी तो उपेक्षादृष्टि थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि शास्त्रमें सभी प्रकारके अधिकारियोंके उद्धारका साधन विद्यमान है। यहाँतक कि श्रुतिमें नास्तिकवादका मूल भी मिलता है; यथा— 'असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत।' (छान्दोग्य० ६।२।१) कहीं-कहीं 'असत्' शब्दका अर्थ 'अव्यवहार्य' भी है। जैसे—कहते हैं कि मिट्टीमें घट नहीं है; क्योंकि यद्यपि उसमें कारणरूपसे घट है तथापि अव्यवहार्य होनेके कारण उसे असत् कहा जाता है। किंतु यहाँ तो 'असत्' का तात्पर्य शून्यमें ही है; क्योंकि आगे—'कथमसतः सज्जायेत।' (छान्दोग्य० ६।२।२) ऐसा कहकर उसका खण्डन कर दिया गया है। अतः जिस प्रकार भगवान् ही अनेक रूपसे प्रकट होते हैं, उसी प्रकार यहाँ भी अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही लीलाविशेषके विकासार्थ अन्य- पूर्विकात्वकी प्रतीति होती थी। भगवान् तो पूर्ण ब्रह्म परमात्मा हैं। उनके साथ प्राकृत प्राणियोंका संसर्ग कैसे हो सकता था? अतः ये सब व्रजांगनाएँ स्वरूपतः तो सच्चिदानन्दरूपा ही थीं। पहले यह भी बतलाया जा चुका है कि अभिधानरूपा श्रुतियाँ और अभिधेयरूप देवता ये सभी वस्तुतः एक ही हैं, परंतु मूलतः अभिन्न होनेपर भी साधकोंके कल्याणार्थ भगवान्को शब्दका आविर्भाव करना ही पड़ता है; अन्यथा महाप्रलयमें भी भगवान्ने जीवोंको मुक्त क्यों नहीं कर दिया? इसका कारण यही था कि वहाँ कल्याणकारिणी सामग्रीका अभाव था। अतः परम दयालु और करुणामय होनेपर भी भगवान् कल्याणका क्रम रखते हैं। यदि उन पापी, पुण्यात्मा सभीका अक्रमसे उद्धार कर दिया करते तो बात ही बिगड़ जाती। अतः प्रपंचके मूलभूत अनादि अज्ञानकी निवृत्तिके लिये उन्होंने सभी प्रकारके वाक्योंका आविर्भाव किया है। श्रुतिरूप अभिधान और उनका लक्ष्य ब्रह्म, ये ऐसे ही हैं, जैसे तरंग और समुद्र। यह तरंग और समुद्ररूप भेद इसीलिये है कि इसके बिना उनका ऐक्यबोध नहीं हो सकता। यदि भेद न हो तो लक्षण कैसे बने? जीव अपने अनादि अज्ञानका निवारण तभी कर सकता है, जब वह परब्रह्मके साथ उसके कार्यभूत सम्पूर्ण प्रपंचका अभेद अनुभव करे और उस भेदका निवारण महावाक्यरूपसे उत्पन्न होनेवाले बोधके द्वारा ही हो सकता है। किंतु सब लोग आरम्भमें ही उस अभेदका अनुभव नहीं कर सकते। अतः उस योग्यताकी प्राप्तिके लिये अन्यपरा श्रुतियोंद्वारा अन्यान्य पदार्थोंका निरूपण किया गया है। वास्तवमें तो समस्त श्रुतियाँ और उनके प्रतिपाद्य भी अनन्य ही हैं। यहाँ व्रजांगनाओंमें अनन्यपरा श्रुतियाँ ही अनूढा हैं और अन्यपरा ही ऊढा हैं। परंतु जिस समय 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) इस सिद्धान्तका निश्चय हो जायगा, उस समय यही निश्चय होगा कि वस्तुतः ब्रह्मपरमें ही लीलावश

२२० भक्तिसुधा अब्रह्मपरत्वकी प्रतीति हुआ करती है। अतः गोपियोंका दूसरे गोपोंके साथ ब्याहा जाना भी केवल विभ्रम ही है। वस्तुतः उनके परमपति तो एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण ही थे। उनका अन्यपूर्विकात्व तभीतक अनिवार्य रहेगा, जबतक भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वात्मकता सुनिश्चित नहीं होगी। परंतु इस बातका निश्चय भी शास्त्राधारपर ही हो सकेगा; अन्यथा साधारण पुरुषोंको तो अविचारवश रासक्रीड़ामें व्यभिचारकी ही गन्ध आयेगी। परंतु श्रीमद्भागवतमें तो कहा है कि जिन गोपोंकी स्त्रियाँ रासक्रीड़ामें सम्मिलित हुई थीं, उन्होंने भी उन्हें अपने पास ही देखा—'मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः॥' (श्रीमद्भा० १०। ३३।३८) यदि कहा जाय कि यह उनकी भ्रान्ति थी तो हम कहते हैं कि गोपोंको उनके पत्नीत्वकी ही भ्रान्ति क्यों न मानी जाय। यह प्रसंग तो श्रीमद्भागवतमें आता ही है कि एक वर्षके लिये सर्वथा भगवान् ही गोपाल और वत्सरूप हो गये थे। सम्भव है, ये व्रजांगनाओंके पति गोपरूप गोविन्द ही हों। रासलीलाका प्रयोजन अतः सिद्ध हुआ कि यह अनन्यपूर्विका व्रजांगनाओंमें ही अन्यपूर्विकात्वकी प्रतीति थी, जिस प्रकार कि अनन्यपरा श्रुतियोंमें ही अन्यपरत्वकी प्रतीति होती है। यहाँ जिस तरह प्रपंच-रचनामें दो हेतु बतलाये गये हैं—एक तो भगवान्‌की लीला और दूसरा जीवोंको कल्याणके साधन प्राप्त कराना, उसी प्रकार इस रासलीलाके भी दो ही प्रयोजन थे। प्रथम तो भगवान्‌की यह लीला प्रेमरसके विकासके लिये थी। यहाँ एक ही तत्त्व भगवान् श्रीकृष्ण और गोपीरूपसे आविर्भूत हुआ है। यह प्रेमलीला थी, इसलिये यहाँ उसे नायक और नायिकारूपमें परिणत होनेकी आवश्यकता थी; क्योंकि प्रेमका मुख्य आलम्बन नायकके लिये नायिका है और नायिकाके लिये नायक। साहित्यशास्त्रमें शृंगाररस सबसे उत्कृष्ट माना गया है। वस्तुतः उसके द्वारा परमानन्दकी जैसी स्फुट स्फूर्ति होती है, वैसी और किसी रससे नहीं होती। शृंगार अथवा प्रेमरस स्वतः निर्विशेष है। जिस समय उसका आलम्बन भगवान् होते हैं तो वह परम पवित्र प्रेम माना जाता है और जिस समय उसका आलम्बन अस्थि-मांसमय नायक या नायिका होते हैं तो अत्यन्त अधोगतिमूलक काम कहते हैं। किंतु यहाँ नायक-नायिकारूपमें भी शुद्ध सच्चिदानन्दघन ही हैं। अतः रसवृद्धिके साथ यहाँ निकृष्ट आलम्बनजनित मलिनताकी तनिक भी सम्भावना नहीं है। इन नायिकाओंमें जो अनन्यपूर्विका थीं, उन्हें स्वकीया कहा गया है और जो अन्यपूर्विका थीं, उन्हें परकीया। स्वकीया नायिकाको नायकका सहवास सुलभ होता है, किंतु परकीयामें स्नेहकी अधिकता रहती है। कई प्रकारकी लौकिक-वैदिक अड़चनोंके कारण वह स्वतन्त्रतापूर्वक अपने प्रियतमसे नहीं मिल सकती, इसलिये उस व्यवधानके समय उसके हृदयमें जो विरहाग्नि सुलगती रहती है, उससे उसके प्रेमकी निरन्तर अभिवृद्धि होती रहती है। इसीलिये कुछ महानुभावोंने स्वकीया नायिकाओंमें भी परकीया-भाव माना है; अर्थात् स्वकीया होनेपर भी उसका प्रेम परकीया नायिकाओंका-सा था। वस्तुतः तो सभी व्रजांगनाएँ स्वकीया ही थीं; क्योंकि उनके परमपति भगवान् श्रीकृष्ण ही थे; परंतु उनमेंसे कई अन्य पुरुषोंके साथ विवाहिता थीं और कई अविवाहिता। अतः स्वकीया-परकीया या ऊढ़ा और अनूढ़ा कहना उचित है। इस प्रकार प्रेमोत्कर्षके लिये ही भगवान्ने यह विलक्षण लीला की थी। इस लीलाका दूसरा प्रयोजन जीवोंका कल्याण है। यहाँ जो अनन्यपूर्विका नायिका हैं, उनका जो भगवान्‌के प्रति अतिशय अनुराग है, उससे होनेवाली लीला आगे चलकर लोगोंको ध्येय होगी। यह बात पहले कही जा चुकी है कि इस प्रकारकी काम- विजय-लीलाका चिन्तन करनेसे लोगोंको कामजयरूप फल प्राप्त होगा। इसके सिवा यह भी देखना है कि इस प्रकारके उपासकोंका ध्येय क्या होगा? भगवान्

श्रीकृष्ण या गोपियाँ? सो कोई नहीं, बल्कि उन दोनोंका जिस प्रेमपाशसे बन्धन है, वह प्रेमशृंखला ही उनकी ध्येय होगी; क्योंकि उसके अधीन तो वे दोनों ही हैं। जिस प्रकार यदि किसी ऊँट या बैलको पकड़ना होता है तो उसकी नकेल या नाथ ही पकड़ते हैं, उसी प्रकार इस प्रेम-बन्धनको पकड़नेसे श्रीकृष्ण और गोपियाँ दोनों ही स्वाधीन हो जायँगे। इसके सिवा इस लीलासे सर्वसाधारणको यह भी उपदेश मिलेगा कि इस प्रकारके नायक-नायिकाओंमें जैसा उत्कट स्नेह होता है, वैसा ही उन्हें भी अपने इष्टदेवोंके प्रति रखना चाहिये। इन व्रजांगनाओंमें जो अन्यपूर्विका हैं, उनसे यह उपदेश भी मिलता है कि जिस प्रकार वे लौकिक- वैदिक शृंखलाओंका विच्छेद करके भगवत्परायण रहती थीं, उसी प्रकार साधकोंको भी सारे व्यवधानोंको छोड़कर अपने ध्येयमें संलग्न होना चाहिये। साधारण पुरुषोंको इससे भगवान्‌की उदारता और करुणाका भी ज्ञान होता है। प्राणियोंमें सदा ही कोई-न-कोई त्रुटि तो रहा ही करती है। उस समय अपनी हीनताको देखकर अनाश्वास हो जाना स्वाभाविक ही है। जहाँ ऐसा नियम है कि प्राणी वैदिक एवं स्मार्त उपासना करके ही भगवान्‌को प्राप्त करनेकी योग्यता पा सकता है, वहाँ जो सर्वसाधनहीन स्थूलदर्शी लोग हैं, उन्हें ऐसी आशा होना कि भगवान् हमपर भी उन गोपांगनाओंके समान कृपा करेंगे, बहुत बड़ा आश्वासन है। आगे चलकर कहा है कि वे गोपियाँ जारभावसे भगवान्‌को प्राप्त हुईं—‘जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।’ (श्रीमद्भा० १०।२९।११) अहो! जो गोपांगनाएँ वैदिक और स्मार्त-शृंखलाओंका उल्लंघन करके भगवत्परायण हुईं और जिन भगवान्‌का सर्वथा शुद्ध- भावसे आश्रय लेना चाहिये था, उनका ऐसे दूषित भावसे आश्रय लिया, उन गोपांगनाओंका भी भगवान्‌ने कल्याण कर दिया। यह ऐसी ही बात हुई जैसे पूतनाने विषलिप्त स्तनपान कराकर भी परमपद प्राप्त किया। जिन भगवान्‌का सर्वस्व समर्पण करके अर्चन करना चाहिये था, उन्हें विषपान कराना महान् अपराध था तो भी विषयके माहात्म्यसे उसने सद्गति प्राप्त की। उसी प्रकार यद्यपि कामबुद्धिसे भगवान्‌का आश्रय लेना अत्यन्त अनुचित है; क्योंकि यह सोपाधिक प्रेम है—कामवासनाकी पूर्तितक ही रहनेवाला है—और भगवान्‌को सर्वभूतान्तरात्मा होनेके कारण निरुपाधिक प्रेमसे ही अभ्यर्चित होना चाहिये तथापि उनका परम हित ही हुआ। इसके सिवा इसमें एक दोष यह भी हो सकता था कि जो भगवान् उनके वास्तविक परमपति थे, उनमें तो उन्होंने जारबुद्धि की और जो अस्वाभाविक प्राकृत पति थे, उनमें पतिबुद्धि की। जिस प्रकार तरंगोंका मुख्य पति तो समुद्र ही है, तरङ्गान्तरोंसे तो उनका आगन्तुक-सम्बन्ध है, उसी प्रकार जीवका स्वाभाविक-सम्बन्ध तो अपने आश्रयभूत परब्रह्मसे ही है, अन्य जीवोंसे तो केवल आगन्तुक- सम्बन्ध है, इसलिये वह अनित्य भी है, अतः सर्वान्तर्यामी भगवान्‌का जारबुद्धिसे आश्रय लिया गया—यह भी एक बड़ा दोष था। ये सारे अनौचित्य ‘अपि’ शब्दसे सूचित होते हैं। किंतु ये सब दोष होनेपर भी भगवान्‌से सम्बन्धित होनेके कारण गुण हो गये। यह आलम्बनका ही माहात्म्य था। उस जारबुद्धिसे यह गुण हो गया कि जिस प्रकार जारके प्रति परकीया नायिकाका स्वकीयाकी अपेक्षा अधिक प्रेम होता है, वैसे ही उन्हें भी भगवान्‌के प्रति अतिशय प्रेम हुआ। अतः इससे उपासकोंको बड़ा आश्वासन मिलता है। इससे बहुत त्रुटिपूर्ण होनेपर भी उन्हें भगवत्कृपाकी आशा बनी रहती है और प्रेममार्गमें आशा बहुत बड़ा अवलम्बन है; क्योंकि जीव, आशा होनेपर ही प्रपन्न हो सकता है। इस प्रकार भगवान्‌ने अन्यपूर्विका और अनन्यपूर्विका दोनोंकी प्रवृत्ति अपनी ओर ही दिखलाकर प्रेममार्गको सबके लिये सुलभ कर दिया है। यह द्वितीय ‘ता:’ का तात्पर्य हुआ। अब तृतीय ‘ता:’ का अर्थ करते हैं। इस ‘ता:’ का अर्थ है ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवत्स्वरूपा।

