भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिन श्रीवृषभानुनन्दिनी अपने मणिमय प्रांगणमें बैठी थीं; उस समय उन्हें अपना ही प्रतिबिम्ब दिखायी दिया। उसे कोई अन्य नायिका समझकर उन्हें बड़ा खेद हुआ और उसका रूप-लावण्य देखकर वे सोचने लगीं कि यदि श्रीश्यामसुन्दरने इस नायिकाको देख लिया तो वे हमसे क्यों प्रीति करेंगे। वस्तुतः यह बात जो कही जाती है, ठीक ही है कि श्रीभगवान् और वृषभानुदुलारी परस्पर एक-दूसरेके सौंदर्यातिशयका तो समास्वादन कर सकते हैं, परंतु वे अपने-अपने सौन्दर्यका भोग करनेमें असमर्थ हैं। 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) उनका सौन्दर्य स्वयं उन्हींको विस्मयमें डाल देनेवाला है। यही भाव उस चित्रमें व्यक्त किया गया था, किंतु जिस प्रकार इस रहस्यको समझनेसे पूर्व हमें वह चित्र विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं जान पड़ता था, उसी प्रकार उस राजाको भी उस चित्रकारके लाये हुए चित्रमें कोई विशेषता नहीं जान पड़ी। तात्पर्य यह है कि वस्तु तो एक ही होती है; किंतु जो रसज्ञ हैं, उन्हें उसकी विशेष रसानुभूति होती है; अरसिकोंको तो आपातदृष्टिसे उसका कोई विशेष महत्त्व दिखायी नहीं देता। इसी प्रकार गोपांगनाएँ भगवान्के सौन्दर्य-माधुर्यातिशयकी सबसे बड़ी रसज्ञा थीं; इसलिये उससे दीर्घकालमें भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती थी। वे कात्यायनी-पूजन और विविधविध व्रताचरणरूप तपस्या करके योगारूढ़ हुई थीं। उससे यदि उन्हें एक रात्रिके लिये ही भगवत्सान्निध्यकी प्राप्ति होती तो वह उन्हें किसी प्रकार सन्तुष्ट न कर सकता। उन्हें जो महान् फल प्राप्त होनेवाला था, वह तो पूर्ण ब्रह्मसंस्पर्श था और ब्रह्मसंस्पर्श ही पूर्ण योगारोहण है, किंतु यदि यह अल्पकालके लिये होता तो उससे कैसे तृप्ति हो सकती थी? अतः उन्हें उनकी तपस्याका पूर्ण फल प्रदान करनेके लिये भगवान्की योगमायाने एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया था। इसीसे 'इमाः क्षपाः' और 'ता रात्रीः' इन बहुवचनोंका प्रयोग किया गया है। वेदान्तका यह सिद्धान्त है कि अल्पकालमें अनन्त कालका और अल्प देशमें अनन्त देशका समावेश किया जा सकता है। स्वप्नमें हम देखते ही हैं कि एक क्षणमें ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव हो जाता है। योगवासिष्ठमें पाषाणोपाख्यानमें एक शिलाके भीतर ही ब्रह्माण्डका प्रदर्शन कराया गया है तथा राजा लवणके उपाख्यानमें भी दो-ढाई घड़ीके भीतर ही वर्षोंके प्रसंगका अनुभव कराया गया है। इसी प्रकार यहाँ भी प्रहरचतुष्टयवती एक ही रात्रिमें अनन्तकोटि ब्राह्म रात्रियोंका समावेश किया गया है, जिससे उनकी चिरकालीन भगवत्सम्भोग- लालसाकी पूर्णतया पूर्ति हो। भगवान्के आलिंगनका कितना महत्त्व है? इसका वर्णन हम कहाँतक कर सकते हैं। हनुमान्जीकी अद्भुत सेवाओंसे सन्तुष्ट होकर भगवान्ने कहा था— एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ (वा०रा० ७।४०।२३) अर्थात् हे कपे! मैं तुम्हारे एक-एक उपकारके बदले अपने प्राणोंका समर्पण कर सकता हूँ; फिर भी वे बचे ही रहेंगे और उनके लिये हमें ऋणी रहना पड़ेगा। उन्हीं हनुमान्जीको उन्होंने अपना अद्भुत आश्लेष प्रदान करते हुए कहा था— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) भक्तोंका सर्वस्वभूत यह भगवदाश्लेष वस्तुतः अत्यन्त दुर्लभ है। यह तो ब्रह्मा एवं सनकादिको भी प्राप्त होना कठिन है। इसीको ब्रह्मसंस्पर्श भी कहते हैं। किंतु यदि यह ब्रह्मसंस्पर्श बाह्यस्पशोंके समान क्षणिक ही हुआ तो इसमें विशेषता ही क्या हुई! भगवत्सम्मिलन कभी अस्थायी नहीं हुआ करता; भगवान्की प्राप्ति हो जानेपर तो फिर पुनरावृत्ति ही नहीं होती 'मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥'