भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरामलीलारहस्य २१५ (गीता ८।१६) इसी दृष्टिसे भगवान्ने एक रात्रिमें प्राकृत पदार्थोंसे उनका रमण होना असम्भव है। जैसे ही अनन्त ब्राह्म रात्रियोंका समावेश करके उन्हें वृन्दावन भगवद्रूप है, वैसे ही वहाँकी रात्रियाँ भी अगणित रात्रियोंका अनुभव कराया। भगवद्रूपा हैं। ‘रात्री:’ शब्दका अर्थ निशा तो है ही, किंतु वे रात्रियाँ कैसी हैं? ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका:’ इसके सिवा इसका दूसरा तात्पर्य भी हो सकता है। (श्रीमद्भा० १०।२९।१) - शारदायामपि उत्फुल्लानि ‘रा दाने’ इस कोशके अनुसार ‘रा’ धातुका अर्थ मल्लिकोपलक्षितानि अशेषपुष्पाणि यासु ताः। ‘देना’ है, उसमें ‘तृन्’ प्रत्यय जोड़नेपर ‘रात्री’ शब्द अर्थात् शरत्कालमें मल्लिकासे उपलक्षित समस्त सिद्ध होता है, जिसका अर्थ ‘देनेवाली’ है। अर्थात् पुष्प खिले हुए हैं, वे रात्रियाँ। नियम तो ऐसा है कि गोपांगनाओंको अभीष्ट भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका सौन्दर्य- कई तरहके पुष्प दिनमें खिलते हैं, कई रात्रिमें तथा समास्वादन, उसे देनेवाली रात्रियाँ। ‘रात्री:’ शब्दके कई ग्रीष्ममें खिलते हैं और कई शरद्-ऋतुमें। किंतु पहले जो ‘ता:’ विशेषण है, वह उन रात्रियोंकी उस शरद्-ऋतुकी रात्रिमें सभी पुष्प अपने नियमोंको विलक्षणता द्योतित करता है। ‘ता: रात्री:’ अर्थात् छोड़कर खिल गये थे। इसी प्रकार चित्रकूटपर जिनके चरणोंका आश्रय लेनेवाले योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भगवान् रामके निवास करते समय वहाँके फलोंने भी अपने अभीष्ट तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उन्हीं अपनी ऋतुओंका नियम छोड़ दिया था। श्रीगोसाईंजी गोपांगनाओंकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली होनेके महाराज कहते हैं- कारण वे रात्रियाँ विलक्षण थीं। सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥ ये दानशीला रात्रियाँ इसलिये अत्यन्त विलक्षण (रा०च०मा० ६।५।५) हैं; क्योंकि पात्र और देय के महत्त्वसे दानका महत्त्व उसी प्रकार इस समय मानो सभी पुष्पोंने यही होता है। श्रीव्रजांगना-जैसे सर्ववन्द्य पात्रोंके लिये निखिल सोचा था कि हमारी शोभा और सुगन्धकी सार्थकता रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णतत्त्वको प्रदान करनेवाली हैं और इसीमें है कि हम श्रीभगवान्की प्रसन्नता-सम्पादन श्रीकृष्ण-जैसे परमपावन पात्रके लिये उन श्रीवृषभानु- करनेमें समर्थ हो सकें। जहाँ सारी प्रकृति अपनी नन्दिनीको प्रदान किया, जिनके लिये श्रीकृष्ण उत्सुक प्रजाओंके साथ प्रभुकी सेवामें उपस्थित होना चाहती और लालायित थे। अन्न, वस्त्र, रत्न, भूमि आदि समस्त है, वहाँ ये पुष्पादि उद्दीपन विभाव भी प्रभुकी दानोंसे ब्रह्मदान सर्वोत्कृष्ट है, समस्त पात्रोंमें ब्रह्मवित् प्रसन्नता-सम्पादन करनेको उत्सुक हो रहे हैं। अतः ही सर्वश्रेष्ठ पात्र है। इसके सिवा जो अधिकारी भी हो मानो अपनी सार्थकताके लिये ही वे भावोद्दीपनमें और जिसके लिये लालायित हो, उसके लिये उस सहायक हो रहे हैं। वस्तुका दान बहुत प्रशस्त होता है। यहाँ व्रजांगना ऐसी रात्रियोंको देखकर भगवान्ने रमण करनेको सर्वोत्कृष्ट पात्र हैं और श्रीकृष्ण-रसके लिये उत्कण्ठित मन किया अर्थात् उचित काल और उद्दीपन-सामग्री हैं। अतः उन्हें श्रीकृष्ण-जैसे दिव्य-रसका प्रदान करनेवाली देखकर ही भगवान्ने अपनी प्रियतमाओंके साथ रमण वे रात्रियाँ धन्य हैं। उनसे भी उत्कृष्ट पात्र सर्वाराध्य श्रीकृष्ण करनेके लिये उनका स्मरण किया। यहाँ ‘वीक्ष्य’ हैं और वे श्रीरासेश्वरी-सम्मिलनके लिये लालायित भी शब्दसे साभिलाष दर्शन अभिप्रेत है; क्योंकि ये सब हैं। अतः उनके लिये भी यह दान महत्त्वका है। सामग्रियाँ भावोद्दीपन करनेवाली थीं। अतः इसका ‘ता:’ का तात्पर्य ‘तदात्मिका:’ अर्थात् भगवद्रूपा यह तात्पर्य भी हो सकता है- ‘शरदोत्फुल्लमल्लिका भी हो सकता है; क्योंकि भगवान्‌का रमण और रात्री: ताश्च वीक्ष्य।' अर्थात् शरदोत्फुल्लमल्लिका रमणसामग्री जो कुछ भी होगा, अप्राकृत ही होगा; रात्रियोंको और उन्हींके द्वारा प्रियतमा गोपांगनाओंको