पहले 'ताः' से तो वे गोपांगनाएँ विवक्षित थीं, जिनका भगवान्‌के साथ भृंगीकीट-न्यायसे साधनद्वारा अभेद हुआ था। दूसरे 'ताः' से वे गोपांगनाएँ कही गयीं जो समुद्र और तरंगके समान मूलतः अभिन्न थीं। यह समुद्र अचिन्त्यानन्द-सुधा-सिन्धु है। इससे एक तो तरंगोंका अभेद और दूसरा जैसे उसकी सुधासे सुधागत माधुर्यका अभेद। यह बहुत बड़ा अन्तर है। इस प्रकारकी स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ ही तीसरे 'ताः' से कही गयी हैं। जिस प्रकार जलमें मधुरता, शीतलता आदि कई गुण हैं, उसी प्रकार भगवान्‌में भी कई शक्तियाँ हैं। भगवान्‌की परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीवृष- भानुनन्दिनी और उन्हींकी अवान्तर विकासरूपा ललिता- विशाखा आदि तीसरे 'ताः' से अभिप्रेत हैं। उन श्रीवृषभानुनन्दिनीकी पदनख-चन्द्रिकाकी जो विभिन्न दीप्तियाँ हैं, उन्हींके अन्तर्गत ये ललिता-विशाखा आदि हैं। भगवान्‌की सर्वान्तरतम दिव्यातिदिव्य शक्ति तो श्रीराधिका ही हैं, उन्हींकी अंशभूता उनकी प्रधान सहचरी हैं। यद्यपि उनमें तारतम्य है तथापि वे हैं सब-की-सब परमान्तरंगा ही। यहाँ जो 'अपि' शब्द आया है, उसका अर्थ 'च', 'और' समझना चाहिये अर्थात् शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और उन त्रिविध गोपांगनाओंको देखकर भगवान्‌ने रमण करनेको मन किया। किंतु उन्होंने मन किया कैसे? इसपर कहते हैं कि स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म भगवान्‌ने आप्तकाम होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर मन बनाया। योगमायाका आश्रय लेनेसे क्या अभिप्राय है? 'योगाय स्वेन सह तासां संश्लेषाय या माया कृपा तामुपाश्रित्य' अर्थात् योग यानी अपने साथ संश्लेष करनेके लिये जो माया-कृपा, उसका आश्रय लेकर। यहाँ 'माया' शब्दका अर्थ कृपा है, 'माया कृपायां दम्भे च'। अतः कृपापरतन्त्र भगवान्‌ने स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म होकर भी केवल कृपावश मन किया। दूसरी बात यह भी हो सकती है कि— 'युज्यते—सदा संश्लिष्यत इति योगा, महा- लक्ष्मीः परमान्तरङ्गशक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी, तस्या माया कृपा योगमाया, तामुपाश्रित्य।' अर्थात् जो युक्त यानी सदा संश्लिष्ट रहती हैं, वे परमान्तरंग-शक्तिभूता श्रीवृषभानुनन्दिनी ही योगा हैं, उनकी माया—कृपा ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर रमणकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि अपनी कृपाके अधीन होकर नहीं, बल्कि जो श्रीवृषभानुसुताकी कृपापात्रभूता तथा उनके चरणकमल- मकरन्दका आस्वादन करनेवाली व्रजांगनाएँ हैं, उनकी प्रसन्नता-सम्पादन करनेके लिये ही भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि ऐसा करनेसे ही वे अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीको प्रसन्न कर सकते थे। जो मधुरभावके उपासक हैं, उनकी यह पद्धति है कि वे पहले अपने आचार्योंका आश्रय लेते हैं, फिर उनकेद्वारा गोपांगनाओंकी प्रसन्नताका लाभ करते हैं, उनकी प्रसन्नतासे उन्हें प्रधान-प्रधान यूथेश्वरियोंका प्रसाद प्राप्त होता है और तत्पश्चात् श्रीहरिकी चिरसंगिनी श्रीराधिकाजीकी कृपा होती है। इस प्रकार श्रीप्रियाजीके कृपापात्र होनेपर ही भगवान्‌का अनुग्रह होता है। इसमें यह भी भेद है कि शुद्ध परब्रह्मका पदार्थोंके साथ सम्बन्ध नहीं होता— 'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः यह मानना पड़ता है कि वृत्युपहित चेतन ही पदार्थोंका प्रकाशक होता है। यदि शुद्ध चेतन ही पदार्थोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता तो उसकी सत्ता तो सर्वत्र है; परंतु घटकुड्यादिमें पदार्थोंको प्रकाशित करनेका सामर्थ्य नहीं है। इसके सिवा चेतनकी सत्तामात्रसे ही पदार्थोंकी प्रतीति भी नहीं होती; क्योंकि चेतनका संश्लेष तो सन्निकृष्ट- असन्निकृष्ट सभी वस्तुओंके साथ है। परंतु प्रकाश केवल उन्हीं वस्तुओंका होता है, जिनके साथ प्रमाणजन्य-वृत्त्यभिव्यक्त चेतनका संसर्ग होता है। उसी प्रकार यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णका सम्बन्ध सभी व्रजांगनाओंसे है तथापि जिस प्रकार स्वप्रकाश चेतन अन्तःकरणादिवृत्युपहित होकर ही वस्तुओंके प्रकाशका

हेतु होता है, वैसे ही भगवान् भी अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी-शक्ति श्रीराधिकाजीके कृपापात्रोंपर ही अनुग्रह करते हैं। जिस प्रकार मंगलमय सुधासिन्धुमें जो मधुरिमा है, वह उसका स्वरूप ही है, उसी प्रकार परमानन्दसिन्धु भगवान्‌की जो आह्लादिनी-शक्ति है, वह भगवान्‌से अभिन्न ही है। जिस प्रकार घटादिका प्रकाश अन्तःकरण- वृत्युपहित चेतनसे ही होता है, किंतु अन्तःकरणके प्रकाशके लिये किसी अन्य अन्तःकरणकी आवश्यकता नहीं होती तथा अन्तःकरणादि तो स्वतन्त्रतासे चेतनके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर सकते हैं, किंतु घटादि अन्तःकरणवृत्युपहित होनेपर ही उसका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर सकते हैं, उसी प्रकार यहाँ जो वृषभानुनन्दिनी हैं, वे तो परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके साथ निरपेक्षभावसे असाधारण रमणरूप सम्बन्धका भोग कर सकती हैं, किंतु अन्य गोपांगनाएँ ऐसा नहीं कर सकतीं। अतः उनमें भी भगवान्‌का सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये श्रीवृषभानुदुलारीका सम्बन्धसम्पादन करना पड़ता है। अतः पहले वे इनसे तन्मय हो लेती हैं, उसके पश्चात् भगवान्‌से सम्बन्ध प्राप्त करती हैं। इसीलिये योगमायाका आश्रय लिया। अथवा ‘योगाय सम्बन्धाय या माया वञ्चना तामुपाश्रितोऽपि ताः वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे’—योग जो असाधारण सम्बन्ध उसके लिये भी माया यानी वंचनाका आश्रय लेकर उन्होंने रमणके लिये मन किया। भगवान् रमणके लिये भी मायाका आश्रय लिया करते हैं। इसीसे जब ऋषि-पत्नियां गयी थीं, उस समय भी उन्होंने मायाका ही आश्रय लिया था, और उन्हें भी पातिव्रतका ही उपदेश किया था। किंतु भगवान् श्रीकृष्ण तो परब्रह्म हैं। उनका सम्बन्ध भला किसको अभीष्ट न होगा ? उनका संसर्ग ही तो परम कल्याण है। उसमें लौकिक भावोंका आरोप करना अर्थात् पारमार्थिक तत्त्वमें अपारमार्थिक भावोंका निवेश करना माया ही है। अतः ‘योगे सम्बन्धे या माया वञ्चना सा योगमाया’ ऐसा तात्पर्य समझना चाहिये। अथवा ‘अयोगमाया’ ऐसा पद मानें तो ‘अयोगाय असम्बन्धाय या माया वञ्चना सा अयोगमाया’ अयोग यानी असम्बन्धके लिये जो माया—वंचना, उसीका नाम अयोगमाया है अर्थात् अपने साथ सम्बन्ध न होने देनेके लिये जो माया है, उसका उन्होंने आश्रय लिया। ‘ताः वीक्ष्य’ वे जो पूर्वोक्त प्रकारकी गोपांगनाएँ थीं, जो इस प्रकार स्वस्वरूपानुसन्धानमें तत्पर थीं, उन्हें दयार्द्र-दृष्टिसे देखकर वंचनाको भूलकर उन्होंने रमण करनेके लिये मन किया। अथवा— ‘युज्यते इति योगा सदासंश्लिष्टरूपा या वृषभानुनन्दिनी तस्यां या माया कृपा तामाश्रित्य रन्तुं मनश्चक्रे।’ अपनी स्वस्वरूपभूता जो वृषभानुनन्दिनी उनकी प्रसन्नताके लिये रमण करनेको मन किया अर्थात् उन्हें जो रासाभिलाषा हुई, उसकी पूर्तिके लिये उन व्रजांगनाओंको देखकर रमण करनेकी इच्छा की। अथवा ‘न गच्छतीति अगा अगा चासौ मा इति अगमा, अगमायां उपाश्रितः यः स भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे’ अर्थात् जो अचला (नित्यसंगिनी) लक्ष्मीरूपा वृषभानुनन्दिनी हैं, उनमें अनुरक्त जो भगवान् उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह रासलीला श्रीराधिकाजीकी ही प्रसन्नताके लिये है। भावुकोंका ऐसा मत है कि भगवान्‌के जितने कृत्य हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनीकी प्रसन्नताके लिये हैं और श्रीवृषभानुसुताके जितने कृत्य हैं, वे श्रीहरिकी तुष्टिके लिये हैं। यहाँ जो अन्यान्य गोपांगनाएँ हैं, वे सब श्रीराधिकाजीकी ही अंशांशभूता हैं। यहाँ जो ‘अपि’ है, उसका तात्पर्य यह भी मालूम होता है कि व्रजदेवियोंको तो पहलेहीसे भगवान्‌के साथ रमणकी इच्छा थी। इस समय मानो परीक्षित्‌के चित्तमें इस बातका सन्ताप था कि अहो ! व्रजांगनाओंने कात्यायनी-अर्चनादि कठोर तपस्या करके भगवान्‌को प्रसन्न किया और भगवान्‌ने भी प्रसन्न होकर उन्हें अभीष्ट वर दिया; किंतु अब, जब

कि प्रेमातिशयके कारण भगवत्-सम्भोगकी प्रतीक्षाकमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगके समान हो रहा था, भगवान् क्यों उपेक्षा कर रहे थे? इस समय भगवान्‌की उदासीनता देखकर मानो महाराज परीक्षित् मन-ही-मन उनकी निन्दा कर रहे थे, इतनेहीमें श्रीशुकदेवजी कहने लगे—'भगवानपि ता रात्री:' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) अर्थात् व्रजांगनाएँ तो पहलेसे ही अभिलाषा रखती थीं; परंतु आज भगवान्‌ने भी उनके साथ तादात्म्यापत्तिरूप रमणकी इच्छा की। इससे यह भी सूचित होता है कि भगवान्‌की इच्छा भक्तोंकी भावनाका अनुसरण किया करती है। कहा भी है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ × × × × स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० ३।९।११; १०।१४।२) भावुक लोग अपनी-अपनी भावनामयी बुद्धिसे अरूप, अनाम, अप्रमेय परब्रह्मका जिस-जिस रूपसे ध्यान करते हैं, वैसा ही रूप भगवान्‌को धारण करना पड़ता है। इसीसे यद्यपि अभीतक भगवान्‌को रमणकी इच्छा नहीं थी तथापि गोपांगनाओंकी भावनाके अधीन होनेसे उनमें भी रमणेच्छाका प्रादुर्भाव हो गया। किंतु इन व्रजांगनाओंका भाव तो 'तत्सुखसुखित्व' है। इन्हें अपने सुखकी कुछ भी इच्छा नहीं है। संसारमें तो अपने सुखकी कामनासे ही सबसे प्रीति की जाती है—'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'। (बृहदारण्यक० २।४।५) तथापि गोपांगनाओंका प्रेम तो लोक तथा वेदसे अतीत ही है। अतः उन्हें अपने लिये भगवान्‌में प्रेम नहीं था, बल्कि वे तो भगवान्‌के लिये ही प्राण धारण करती थीं। उनका तो यही लक्ष्य था कि हे मनमोहन ! ये प्राण और देह आपके काम आते हैं, इसीसे हम इन्हें धारण करती हैं, नहीं तो हमें इनकी क्या आवश्यकता है? भगवान्‌का वियोग होनेपर भी उन्होंने इसीलिये अपने शरीरादिको रख छोड़ा था कि वे भगवत्सेवाके साधन थे। उनका कहना था कि श्रीकृष्णसे वियुक्त होकर भी जो हम जीवित हैं, इसका मुख्य कारण यही है कि हमारे प्राण हमारे अधीन नहीं हैं। विधाताने शरीर तो हमें दिया है; किंतु प्राण श्रीकृष्णके अधीन कर दिये हैं। उनका कथन था—'भवदायूषां नः' अर्थात् आप ही हमारी आयु हैं। अतः उनका जीवन भगवान्‌के सुखके लिये ही था। हाँ, उन्हें सुख पहुँचानेमें उनको भी सुख मिलता ही था। जो पुरुष भगवान्‌को सुगन्धित माला और पुष्प समर्पण करता है, उसे भी सान्निध्यवश उनका सुवास मिलता ही है। किंतु यह सुखानुभव आनुषंगिक है, उसमें अपना सुख अभिमत नहीं होता। इस प्रकार जैसे गोपांगनाएँ भगवान्‌के ही सुखमें सुख माननेवाली हैं, वैसे ही भगवान् भी उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये सारी लीलाएँ करते हैं। यह तो उनका पारस्परिक भाव है। किंतु इसका पर्यवसान कहाँ होता है? इस सम्बन्धमें कह सकते हैं कि वह लोककल्याणके ही लिये है। परंतु यदि वे दोनों ही निरपेक्ष हैं, दोनोंको ही आप्तकाम होनेके कारण सुखकी अपेक्षा नहीं है तो फिर यह लीला किसे सुख पहुँचानेके लिये है? ठीक है, सिद्धान्त भी यही है कि भगवान् श्रीकृष्ण और गोपांगनाओंके रूपमें एक ही परमानन्द-सुधासिन्धु प्रस्फुटित हुआ है तो दोनों ही आप्तकाम हैं। इससे लीलाका कोई प्रयोजन ही नहीं रहता और लीला हुई ही थी, यहाँ यह भी प्रश्न हो सकता है कि यह विभाग ही क्यों हुआ? वस्तुतः यदि विचार किया जाय तो इसका प्रयोजन कुछ भी नहीं है, 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' (ब्रह्मसूत्र २।१।३३) यह विभाग केवल आत्मसुखके ही लिये है। किंतु यह विभाग चाहे लोककल्याणके लिये हो और चाहे 'एकाकी न रेमे'—अकेला रममाण नहीं

श्रीरासलीलारहस्य २२५

होता, इसलिये 'एकोऽहं बहु स्याम्' इस प्रकारके संकल्पपूर्वक हो तथापि जबतक लीला, लीलानायक और दर्शकोंको लीलामें आसक्ति न हो, तबतक तो लीला व्यर्थ ही है। माना कि यह त्रिविध विभाग एकमें ही हुआ है तथापि यह वह स्वस्वरूपमें ही परितृप्त है तो लीलाका कोई प्रयोजन ही सिद्ध नहीं होता। अतः यहाँ स्वस्वरूपभूत परमानन्दका आवरण अपेक्षित है। किंतु उसका आवरण करनेमें कौन समर्थ है? माया आवरण कर सकती है; परंतु भगवान्‌का आवरण करनेमें वह भी समर्थ नहीं है। अतः भगवान्‌के आश्रित रहनेवाली उनकी परमान्तरंगा मोहिनी शक्ति, जो कि अनिर्वचनीयतामें अन्य समस्त शक्तियोंके समान ही होनेपर भी शुद्धतामें उनसे उत्कृष्ट है, भगवान्‌के शुद्ध स्वरूपका आच्छादन करती है और उसीसे स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण हो जानेपर यह लीला और लीलापात्रोंकी कल्पना हो जाती है। जिस प्रकार स्वेच्छासे भाँग पीकर अपनेको मोहित किया जाता है, उसी प्रकार भगवान्‌का यह व्यामोहन भी स्वेच्छासे होता है। यदि इस प्रकार अपने स्वरूपभूत परमानन्दका आवरण न होता तो अपनेसे भिन्न रमणसामग्रीकी अपेक्षा क्यों होती? अतः पहले आवरण हुआ, उससे अतृप्ति हुई और फिर लीला हुई। इसीसे उनकी चेष्टाएँ एक-दूसरेकी परितृप्ति करनेवाली हुईं। इसमें अन्योन्याश्रयदोष भी नहीं है, रमणकी भी व्यवस्था ठीक हो जाती है और 'अपि' शब्दका तात्पर्य भी बन जाता है। इस श्लोकका एक अर्थ यह भी हो सकता है—'भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे'—भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। किसलिये? 'ताः वीक्ष्य'— अज्ञानिजनरूपा जो प्रजा है, उसे देखकर उसका कल्याण करनेके लिये। वह प्रजा कैसी है—'रात्रीः'—रात्रिके समान अज्ञानरूप तमसे व्याप्त। ये सब प्रजाएँ अनादि हैं; अतः भगवान्‌का रमण उनके कल्याणके ही लिये है। इसके सिवा वह प्रजा 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' (श्रीमद्भा० १०।२९।१) भी है— शरदायां जाड्यमय्यां व्यवहारभूमौ उत्फुल्लमल्लिकास्विव सुखबुद्धयः॥ अर्थात् सुखदुःखमोहात्मिका जो जाड्यमयी व्यवहारभूमि, जो कि उत्फुल्लमल्लिकाके समान आपात- रमणीय है, उसमें सुखबुद्धि करनेवाली। तात्पर्य यह है कि दुःखमयी व्यवहार-भूमिमें सुखबुद्धि करनेवाली प्रजाको स्नेहार्द्र-दृष्टिसे देखकर रमणकी इच्छा की; क्योंकि अज्ञानी प्रजाकी सुखदुःखमोहातीत परब्रह्ममें स्थिति होना अशक्य है। अतः जो प्राकृत लीलाएँ उनकी अभिरुचिके अनुकूल हैं, उनके कल्याणके लिये भगवान्‌ने उन्हींके समान रमण करनेकी इच्छा की। इसलिये— 'अयोगमायामुपाश्रितः'—'अयोगेषु चित्त- निरोधादिनिःश्रेयससाधनशून्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'। अर्थात् योग—चित्तवृत्तिनिरोधादि निःश्रेयसके साधनोंसे शून्य जो प्रजा, उसपर जो कृपा, वही माया है। उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया; क्योंकि जो शुद्ध परब्रह्म अशेषविशेषशून्य है, उसका साक्षात्कार तो निरोधादिद्वारा ही किया जा सकता है। 'अयोगेषु सर्वथा अयोग्येषु या माया कृपा तामुपाश्रित्य'—जो प्राणी अत्यन्त निकृष्ट कोटिके हैं, उनके ऊपर जो कृपा, उसका आश्रय लेकर रमण करनेका विचार किया। भगवान् पतितपावन हैं, इसीसे भावुक भक्त अपनेको सर्वसाधनशून्य देखकर भी भगवत्कृपाके भरोसे निश्चिन्त रहते हैं। 'मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने॥' (विनय-पत्रिका १६०) अतः यह भगवान्‌की लीला मानो अत्यन्त अयोग्य पुरुषोंके ऊपर कृपा करनेके ही लिये है; क्योंकि भगवान्‌के जो वात्सल्य, माधुर्य एवं औदार्य आदि गुण हैं, उनकी सफलता तो बिना पतितोंके हो ही नहीं सकती। वस्तुतः उदारता और दीनवत्सलता ये सब तो इन्हीं अंशोंको लेकर होते हैं कि स्वयं परमोत्कृष्ट होकर भी अत्यन्त निम्नकोटिक पुरुषोंके

२२६ भक्तिसुधा साथ मिलकर उनके साथ पूर्ण आत्मीयताका बर्ताव करें। किंतु निर्विशेष परब्रह्म या गोलोकवासी भगवान्के साथ ऐसे पतितोंका सहवास कैसे हो सकता है ? वहाँ उन निकृष्टातिनिकृष्ट पुरुषोंके आत्मीय होकर भगवान् कैसे विहार कर सकते थे ? अथवा— 'अयोगेषु स्वस्मिन्नयुज्यमानेषु या माया कृपा तामुपाश्रितः।' जिनकी मनोवृत्ति स्वप्नमें भी भगवान्की ओर नहीं जाती, ऐसे अपनेमें अयुक्त पुरुषोंके प्रति जो माया—कृपा उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि यह लीला अत्यन्त साधन-शून्योंको भी अपनी ओर आकर्षित करनेवाली है। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये ही यह लीला की थी। निर्विशेष भगवान्में तो प्राकृत पुरुषोंकी वृत्ति पहुँचनी अत्यन्त कठिन है; इसीसे भगवान्ने यह लोकमनोभिरामा लीला की थी, जिससे विषयी और पशुप्राय जीवोंका चित्त भी भगवान्की ओर लग जाय। अहो! भगवान्का यह खेल कैसा मनोमोहक था! 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) उसे देखकर जो गतिमान् थे, उनमें निस्पन्दता आ जाती थी और वृक्षोंकी रोमावली खड़ी हो जाती थी। अर्थात् चेतन पदार्थोंमें जड़ता आ जाती थी और जड़ोंमें चेतनकी क्रिया होने लगती थी। अतः भगवान्ने बहिर्मुख पुरुषोंको अपनी ओर आकृष्ट करनेके लिये ही अति अद्भुत मनोरम लीला की थी। ऐसा कहा जाता है कि प्राणियोंके पतनका जो प्रधान हेतु है, वह भगवद्विमुखता ही है तथा भगवदुन्मुखता ही सर्वानन्दका साधन है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ (श्रीमद्भा० ११।२।३७) अर्थात् जो पुरुष भगवान्से विमुख है, जो नामरूपक्रियात्मक प्रपंचमें ही आसक्त है, उसे ही भगवान्की मायासे मोहित होनेके कारण भगवद्विस्मृति हुआ करती है। स्वरूपविस्मृतिके पश्चात् विभ्रम होता है, जो असंग आत्मामें संगका, अकर्तामें कर्तृत्वका और एकमें अनेकत्वकी भ्रान्ति करा देता है। उस विभ्रमसे द्वैतबुद्धि होती है, द्वैतबुद्धिसे ही भय होता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि अनन्य बुद्धिसे उस पूर्ण परब्रह्म परमात्माका ही भजन करे। इससे माया इस प्रकार भाग जाती है, जैसे क्रुद्ध तपोधनोंके सामनेसे वेश्या। मायासे ही स्वरूपकी विस्मृति हुआ करती है और भगवदुन्मुख होनेपर वह भाग जाती है, तब स्वरूपसाक्षात्कार हो ही जाता है और फिर विभ्रमका उच्छेद हो जानेके कारण निर्भयताकी प्राप्ति हो जाती है। अतः भगवान्ने अज्ञानीरूपा प्रजाका उद्धार करनेके लिये ही यह मार्ग निकाला था; क्योंकि भगवान्की माया बड़ी प्रबल है, उससे वे ही बच सकते हैं, जो एकमात्र भगवान्का ही आश्रय लेते हैं। दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) अतः भगवान्ने सर्वसाधनशून्य पामर प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये ही यह लीला की थी, जिससे कि किसी भी प्रकार उनका चित्त भगवान्में लगे। अथवा 'ताः' शब्दसे मुमुक्षुरूपा प्रजा समझनी चाहिये। उसपर कृपा करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की। वह मुमुक्षुरूपा प्रजा कैसी है ? 'रात्री:'— 'रा दाने' इस स्मृतिके अनुसार दान करनेवाली अर्थात् दानोपलक्षित यज्ञादि कर्म करनेवाली। जैसा कि कहा—'तमेतं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसा ब्रह्म विविदिषन्ति।' अथवा 'भगवति स्वरूपेण सह सर्वसमर्पयित्री' जो भगवान्में अपने स्वरूपके सहित सर्वस्व समर्पण करनेवाली है तथा जो 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' है।

श्रीरासलीलारहस्य २२७ 'शरादिवत् घ्नन्ति अवखण्डयन्ति उत्फुल्ल- मल्लिकाद्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासां ताः।' अर्थात् उत्फुल्लमल्लिकाओंके समान जो स्त्री- पुत्रादिरूप सांसारिक सुख हैं, वे शरादि अस्त्र- शस्त्रके समान जिनका खण्डन करती हैं, उन मुमुक्षुरूपा प्रजाओंको देखकर। इससे उन मुमुक्षुओंकी पूर्ण योग्यता दिखायी गयी है; क्योंकि पूर्ण मुमुक्षु तभी होता है, जब कि उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट सांसारिक सुख भी उसे दुःखरूप दिखायी देने लगे। वास्तवमें तो मुमुक्षुता होती ही उस समय है, जब संसार भयानक दिखायी देने लगे। उसे सांसारिक सुख शरादिके समान छेदन करनेवाले दिखलायी देते हैं, वही मुमुक्षु हो सकता है। ऐसी प्रजाओंको देखकर— 'योगमायामुपाश्रितः योगाय स्वेन सह सम्बन्धविच्छेदाय।' अपने साथ उनके असम्बन्धका छेदन करनेके लिये अर्थात् अपने साथ उनकी अभिन्नता स्थापित करनेके लिये भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यहाँ केवल व्रजदेवियोंके साथ ही क्रीड़ा नहीं करनी थी, बल्कि श्रुतियोंका आवाहन करके उनका भी अपनेमें तात्पर्य दृढ़ करना था। भगवान्की यह लीला ओषधिरूपा होगी। जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंके लिये यह श्रोत्रमनोभिरामा है, वैसे ही मुमुक्षुओंके लिये यह भवौषधिरूपा है। अतः— 'ताः मुमुक्षुरूपाः प्रजाः वीक्ष्य, ताश्च श्रुतीः आहूय, ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उस मुमुक्षुरूपा प्रजाको देखकर और उन श्रुतियोंका भी आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् मुमुक्षुओंको संसारसे निर्विण्ण देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। मुमुक्षु लोग संसारसे निर्विण्ण क्यों हैं? इसका हेतु यह है—वे विशुद्धान्तःकरण हैं, इसलिये विवेकसम्पन्न हैं और विवेकीके लिये सब कुछ दुःखरूप ही है—'दुःखमेव सर्वं विवेकिनाम्'— उनके लिये संसारके सारे सुख भाले और बछियोंके समान हो जाते हैं। उनके उद्धारका उपाय क्या है? यही कि श्रुतियोंका परम तात्पर्य एकमात्र परब्रह्ममें ही निश्चित हो। किंतु पहले यह होता नहीं, अतः भगवान्ने उनका आह्वानकर अपनेमें उनका तात्पर्य दृढ़ किया। यहाँ जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने व्रजांगनाओंका आवाहन किया था, उसी प्रकार व्यासरूपसे उन्होंने ब्रह्मसूत्ररूप वेणुनादद्वारा समस्त श्रुतियोंका आवाहन करके उनका परम तात्पर्य परब्रह्ममें निश्चित किया है। गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। (रा०च०मा० १।१८) यहाँ 'अरथ' तो पूर्ण परब्रह्म परमात्मा है और 'शब्द' ये श्रुतियाँ हैं। अतः श्रुतियाँ तरंग हैं और ब्रह्म समुद्र है। इसी प्रकार गोपांगनाएँ तरंग हैं और भगवान् श्रीकृष्ण समुद्र हैं। इनका परस्पर तादात्म्य-सम्बन्ध है। उन श्रुतियोंका आवाहनकर अर्थात् अपनेमें उनका तात्पर्य निश्चयकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भावुकोंकी दृष्टिसे एक और ही अर्थ होता है— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः 'अगमायाम् उपाश्रितः'—'न गच्छतीति अगा, अगा चासौ मा अगमा'। अर्थात् नित्यश्लिष्टा वृषभानुनन्दिनी। वह कौन है?—'यामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मनश्चक्रे', अर्थात् जिसका आश्रय लेकर भगवान्ने भी रमण करनेकी इच्छा की। क्यों इच्छा की? शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको देखकर। अथवा यों समझो— 'योगमायामुपाश्रितः भगवानपि रन्तुं मन- श्चक्रे—योगाय अघटितघटनाय या माया इति योगमाया ताम उपाश्रितः।' अर्थात् जो माया अघटितघटनापटीयसी है, उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। यहाँ भगवान्को अपना ऐश्वर्य छिपाना था; क्योंकि यह मधुर लीला है, अतः इसमें ऐश्वर्यभाव

रसका विघातक है। इसमें प्राकृतांश ही अधिक उपयुक्त है। इसीसे भगवान्‌की जिन लीलाओंमें प्राकृतांश विशेष है उन्हींका महत्त्व भी अधिक है; क्योंकि प्राकृत व्यापारोंमें व्यासक्त प्राणियोंको आकर्षित करनेमें प्राकृतभाव अधिक उपयोगी है। अतः ‘योगमायामुपाश्रितः—योगमायां उप सामीप्येन आश्रितः, न तु साक्षात्'—सामीप्यवश योगमायाका आश्रय लेकर, साक्षात्रूपसे नहीं। जिस प्रकार स्वाभाविक होनेके कारण सूर्यभगवान् अपनी किरणोंका आश्रय लेते हैं। उन्हें किरणें धारण नहीं करनी पड़तीं, बल्कि जहाँ वे रहते हैं, वहाँ उनकी किरणें भी रहती ही हैं, इसी प्रकार भगवान्‌की योगमाया भी उनके साथ रहती ही है। अतः अघटनघटनमें समर्थ जो योगमाया, उसका सर्वथा समाश्रयण न करके भगवान्‌ने प्राकृतवत् लीलाएँ कीं, जिससे प्राकृत प्राणियोंका विशेष आकर्षण हो सके। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान्‌की योगमाया सर्वदा उनके साथ रहती है, इसलिये हठात् अपना काम कर देती है। जब मिट्टी खानेके उपरान्त भगवान्‌ने श्रीयशोदाजीसे मुख देखनेको कहा तो उन्होंने यह नहीं समझा कि मैया सचमुच मेरा मुख देखेगी। वे यही समझते थे कि ऐसा कहनेसे मुझे निर्दोष समझकर वह छोड़ देगी। परंतु जब उसने कहा—‘दिखला' तो उनका मुख फैल गया।१ भगवान्‌ने मुख फैलाया नहीं, बल्कि जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे कमल खिल जाता है, उसी प्रकार माताके कोपरूप सूर्यका ताप पाकर भगवान्‌का मुखकमल खुल गया। उस समय योगमायाने देखा कि मुखमें मिट्टी देखकर माता हमारे प्रभुको मारेगी; इसीसे उसने उनके मुखमें सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया। इसी प्रकार इस लीलामें भी योगमाया कई ऐश्वर्यभाव दिखायेगी। अथवा भगवान्‌ने उन रात्रियोंको देखकर 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां योगमायां वंशीम्'—व्रजांगनाओंके योग-संश्लेषके लिये माय२ (शब्द) जिसमें रहते हैं, उस वंशीका नाम योगमाया है; उसका आश्रय करके भगवान्‌ने व्रजांगनाओंको बुलाकर रमणकी इच्छा की। यह उचित भी है; क्योंकि जिस प्रकार गिरिराजका आश्रय लेकर भगवान्‌ने इन्द्रके दर्पका दमन किया था, उसी प्रकार कन्दर्पदर्प-दमन इसके द्वारा होगा। वंशी क्या है? यह महारुद्र है और कामदेवके दर्पका दमन महारुद्र ही कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि अपने संसर्गद्वारा स्वस्वरूप बना लेनेपर ही किसीके साथ रमण हो सकता है। वस्तुतः भगवद्व्यतिरिक्त तो कोई पदार्थ है नहीं। भगवद्रूपमें ही भिन्नताकी प्रतीति हुआ करती है और भगवत्सम्बन्धसे ही उसकी निवृत्ति होकर भगवद्रूपताकी प्रतीति होती है। वह सम्बन्ध क्या है? व्यवधानकी निवृत्ति। व्यवधानकी निवृत्ति होते ही भगवान्‌से अभेद हो सकता है। अतः भगवान्‌ने वंशीध्वनिद्वारा अपनी अधरसुधाका संचार करके समस्त वृन्दारण्य और तद्वर्ती गुल्म, लता एवं गोपांगनादिको स्वस्वरूप बना दिया। इसीसे 'योगाय भगवत्संश्लेषाय मायः शब्दो यस्यां तां वंशीं उपाश्रितः'—योग अर्थात् भगवत्संश्लेषके लिये जिसमें माय अर्थात् शब्द है, उस वंशीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। मानो उस वंशीकी उपासना करके ही भगवान् व्रजांगनाओंके मनोंको आकर्षित करनेमें समर्थ हुए। ‘अपि' शब्दका आशय यही है कि यद्यपि था तो अनुचित तथापि भगवान्‌के सम्बन्धमात्रसे उचित ही हो गया; क्योंकि साधारणतया सभी कन्याओंका प्राथमिक सम्बन्ध गन्धर्व आदिके साथ होता है। चन्द्रमा तो वैसे सभीके मनके अधिष्ठाता हैं। मनकी आवश्यकता सभी सम्भोगोंमें है और मनको सर्वत्र ही अपने अधिष्ठातृदेव चन्द्रमाकी अपेक्षा है। अतः चन्द्रमा सर्वभोक्ता हैं। परंतु व्यष्टि अभिमान ही पुण्य- पापका मूल है, चन्द्रमा सभीके मनके अधिष्ठाता हैं, १-यहाँ अकर्मक 'व्यादत्त' क्रियाका प्रयोग किया गया है। (श्रीमद्भा० १०।८।३६) २-मीयते वक्ता अनेन इति मायः शब्दः।

श्रीरासलीलारहस्य २२९ अतः उनमें व्यष्टि अभिमान नहीं है। इसी कारण उन्हें पुण्य-पापका संसर्ग नहीं है। जैसे चन्द्रमा सबके मनका अधिष्ठाता है, वैसे ही भगवान् सबके अन्तरात्मा हैं। जैसे सभी सम्भोगोंमें मनकी अपेक्षा है, उससे भी अधिक सभी सम्भोगोंमें अन्तरात्माकी अपेक्षा है; क्योंकि अनुकूल-प्रतिकूल शब्दस्पर्शादि विषय तथा सुख-दुःखादिका साक्षात्कार अन्तरात्माके ही अधीन है। शब्दादि विषयोंके आकारसे आकारित वृत्तिमान् अन्तःकरण, आत्मचैतन्य-ज्योतिसे देदीप्यमान होकर ही शब्दादि-विषयका प्रकाशन करता है। भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं, यह बात भी श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित वचनोंसे स्पष्ट है— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्॥ कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६; १०।१४।५५) जबकि प्राणिमात्रके लिये जल, तेज तथा वायुका सर्वांगीण स्पर्श अनिवार्य है, तब ऐसी कौन-सी पतिव्रता है, जिसके सर्वांगका स्पर्श वायु, आकाश आदिसे न होता हो? फिर भगवान् श्रीकृष्ण तो आकाश और अहंतत्त्व, महत्तत्त्व तथा अव्यक्ततत्त्व इन सभीके अधिष्ठान और इन सभीसे आन्तर हैं। इस बातका भी वहीं उल्लेख है, जहाँ श्रीकृष्णकी चीरहरण और रासक्रीड़ाप्रभृति लीलाओंका वर्णन है। सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः। तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५७) समस्त वस्तुओंका याथात्म्य उनके कारणमें ही पर्यवसित है। उस कारणका भी पर्यवसान जहाँ है, वही कार्यकारणातीत सर्वाधिष्ठान परतत्त्व श्रीकृष्ण हैं। फिर उनसे भिन्न कौन-सा तत्त्व है, जिसका निरूपण किया जाय? अतः सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके साथ भेद ही क्या हो सकता है? अतः उनके सन्निधानमें निष्कपट और निरावरण होनेसे ही जीवका परम कल्याण होता है। भगवत्साक्षात्कारके लिये भगवल्लीलाओंका श्रवण-कीर्तन अनिवार्य है भगवान्‌की अचिन्त्य महाशक्तिरूपा योगमाया श्री, भू और लीलारूपा है। इनमेंसे प्रधानतया लीलाशक्तिका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। पहले जहाँ मुमुक्षुरूपा प्रजाका उल्लेख किया है, वहाँ 'योगमायामुपाश्रितः' इस पदका तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिये—'योगाय स्वस्मिन् योजनाय या माया कृपा' अर्थात् योग—अपनेमें जोड़नेके लिये जो माया (कृपा); अथवा 'योगाय स्वलीलासुखे योजनाय या माया कृपा'—योग अर्थात् अपने लीलासुखमें युक्त करनेके लिये जो कृपा अथवा 'यः भगवान् अगमायामुपाश्रितः'—जो भगवान् अगमामें उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। अगमा क्या है? 'न गच्छति चलति इति अगः कूटस्थं ब्रह्म, तस्य या प्रमा' अर्थात् जो गमन नहीं करता, उस कूटस्थ ब्रह्मका नाम अग है, उसकी प्रमा यानी अपरोक्ष साक्षात्कार ही अगमा है; 'तस्यां' 'अगमायां तत्सम्पादने मुमुक्षुभिरुपाश्रितः यः सः'—उस अगमामें अर्थात् उसका सम्पादन करनेमें जो मुमुक्षुओंन्द्वारा आश्रय किया जाता है, उस परब्रह्मने मुमुक्षुओंपर अनुग्रह करनेके लिये ही रमण करनेको मन किया; क्योंकि सच्चिदानन्दरूप श्रीहरिका अपरोक्ष साक्षात्कार उनकी लीला-कथाओंके अनुशीलनसे ही होता है। पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये। वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम्। त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते॥ (श्रीमद्भा० ३।५।४५-४६) भाव यह है कि हे देव! कोई तो आपके

२३० भक्तिसुधा कथामृत-पानसे बढ़ी हुई भक्तिके कारण विशुद्धान्तःकरण होकर, वैराग्य ही जिसका सार है, ऐसा बोध प्राप्त करके आपके निर्द्वन्द्व धामको प्राप्त होते हैं और कोई आत्मसंयमके द्वारा समाधि-लाभकर उससे प्रबल प्रकृतिको जीतकर परमपुरुष आपको ही प्राप्त होते हैं। किंतु उन्हें श्रम होता है और आपकी सेवामें कोई कष्ट नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्‌ने यह लीला मुमुक्षुओंके कल्याणके ही लिये की थी, जिससे वे उस लीला-कथाका पान करते हुए भगवान्‌को प्राप्त कर सकें। और यदि 'अयोगमायामुपाश्रितः' ऐसा पद समझा जाय तो 'न युज्यते उपाधिसङ्गं न प्राप्नोति इति अयोगः तस्य या प्रमा तस्यामुपाश्रितः' अर्थात् जो उपाधिसंसर्गको प्राप्त नहीं होता, उसकी प्रमा अर्थात् अपरोक्षानुभवके लिये जो मुमुक्षुओंद्वारा आश्रित है। अथवा 'योगः उपाध्यध्यासः तस्य अभावः अपवादः अयोगः'—उपाधिजनित अध्यासके अभावका ही नाम अयोग है, उसकी जो प्रमा है, उसका नाम अयोगमा है, उस अयोगमाके लिये भगवान् मुमुक्षुओंद्वारा उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की; क्योंकि यह नियम है कि उपाधिजनित अध्यासका निराकरण सूक्ष्मातिसूक्ष्म परब्रह्मके ज्ञानसे ही होता है। यह ज्ञान कब होता है? इस विषयमें भगवान् स्वयं कहते हैं— यथा यथात्मा परिमृज्यतेऽसौ मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः । तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।२६) अर्थात् मेरी पवित्र गाथाओंके श्रवण और कीर्तनद्वारा जैसे-जैसे यह अन्तरात्मा स्वच्छ होता जाता है, वैसे-वैसे ही साधक सूक्ष्म-वस्तुका साक्षात्कार करता जाता है, जिस प्रकार कि अंजनयुक्त नेत्र। अतः उपाध्यध्यासकी निवृत्तिका एकमात्र साधन भगवल्लीलाओंका अभ्यास ही है। श्रीमद्भागवत (१०।२।३५)-में कहा है— सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद् विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् । गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान् प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः ॥ हे भगवन्! यदि आप यह लीलामय विग्रह धारण न करें तो अज्ञानका भेदन करनेवाले विज्ञानकी सफाई ही हो जाय। यदि कोई कहे कि हम अनुमान कर लेंगे; क्योंकि चक्षु, श्रोत्र एवं त्वचा आदि इन्द्रियोंद्वारा जो विषयोंका ग्रहण हुआ करता है, वह आत्मतत्त्वके अस्तित्वका द्योतक है। जिस प्रकार शीतलता और उष्णतासे रहित लोहपिण्डमें दाहकत्व एवं प्रकाशकत्व देखकर वहाँ दाहकत्व-प्रकाशकत्व समर्पण करनेवाले नित्य-दाहकत्व-प्रकाशकत्व- गुणविशिष्ट अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंके विषयप्रकाशनसामर्थ्यसे चिन्मय आत्माका अनुमान होता है। साथ ही जिस प्रकार यह देखा जाता है कि लोहपिण्डादिमें जो दाहकत्व-प्रकाशकत्व है, वह सातिशय है और अग्निमें निरतिशय, उसी प्रकार यह भी अनुमान किया जा सकता है कि इन्द्रियादिका प्रकाशक आत्मा निरतिशय-ज्ञानमय है। परंतु यह केवल अनुमान ही तो है, इसे साक्षात्कार नहीं कह सकते। अतः यदि साक्षात्कार करना है तो भगवान्‌की लीला आदिका श्रवण करना चाहिये। इससे प्रेमकी अभिवृद्धि होगी। प्रेमसे चित्तमें शिथिलता आयेगी, इससे वह निर्वृत्तिक होगा और निर्वृत्तिक चित्तपर ही परब्रह्मका प्रकाश होगा। अतः भगवत्साक्षात्कारके लिये भग

  • श्रीरामलीलारहस्य * २३१ परमरस समर्पण करनेवाली उन रात्रियोंको देखकर। यहाँ 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है। उनमें मुख्य विलक्षणता तो यही थी कि जिन भगवान् श्रीकृष्णके विप्रयोगमें गोपांगनाओंको एक-एक पल युगोंके समान बीतता था, उन्होंने इन रात्रियोंको अपने सहवास-सौभाग्यके लिये नियुक्त किया था। व्रजांगनाएँ संसारमें सबसे बड़ा सौभाग्य क्या समझती थीं ? वे कहती हैं— अक्ष्णवतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतौर्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) यहाँ व्रजांगनाओंने संसारभरमें सबसे बड़ा फल यही बताया है कि जिन्हें विधाताने नेत्र दिये हैं, वे अपने समवयस्क बालकोंके साथ पशुओंको गोष्ठमें प्रवेश कराते हुए दोनों नन्दकुमारोंके अनुरक्त- कटाक्षमोक्षमण्डित वंशी-विभूषित मुखारविन्दका पान करें। इसके सिवा यदि कोई और भी फल हो सकता हो तो हम उसे जानतीं नहीं। स्मरण रहे, ये श्रुतियाँ हैं—साक्षात् श्रुतिदेवियाँ हैं, यदि ये ही नहीं जानतीं तो और कौन जानेगा ? इस श्लोकमें 'व्रजेशसुतयोः' यह तो द्विवचन है, किंतु 'वक्त्रम्' एकवचन है। इसका क्या रहस्य है ? इसका तात्पर्य यह है कि गोपांगनाओंका अभिमत तो केवल भगवान् श्रीकृष्णका ही मुखचन्द्र है; परंतु परकीया थीं न, इसलिये अपना भाव छिपानेके लिये द्विवचन दिया। किंतु जबतक वे प्रेमातिशयसे विभोर न हुईं, तबतक तो भावगोपन कर लिया, पर प्रेमातिरेक होनेपर वे अपनेको न सम्हाल सकीं और उनके मुखसे 'वक्त्रम्'...... 'अनुवेणु जुष्टम्' निकल ही गया। उस वेणुजुष्ट मुखका विशेषण 'अनुरक्तकटाक्ष- मोक्षम्' दिया है। यह उसकी मधुरता और लावण्य सूचित करनेके लिये है अर्थात् जिन भगवान् श्रीकृष्णके मुखचन्द्रपर अनुरागिणी गोपांगनाओंके कटाक्षबाण छूटते थे; अथवा जिस मुखमें अनुरागिणी व्रजांगनाओंके लिये कटाक्षमोक्ष होता था। अतः भगवान्‌का रसस्वरूप मुख ही व्रजबालाओंका ध्येय है, उन्हें भगवत्सम्बन्ध ही परम अभिलषित था। इसीके लिये वे दूसरोंसे ईर्ष्या भी करती थीं। एक जगह वे कहती हैं— धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) उन्हें इस समय यह भी ध्यान नहीं था कि ये हरिणियाँ चेतन हैं या अचेतन और इन्हें वस्तुतः भगवान्‌के प्रति अनुराग है या नहीं। इसीसे वे कहती हैं कि इन हरिणियोंका जो प्रेमरसप्लुत नेत्रोंसे निरीक्षण है, उसके द्वारा वे मानो भगवान्‌की पूजा ही करती हैं। यही नहीं, वे वहाँकी भीलनियोंके सौभाग्यकी भी सराहना करती हैं— पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग- श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) वृन्दारण्यके जो तृण-गुल्म-लतादि हैं, उनसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका संयोग होनेके कारण उनमें जो भगवान्‌के पादपद्मोंमें लगा हुआ प्रियतमाओंका कुचकुंकुम लग गया है, उसके सौगन्ध्यसे विमुग्ध होकर कामज्वरसे सन्तप्त हुई भीलनियाँ उस कुंकुमको अपने हृदय और मुखमें लगाकर उस तापको शान्त करती हैं। वे बड़ी भाग्यशीला हैं। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ अनुरागिणी व्रजांगनाओंका संयोग करानेवाली इन रात्रियोंकी विलक्षणताका वर्णन कौन कर सकता है ? जबसे भगवान्‌ने कहा था कि 'मयेमा रंस्यथ क्षपाः' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) तभीसे गोपांगनाओंकी दृष्टि इन्हीं रात्रियोंपर लगी रहती थी। इन रात्रियोंका

सर्वत्र ‘ताः इमाः’ आदि सर्वनामोंसे ही वर्णन किया गया है। एक बार भगवान्‌ने भी उद्धवजीसे कहा था— तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण। क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।११) हे उद्धव! उन व्रजांगनाओंने अपने परम प्रियतम मेरे साथ वे अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ आधे क्षणके समान बिता दी थीं। जिस प्रकार समाधिस्थ योगियोंको अत्यन्त दीर्घ काल भी कुछ मालूम नहीं होता, उसी प्रकार मेरे साथ उन्हें वे रात्रियाँ कुछ भी न जान पड़ीं। किंतु अब मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये कल्पके समान हो जाती थीं। यहाँ ‘मया’ शब्दमें भी विलक्षणता है। इससे अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध परब्रह्म भी ग्रहण किया जा सकता है। उसके साथ योग होनेपर भी समय कुछ मालूम नहीं होता। अतः इससे पूर्ण योगीन्द्र भी ग्रहण किये जा सकते हैं। परंतु यहाँ अस्मत्प्रत्ययगोचर शुद्ध ब्रह्म अभिप्रेत नहीं है, बल्कि वृन्दावनगोचर परमानन्द- कन्द श्रीकृष्णचन्द्र ही अभिप्रेत हैं। फैली हुई वस्तु यदि इकट्ठी हो जाय तो उसमें कुछ विलक्षणता हो ही जाती है। अतः जो व्यापक पूर्णतत्त्व श्यामसुन्दररूपमें वृन्दारण्यमें गोचर हुआ, उसमें विलक्षणता होनी ही चाहिये। अथवा ‘वृन्दावने गाः चारयतीति वृन्दावन- गोचरः’—वृन्दावनमें गौएँ चरानेके कारण भगवान् वृन्दावन-गोचर हैं। जो परब्रह्म निर्विशेष है, वही यदि वृन्दावनमें गौ चरानेवाला हो जाय तो उसके प्रति प्रेमातिशय होना ही चाहिये; क्योंकि निर्विशेष ब्रह्म स्वारसिकी प्रीतिका विषय नहीं हो सकता। उसका विषय तो यह वृन्दावनस्थ कृष्ण ही हो सकता है। स्वारसिकी प्रीति प्रायः सजातीयोंमें ही होती है। भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम तो मनुष्यरूपमें अभिव्यक्त हुए; फिर गोप होनेके कारण उनके सजातीय ही थे। इसलिये ऐश्वर्यादिशून्य होनेके कारण उनके प्रति गोपोंका निःसंकोच भाव रहता था। इसीसे गोपालरूपसे प्रकट हुए भगवान्‌के प्रति उन गोपालिकाओंकी निःशंक प्रीति हुई। अथवा ‘वृन्दावने वृन्दावनवर्तिनां गाः इन्द्रियाणि चारयति स्वस्मिन् प्रवर्तयति इति वृन्दावनगोचरः’— वे वृन्दावनवर्ती गोप, बालक, गोपांगना, वत्स, पशु, पक्षी और सरीसृप सभीकी इन्द्रियोंको अपने प्रति प्रवृत्त करते हैं, इसलिये वृन्दावनगोचर हैं। अहो! जो भगवान् ब्रह्मादिकी भी इन्द्रियोंके अगोचर हैं, जो बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी इन्द्रियोंके भी विषय नहीं होते, वे ही अपनी असीम कृपासे वृन्दावनवर्ती जीवोंकी समस्त इन्द्रियोंके विषय हो रहे हैं। इसीसे कहा है— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।११) उन परम पुण्यवान् व्रजवासियोंने उन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ क्रीड़ाएँ कीं, जो सत्पुरुषोंके लिये साक्षात् ब्रह्मानन्दमूर्ति, भावुक भक्तोंके परम इष्टदेव और मायामोहित पुरुषोंके लिये नरबालक थे। भावुकोंका तो ऐसा कथन है कि जो ब्रह्म औपनिषदोंके लिये केवल वृत्तिव्याप्य है, बड़े-बड़े भक्तोंकी भी केवल भावनाका ही विषय है और जो अज्ञानियोंके लिये एक बालकमात्र है, वही जिन्हें खेलनेको मिल गया, उन व्रजवासियोंके सौभाग्यकी क्या महिमा कही जाय? ‘ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः॥’ (श्रीमद्भा० १०।१५।१९) उन गँवार ग्वालबालोंके साथ वे ग्रामीणोंकी-सी ही चेष्टाएँ किया करते थे। यह उनके प्रेमातिशयका ही फल था।

श्रीरासलीलारहस्य २३३ यदि कहो कि ऐसा हो ही नहीं सकता; क्योंकि ‘न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य’ (कठ० २।३।९), ‘यन्मनसा न मनुते’ (केन० १।१।५) इत्यादि वचनोंके अनुसार ब्रह्म तो समस्त इन्द्रियोंका अविषय है। वह वृन्दावनवासियोंकी इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘यन्मनसा न मनुते’ इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार वह समस्त इन्द्रियोंका अविषय होनेपर भी ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ (कठ० १।३।१२)—इस श्रुतिके अनुसार सूक्ष्म बुद्धिका विषय तो है ही। इसी प्रकार वह प्रेमदृष्टिका भी विषय हो ही सकता है। जिस प्रकार ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस श्रुतिको देखकर आप यह कल्पना करते हैं कि वह संस्कृत बुद्धिका ही विषय होता है, असंस्कृत बुद्धिका विषय नहीं होता, उसी प्रकार हम भी यह कह सकते हैं कि वह प्रेमदृष्टिका विषय है; क्योंकि इस सम्बन्धमें ये वाक्य प्रमाण हैं— भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ (गीता ११।५४) ‘नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजभक्तितः॥’ यदि कहो कि नहीं, मनसे ब्रह्म नहीं देखा जा सकता। ‘दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या’ इस वाक्यका अर्थ केवल इतना ही है कि महावाक्यके श्रवणसे ब्रह्मका आवरण निवृत्त होता है; फिर तो स्वयंप्रकाश ब्रह्मका स्वतः ही स्फुरण हो जायगा तो हम भी यही कह देंगे कि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है, प्रेमदृष्टिसे केवल उसका आवरण निवृत्त हो जाता है। अब यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि इन्द्रियगोचरत्वरूप हेतुके कारण ब्रह्म मिथ्या है तो ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इन्द्रियोंकी अविषयता तो परमाणुओंमें भी है तथापि वे मिथ्या नहीं माने गये हैं। अतः इन्द्रियगोचरतारूप हेतु मिथ्यात्वका साधक नहीं है। इससे सिद्ध हुआ कि श्रीकृष्णके सहवासके कारण ही व्रजांगनाओंने अनन्तकोटि ब्राह्मी रात्रियाँ क्षणार्धके समान बिता दी थीं और अब उनके बिना ही उन्हें साधारण रात्रियाँ भी कल्पके समान हो रही हैं। अतः जिन रात्रियोंने उन्हें इतना सुख पहुँचाया वे अवश्य विलक्षण ही थीं। इसका एक दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। महाराज परीक्षित्को एक बड़ा सन्देह था। उनके मनमें इस बातका बड़ा उद्वेग था कि भगवान् तो बड़े ही भक्तवत्सल हैं, उन्होंने सदा ही भक्तोंके ऊपर बड़ा अनुग्रह प्रदर्शित किया है; नन्द, उपनन्द आदि वृद्ध गोपोंको तो उन्होंने अपनी दिव्यातिदिव्य लीलाएँ दिखाकर परमानन्द प्रदान किया तथा उन्हें ब्रह्महद और महावैकुण्ठका भी दर्शन कराया; परंतु जो गोपांगनाएँ अनेक जन्मोंसे उनकी मधुरभावसे उपासना कर रही थीं, जिनमें अन्यपरा श्रुतियाँ, ऋषिचरी और देवकन्या आदि साधनसिद्धा व्रजांगनाएँ सम्मिलित हैं, यहाँतक कि उनमेंसे अनेकोंने तो भगवत्संस्पर्शकी कामनासे ललिता, विशाखा आदि यूथेश्वरियोंकी ही उपासना की थी—उन सबकी ओरसे न जाने भगवान् क्यों उदासीन थे? उनकी मनोकामना भी तो पूर्ण होनी ही चाहिये थी। भगवान् तो आप्तकाम हैं, फिर गोपांगनाओंकी मनोकामना कैसे पूर्ण हो? गोपांगनाओंकी तो यह अभिलाषा बहुत समयसे थी, किंतु जबतक भगवान्को रमणाभिलाष न हो, तबतक उसकी पूर्ति कैसे हो सकती है? परीक्षित्को यह सन्देह हो ही रहा था कि श्रीशुकदेवजी बोल उठे— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) तात्पर्य यह है कि ‘भगवानपि उपाश्रितः उपासितः मायां वीक्ष्य ता रात्रीश्चक्रे’—उनके द्वारा इस जन्म और पूर्वजन्मोंमें उपासित हुए भगवान्ने भी मायाकी ओर देखकर वे विलक्षण रात्रियाँ बनायीं। व्रजांगनाओंके विविध भेद इन मुनिरूपा और श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंके भी कई भेद हैं। श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंमें जो अनन्यपरा हैं,

२३४ भक्तिसुधा उनमें भी मानिनी और मुग्धा—ये दो भेद हैं। जो श्रुतियाँ निषेधमुखसे परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, वे मानिनी हैं; जैसे 'नेति नेति', 'अशब्दमस्पर्शमरू- पमव्ययम्' (कठ० १।३।१५) इत्यादि। भावुकोंने इसके बड़े विलक्षण तात्पर्य व्यक्त किये हैं। जिस प्रकार मानिनी नायिका ऊपरसे अनभिलाष दिखलाते हुए भी भीतरसे सर्वथा नायकका ही अनुकरण करती है, उसी प्रकार ये निषेधमुख श्रुतियाँ भी 'न-न' करके ही अपने परम ध्येय परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं। 'नेति-नेति' वचनामृत बोलती तथा मुग्धा साक्षात् रूपसे परब्रह्मका निरूपण करती हैं; जैसे 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म', (तैत्तिरीय० २।१) 'यत्साक्षाद- परोक्षाद् ब्रह्म' इत्यादि। इसके सिवा जो अन्यपरा श्रुतियाँ, मुनिचरी और देवकन्यारूपा व्रजांगनाएँ हैं, उनमें कोई तो सख्यभाववाली हैं और कोई कान्तभाववाली हैं। इनमें सख्यभाववती परिपक्वा हैं और कान्तभाववती अपरिपक्वा हैं। सख्यभाववालियोंका नित्य निकुंज-लीलामें भी प्रवेश है; क्योंकि उनका व्रत तत्सुखसुखित्व है तथा जो कान्तभाववती हैं, वे भी ललितादिकी उपासना करके सख्यभाववती हो जाती हैं; जैसा कि कहा है— मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबलाः। ब्रह्म मां परमं प्रापुः सङ्गाच्छतसहस्रशः॥ (श्रीमद्भा० ११।१२।१३) अर्थात् जो मेरेमें जारभाव रखनेवालीं और मेरे स्वरूपको नहीं जानती थीं, वे भी यूथेश्वरी आदिके संगसे मुझ परब्रह्मको प्राप्त हो गयीं। इसका यह भी तात्पर्य है कि जो पहले कान्तभाववाली थीं, वे पीछे सख्यभाववाली हो गयीं। तब इसी श्लोकका दूसरे प्रकारसे अर्थ किया जायगा। 'मम इमाः मत्काः'—जो मेरी ममताकी आस्पद हैं; मैं स्वयं बड़े-बड़े योगीन्द्रोंकी ममताका आस्पद हूँ, और उनमें मेरी भी ममता है और अबला हैं; 'बलं आत्मनिष्ठादार्ढ्यं तच्छून्याः' अर्थात् आत्मनिष्ठाकी परिपक्वतासे रहित हैं; और मेरी प्राप्ति आत्मनिष्ठोंको ही होती है; क्योंकि श्रुति कहती है—'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'। (मुण्डक० ३।२।४) इसीसे यह भी कहा है—'पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत्' अर्थात् उपक्रमोपसंहारादि षड्विध लिंगसे श्रुतियोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें निश्चितकर फिर बाल्यसे—बालभावसे यानी संशय-विपर्ययरहित होकर स्थित हो। इस प्रकार जो मदीया होनेपर भी मेरेमें पूर्णतया परिनिष्ठिता नहीं है अथवा मेरे प्रति पूर्ण आत्मीयताका भाव नहीं रखतीं और कैसी हैं? 'अस्वरूपविदः' अर्थात् मैं शुद्ध-बुद्ध-परब्रह्म हूँ, ऐसा नहीं जानतीं अथवा जिन्हें मेरी परम प्रेमास्पदताका ज्ञान नहीं है; क्योंकि भगवान्‌के साथ प्रेम-सम्बन्ध हो जानेपर तो भक्त उनपर अपना अधिकार समझने लगता है; तब तो भक्तवर बिल्वमंगलकी तरह वह भी कहने लगता है— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुषं गणयामि ते॥ फिर तो विवश हो जानेके कारण उसके हृदयसे हरि कभी हटते ही नहीं। विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) जिस प्रकार पिघली हुई लाखमें यदि हल्दी मिला दी जाय तो फिर उन दोनोंका पार्थक्य नहीं हो सकता, उसी प्रकार भक्तके द्रवीभूत मनसे जब भगवान्‌के स्वरूपका तादात्म्य हो जाता है तो उनका कभी विप्रयोग नहीं होता। फिर भक्तहृदय भगवान्‌को नहीं भूल सकता और भगवान् भक्तके हृदयको नहीं छोड़ सकते। उन गोपांगनाओंका भाव इतना प्रौढ़ नहीं हुआ था; इसीसे वे अबला और अस्वरूपविद् थीं; किंतु उन्होंने भी 'ब्रह्म मां परमं प्रापुः'—मुझ परब्रह्मको प्राप्त कर लिया। कौन ब्रह्म? 'परमम्'—'परा उत्कृष्टतमा अभिमता मा श्रीराधा यस्य तम्।'

श्रीरासलीलारहस्य २३५ अर्थात् जिसको पराशक्ति मा*—श्रीराधिकाजी ही अभिमत हैं, उस परम ब्रह्मको प्राप्त कर लिया। यह अर्थ सख्यभाववती गोपांगनाओंके लिये अनुकूल ही है; क्योंकि श्रीवृषभानुसुता स्वाधीनभर्तृका होनेके कारण मुख्य नायिका हैं; अतः वे ही भगवान्‌की परम प्रेयसी हैं। शेष सब सखियाँ कान्तभावशून्य सख्यभाववाली हैं; इसलिये वे उन सबकी भी सेव्य हैं। वह परब्रह्म कैसा है? 'मा रमणम्—मायां रमणं यस्य' अर्थात् जिसका ब्रह्माकारप्रमा अथवा श्रीवृषभानुनन्दिनीमें रमण है और कैसा है—'जारम्' अर्थात् जो जारबुद्धिसे वेद्यमात्र है, वस्तुतः जार नहीं; क्योंकि परमात्मा है। अथवा 'जरयति कामवासनाम् इति जारम्' कामवासनाको जीर्ण कर देता है; इसलिये ब्रह्म जार है। ऐसे मुझ परब्रह्मको 'ताः शतसहस्रशः सङ्गात्प्रापुः'—उन सैकड़ों-हजारों गोपांगनाओंने (ललितादिके) संगसे प्राप्त कर लिया अर्थात् पहले वे कान्तभाववाली थीं, किंतु इनके सहवाससे सख्यभाववाली हो गयीं। रासकी रात्रियोंकी विलक्षणता 'ताः' शब्द विलक्षणताका द्योतक है—यह बात ऊपर कही जा चुकी है। उन रात्रियोंकी विलक्षणताका यद्यपि पहले भी वर्णन किया जा चुका है तथापि यहाँ हम फिर उनकी कुछ विलक्षणताओंका विचार करते हैं। उनमें एक तो यह बहुत बड़ी विलक्षणता थी कि अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंका एक ही समयमें निर्माण हुआ और वे सब-की-सब पूर्णचन्द्रसम्पन्ना थीं। यद्यपि दक्षप्रजापतिके शापके कारण चन्द्रमाकी पूर्णता स्थायी नहीं है तथापि यहाँ भगवान्‌ने जो रात्रियाँ बनायीं, वे सभी पूर्णचन्द्रसमलंकृता थीं। साथ ही एक विशेषता और भी थी। अन्य रात्रियोंमें चन्द्रमा पूर्व दिशामें उदित होकर जब मध्याकाशमें पहुँच जाता है तो फिर वह जैसे-जैसे पश्चिमकी ओर जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी ज्योति क्षीण होने लगती है; परंतु इन रात्रियोंमें चन्द्रमाकी गति केवल मध्याकाशपर्यन्त ही थी। इसके सिवा एक विचित्रता यह भी थी कि रात्रियोंका अनुभव केवल व्रजांगनाओंको ही हुआ था और सबके लिये तो वह एक प्राकृत रात्रि ही थी। यदि सबको ऐसा ही अनुभव होता तो इतने समयतक पुत्रप्राणा यशोदा और स्नेहमूर्ति नन्दबाबा किस प्रकार अपने लाड़ले लालका पार्थक्य सहन कर सकते? यह नियम है कि जब किसी दरिद्रको कोई महामूल्य रत्न मिल जाता है तो वह पल-पलमें उसकी सँभाल करता रहता है। इसी प्रकार माता यशोदा और नन्दबाबा भी अचिन्त्यानन्दघन परमानन्दमूर्ति भगवान् कृष्णको पुत्ररूपसे पाकर पल- पलमें उनका मुखचन्द्र निहारनेको लालायित रहते थे और रात्रिमें भी कई बार उठकर अपने लालकी देख- रेख करते थे। अतः उस रात्रिमें ही वे इतनी देर कैसे सोते रह सकते थे? परंतु वे जब उठे तभी उन्होंने श्रीकृष्णको अपने पास ही देखा। इस प्रकार ये रात्रियाँ बड़ी ही विचित्र थीं। इन्हीं रात्रियोंमें अनन्तकोटि व्रजांगनाओंकी चिरकालीन कामना पूर्ण हुई थी। इस सम्बन्धमें एक और भी विचार है। किन्हीं- किन्हींका मत है कि उस रात्रिमें शरद्, वसन्त और ग्रीष्म—इन तीनों ऋतुओंकी १८० रात्रियोंका अनुभव हुआ था और उनमें तीनों ही ऋतुओंकी रमणोपयोगी सामग्रियाँ विद्यमान थीं। रात्रियोंका नाम दोषा है। उनमें सदा ही कुछ-न-कुछ दोष रहते ही हैं, इससे रात्रिमें बहुत-से भय भी रहते हैं, किंतु भगवान्‌ने उन सब दोषोंकी निवृत्तिके लिये ये निर्दोष रात्रियाँ बनायीं। उनमें उपर्युक्त तीनों ऋतुओंकी रात्रियोंके समस्त गुण तो थे; किंतु दोष कोई न था। कोई ऐसा भी कहते हैं कि तीन ही क्या, उनमें तो सभी ऋतुओंकी रात्रियोंका निवेश किया गया था; क्योंकि वहाँ सभी ऋतुओंमें सेवन करनेयोग्य भोग्य-सामग्री देखी जाती है। इसके सिवा 'उत्फुल्लमल्लिकाः' इस विशेषणका भी यही तात्पर्य है कि उन रात्रियोंमें मल्लिकोपलक्षित सभी पुष्प खिले हुए थे। बहुत-से

  • मीयते सेव्यते प्राप्यते ज्ञायते योगीन्द्रमुनीन्द्रैर्वेदैश्च या सा मा।

२३६ भक्तिसुधा

पुष्प ऐसे हैं, जो रात्रिमें नहीं खिलते, परंतु वहाँ कुन्द और कुमुद साथ-साथ खिले हुए थे। जैसे— 'रेमे तत्तरलानन्दकुमुदामोदवायुना ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।४५) और— 'कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) इससे सिद्ध क्या होता है ? सो बतलाते हैं— वसन्त-ऋतु कामदेवका मित्र है। वह अभीतक अपने मित्रके वियोगमें सन्तप्त था। आज उसने सोचा कि जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र अपनी सौन्दर्य-सुधासे आत्माराम मुनियोंके भी मनोंको मोहित करनेवाले हैं, आज वे ही श्रीवृषभानुनन्दिनी और उनकी सहचरियोंके सौन्दर्यकणसे मोहित हो रहे हैं—'तद्दृशो दारुयन्त्रवत्।' अतः सम्भव है, आज परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र और व्रजसुन्दरियोंके सम्प्रयोगमें हमारे परम मित्र मनोजका उद्भव हो जाय। अतः इनके स्वागतके लिये हमें भी खूब तैयारी करनी चाहिये। इसीसे मानो मनोजमित्र ऋतुराजने सारे पुष्पोंको एक साथ विकसित कर दिया है। यद्यपि शरद्-ऋतुमें पुष्पोंका विकास रुक जाता है तथापि पुष्पविकासके विरोधी जाड्यमय शरद्-ऋतुमें भी मल्लिकादि उपलक्षित समस्त पुष्प खिल गये अर्थात् उस जाड्यमय समयमें भी पुष्पोंका विकास ही नहीं हुआ, प्रत्युत वे अत्यन्त विकसित हो उठे। किन्हीं-किन्हींका कथन है कि मल्लिकापुष्प शरद्-ऋतुमें फुल्लित होते हैं, वसन्तमें उन्मुख होते हैं और ग्रीष्ममें उत्फुल्ल हो जाते हैं; अतः यहाँ उत्फुल्लमल्लिका कहकर विरोधाभास द्योतित किया है। इससे सूचित होता है कि यहाँ शरदमें वसन्त- ऋतुका निवेश किया था। साथ ही वसन्तने यह भी सोचा कि भगवान् श्रीकृष्ण हमारे मित्र कामदेवको परास्त करनेका आयोजन कर रहे हैं। वह उनका प्रभाव जानता ही था। उसे यह मालूम था ही कि इन्होंने इन्द्र और ब्रह्माका भी मान-मर्दन कर दिया है। यही दशा कुबेर और वरुणकी भी हुई थी। अब ये सबपर विजय प्राप्त करके हमारे मित्रको भी जीतना चाहते हैं; परंतु वे भी किसीसे कम नहीं हैं। वे भी ब्रह्मादि-विजय-संरूंढदर्प हैं। अतः वसन्तने सोचा कि यह बड़ा विकट युद्ध होगा। इसलिये हमें मित्रवर मनोजकी सहायता करनी चाहिये; क्योंकि— धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिअहिं चारी ॥ (रा०च०मा० ३।५।७) अच्छा तो, हमें क्या करना चाहिये ? वीरोंके लिये सबसे बड़ी सहायता यही है कि उनके पास अस्त्र- शस्त्रोंकी कमी न रहे। हमारे मित्र पुष्पधन्वा हैं और उनके शस्त्र भी पुष्प ही हैं। अतः उनकी सहायताके लिये मुझे समस्त वृन्दारण्यको विविध प्रकारके सुन्दर और सुवासित सुमनोंसे सुसज्जित कर देना चाहिये। इसीसे उसने यथायोग्य कालकी अपेक्षा न करके सब प्रकारके पुष्पोंको विकसित कर दिया है। कामोद्रेकके आलम्बन-विभाव नायकके लिये नायिका और नायिकाके लिये नायक हैं तथा पुष्प, चन्द्रज्योत्स्ना, मलयानिल आदि उसके उद्दीपन-विभाव हैं। पुष्प तो साक्षात् कन्दर्पके बाण ही हैं। उनमें कुन्दकुड्मल तो शूलका काम करता है, जो उद्दीपन-विभाव नायक-नायिकाके संयोगमें रसवृद्धि करनेवाले हैं, वे ही उनका वियोग होनेपर अत्यन्त दुःखद हो जाते हैं। उस अवस्थामें कुन्दकुसुम शूल हो जाते हैं, केतक (केवड़ा) भालेका काम करता है और किंशुक (पलाशपुष्प) मानो अर्धचन्द्र बाण हो जाता है। किंशुकपुष्प रक्तवर्ण होता है, सो मानो वह विरहियोंका वक्षस्थल विदीर्ण करके उनके रक्तसे रंजित हो रहा है। इसी प्रकार अन्य पुष्पोंमें भी विभिन्न शस्त्रास्त्रकी कल्पना कर लेनी चाहिये। भगवान्की रची हुई ये रात्रियाँ प्राकृत नहीं थीं। अप्राकृत भगवान्के साथ अप्राकृत गोपांगनाओंकी यह अप्राकृत लीला अप्राकृत रात्रियोंमें ही होनी चाहिये थी। अतः भगवान्ने उन अप्राकृत रात्रियोंका निर्माण किया। इस प्रकार भगवान्ने रात्रियाँ तो बना लीं; परंतु

श्रीरासलीलारहस्य २३७ उनको अपना मन तो है नहीं, 'अप्राणो ह्यमना शुभ्रः।' इसलिये उन्होंने 'मनश्चक्रे' मन भी बनाया। तात्पर्य यह है कि अभीतक तो यही समझा जाता था कि भगवान् देह-देही-विभागसे रहित हैं; वे केवल भक्तानुग्रहके लिये ही शरीरादिमान्‌से प्रतीत होते थे। परंतु यह लीला इस तरह नहीं होगी। यहाँ तो उन्हें व्यासक्तचित्त होना पड़ेगा। यदि अमना भगवान् रमण करेंगे तो व्रजांगनाओंकी कामना पूर्ण न होगी। इसीसे उन्होंने मन भी बनाया। परंतु बनाया कैसे? 'योगमायां वीक्ष्य'— योगमायाकी ओर देखकर। इसमें उन्हें कोई कठिनता नहीं हुई; उन्होंने योगमायाकी ओर केवल देख दिया। उस निरीक्षणसे सब बात अपने-आप बन गयी। वह योगमाया क्या है? 'योगाय रमणाय अथवा अघटित- घटनाय या माया कृपा' अर्थात् रमण अथवा अघटित घटनाके लिये जो माया यानी कृपा है, वही योगमाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि अमनाका मनोनिर्माण और दोषा रात्रियोंको निर्दोष बनाना अघटितघटना ही तो है। ऊपर जो विवेचन किया गया है, उसके अनुसार 'शरदोत्फुल्लमल्लिकाः' इस पदकी व्युत्पत्ति एक अन्य प्रकारसे भी हो सकती है। यथा— 'शरान् ददातीति शरदः वसन्तः तेन उत्फुल्लानि मल्लिकोपलक्षितानि सर्वाणि पुष्पाणि यासु ताः।' अर्थात् जो कामदेवको शर प्रदान करता है, वह वसन्त ही शरद् है, उसने जिन रात्रियोंमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त पुष्पोंको विकसित कर दिया है, वे रात्रियाँ ही 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। शरद्-ऋतु विशेषतया जड़ताकी सूचक होती है। अतः इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि इस लीलाके प्रभावसे जाड्यमय-मलविशेषादिसमाक्रान्त मनमें भी मल्लिकाके समान प्रेमतत्त्वका विकास हो जाता है तथा भगवत्स्वरूप और भगवल्लीलाओंका अनुशीलन ही प्रधानतया प्रेमतत्त्वके आविर्भावमें हेतु है। प्रेमके आविर्भावमें जड़ाजड़का विचार भी नहीं है। इसीसे यहाँ दिखलाया है कि वृन्दावनमें जितने भी तृण-लता एवं वृक्षादि हैं, वे अचेतन नहीं, बल्कि चेतन ही हैं; यदि वे जड़ अर्थात् स्वभावपरतन्त्र होते तो शरद्-ऋतुमें असमय ही मल्लिकाओंका विकास कैसे होता? इन्हें अवसरका ज्ञान है और ये अपने स्वभावका भी विचार रखते हैं, इसीसे भगवल्लीलाका सुअवसर देखकर असमयमें भी वे पुष्पादि-सम्पन्न हो गये। इससे सिद्ध होता है कि व्रजके तरुवर एवं लताएँ भी चेतन ही हैं। इसीसे भगवान्‌ने बलभद्रजीका गुणकीर्तन करते हुए उनसे निवेदन किया था—'प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या' (श्रीमद्भा० १०।१५।६)—ये तरुवर सम्भवतः आपके प्रधान भक्त मुनिजन ही हैं। ये अपने आत्मभूत आपको किसी भी दशामें छोड़ना नहीं चाहते। अतः जिस प्रकार आप मनुष्याकार होकर गूढ़रूपसे लीला कर रहे हैं, उसी प्रकार ये भी वृक्षादिरूप होकर आपकी सेवामें उपस्थित हो गये हैं। ये अपनी पुष्पादि-सम्पन्न शाखारूप शिखाओंसे आपके पदतलसंस्पृष्ट पृथिवी- तलका स्पर्श करना चाहते हैं। इसके सिवा एक अन्य प्रसंगमें यह भी कहा है कि ये वृक्ष मानो वेदद्रुम हैं, इनकी जो शाखाएँ हैं, वे मानो माध्यन्दिनी आदि वेदकी शाखाएँ हैं, पल्लव मानो उपनिषदें हैं और उनपर जो पक्षी हैं, वे मानो आत्माराम मुनिगण हैं— 'आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान् शृण्वन्त्यमीलितदृशो विगतान्यवाचः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।१४) 'जो मनोहर-शोभारूप वृक्षकी भुजाओंपर आरूढ़ होकर अन्य किसी प्रकारका शब्द न करते हुए खुले नेत्रोंसे वंशीध्वनि श्रवण करते रहते हैं।' यहाँ 'अमीलितदृशः' यह पद विशेष रहस्यपूर्ण है। यद्यपि कानोंसे मुरलीध्वनि सुनते समय नेत्रोंका व्यापार रुक जाता है; क्योंकि जिस समय मन एक इन्द्रियके विषयका आस्वादन करनेमें तत्पर है, उस समय वह

२३८ भक्तिसुधा दूसरे इन्द्रियके विषयको किस प्रकार ग्रहण करेगा ? किंतु आपके रूप-लावण्यका तो विलक्षण माधुर्य है; वह उनके नेत्रोंको बन्द ही नहीं होने देता। अतः मालूम होता है कि ये पक्षिगण अवश्य कोई भगवत्कथानुरागी मुनिजन ही हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ भगवत्प्रकाश होता है, वहाँ सभी प्रकारके दोषोंका निराकरण होकर समस्त गुणोंका समावेश हो जाता है। यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। (श्रीमद्भा० ५।१८।१२) अर्थात् जहाँ श्रीहरिकी अनुरक्ति रहती है, वहाँ समस्त गुणोंके सहित सम्पूर्ण देव निवास करते हैं और वहाँ समस्त दोषोंका अभाव हो जाता है। जो पुण्यात्मा लोग श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌के प्रति भक्तिभाव रखनेवाले हैं, उनमें न क्रोध रहता है, न मत्सरता रहती है और न लोभ या अशुभ मति ही रहती है—'न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः।' अतः यदि भगवल्लीलाके लिये रची हुई उन दिव्य रात्रियोंमें समस्त गुणोंका विकास हुआ तो आश्चर्य ही क्या है ? इसीसे यहाँ एक दूसरा अर्थ भी किया जाता है— 'यः अगमायामुपाश्रितः'—'न गच्छन्तीति अगाः तत्रत्याः वृक्षाः तेषां या स्वविषयिणी मा मतिः प्रेमवती बुद्धिः मा अगमा तस्याम् उपाश्रितः तन्निमित्तमेव भगवान् ता आहूय रन्तुं मनश्चक्रे। अर्थात् जो विचलित नहीं होते, वे वहाँके वृक्ष ही 'अग' हैं, उनकी जो अपने प्रति प्रेमवती बुद्धि है, वही 'मा' है, उस अगमाका आश्रयकर अर्थात् उसीके लिये भगवान्‌ने उन गोपांगनाओंको बुलाकर रमण करनेकी इच्छा की। इसका सीधा-सादा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि भगवान्‌ने योगमायाका आश्रय लेकर उनके लौकिक-बन्धनोंका विच्छेद करनेके लिये उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। भगवान्‌ने देखा कि ये गोपांगनाएँ जन्म-जन्मान्तरसे मेरी उपासना करनेके कारण मेरे साथ रमण करनेयोग्य हो गयी हैं, ये लोककृत लज्जादि-बन्धनके योग्य नहीं हैं, किंतु दूसरी ओर उन्होंने यह भी देखा कि वे लौकिक बन्धनोंसे बँधी हुई हैं। इस प्रकार उनका दोनों ओर खिंचाव है। तथापि वे हैं कैसी ? 'रात्रीः' अर्थात् अपनेको और अपने सर्वस्वको मेरे ही पादपद्मोंमें समर्पण करनेवाली हैं। इनके धन, रूप और जीवन सब मेरे ही लिये हैं। इनकी दृष्टिमें मेरे बिना जीवनका कोई मूल्य नहीं है। उन्हें इस प्रकार उभयतः पाशरज्जुमें बँधा हुआ देखकर भगवान्‌ने अयोगाय— उनके लोक-कुल-लज्जादिरूप बन्धनके विच्छेदके लिये माया—कृपाका आश्रय लेकर उनके साथ रमणकी इच्छा की। इसीसे उन्होंने वेणुनादके द्वारा उनके लोक एवं कुल आदिके बन्धनोंको विच्छिन्न करके उन्हें प्रेमाकुल कर दिया। अथवा— 'अयस्कान्तमणिं प्रति अयोवद् अच्छति स्वभक्तान् प्रति या सा अयोगा; अयोगा चासौ माया—कृपा अयोगामाया'— जो अपने भक्तोंके प्रति इस प्रकार आकर्षित हो, जैसे लोहा चुम्बककी ओर, उसका नाम अयोगा है, ऐसी जो अयोगा माया—कृपा है, उसे ही अयोगमाया समझना चाहिये; क्योंकि भगवान्‌की कृपा भक्तोंके प्रति उसी प्रकार आकर्षित हो जाती है, जैसे चुम्बकके प्रति लोहा। यद्यपि भगवान्‌की कृपा सर्वदा सर्वत्र है तथापि उसका आकर्षण करनेमें भक्तजन ही समर्थ हैं। अतः भगवान् भी उसी कृपाके अधीन होकर उनके साथ रमण करनेको उद्यत हो गये; क्योंकि भगवान्‌की जो ऐश्वर्यशक्ति और मायाशक्ति हैं, वे भी अपनी नियन्त्री इस कृपाशक्तिके ही अधीन हैं। अथवा परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका जो दिव्य मंगलमय वपु है, वह अयस्कान्तमणिके समान है,