भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

२१६ भक्तिसुधा देखकर (उन्होंने रमण करनेको मन किया)। घटका वाचक 'घट' शब्द भी मूलतः उसके कारण 'ताः' अर्थात् 'स्वस्वरूपभूता व्रजाङ्गनाः।' मृत्तिकाका ही बोधन करता है। इसी प्रकार जितने इनके दो भेद हैं-एक तो वे जो नित्यसिद्धा हैं शब्द हैं, वे सब अपने अभिधेय विभिन्न पदार्थोंके मूल और दूसरी वे जो भृङ्गीकीट-न्यायसे भगवद्रूपा हो कारण परब्रह्मके ही वाचक हैं। अतः अवान्तर गयी थीं। जिस प्रकार कीट भृङ्गीसे व्यतिरिक्त होनेपर श्रुतियोंका भी मुख्य तात्पर्य तो परब्रह्ममें ही है। भी भावनातिशयके कारण भृङ्गीरूप हो जाता है, विचार किया जाय तो वस्तुतः वाच्य-वाचकका भेद उसी प्रकार ये गोपांगनाएँ स्वरूपतः भगवान्‌से भिन्न भी नहीं है। ये दोनों भी एक ही चेतनके विवर्त हैं। होनेपर भी अनुरागातिशयके कारण भगवद्रूपा हो अभिधेय-प्रपञ्चजननानुकूल शक्त्यवच्छिन्न चेतनका गयी थीं। वे कहाँ थीं? 'मनःसमुपस्थितः मनसो विवर्त अभिधेय है और अभिधानात्मक-प्रपञ्चजननानुकूल गोचरीभूताः' अर्थात् वे भगवान्‌की मानसिक दृष्टिके शक्त्यवच्छिन्न चेतनका विवर्त अभिधान है। जिस सामने थीं! उन्हें दयार्द्र दृष्टिसे देखकर भगवान्‌ने प्रकार एक ही समुद्रमें अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो रमणकी इच्छा की। जाती हैं, उसी प्रकार एक ही परब्रह्ममें अभिधान- इसके सिवा 'ताः' शब्द बहुवचनान्त होनेके अभिधेयरूप अनन्त तरंगें प्रादुर्भूत हो गयी हैं। किंतु कारण 'तत्' पदसे निर्दिष्ट होनेयोग्य अनन्त पदार्थोंका 'तद्भिन्नभिन्नस्य तद्भिन्नत्वनियमात्' इस न्यायके वाचक हो सकता है। हम 'ताश्च ताश्च ताश्च अनुसार तरंगाभिन्न समुद्रके साथ तरंगोंका अभेद ताः' इस प्रकार 'ताः' पदसे कही जानेवाली तीन होनेके कारण उनका आपसमें भी अभेद है। प्रकारकी गोपांगनाओंका विचार करते हैं। इनमें पहले यह बात तो तरंगसे तरंगान्तरके अभेदकी रही, 'ताः' से श्रुतिरूपा मुनिचरी और अन्य समस्त किंतु मूल दृष्टिसे तो अभिधानात्मक तरंग जिस साधनसिद्धा गोपांगनाएँ कही गयी हैं। समुद्रमें है, लक्षणा-वृत्तिसे वह उस समुद्रका ही उनमें भी जो श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ वाच्य- बोधन करती है; हाँ, तरंगान्तरको वह अभिधावृत्तिसे वाचकके अभेद रूपसे ब्रह्मरूपा ही हैं, वे दूसरे 'ताः' बोधित करती है; क्योंकि किसीकी भी शक्ति अपने से ग्रहण की जाती हैं। ॐकार मूलवाचक है, उसका शक्यमें ही सफल हुआ करती है, अपने कारणमें नहीं वाच्य परब्रह्म है। समस्त वाङ्मय ॐकारका विकार होती। दाहकत्व, प्रकाशकत्व आदि शक्तियोंवाला है और सारा प्रपंच ब्रह्मका कार्य है। अतः ॐकारका अग्नि अपने दाह्य काष्ठादिको ही दग्ध कर सकता विकारभूत समस्त वाङ्मय ब्रह्मके कार्यभूत सम्पूर्ण है, अपने स्वरूपभूत अग्निका दहन नहीं कर सकता। प्रपंचका वाचक है। वाच्य और वाचकका अभेद किंतु मूल रूपसे तो तरंगें समुद्रसे भिन्न नहीं हैं। हुआ करता है; इसलिये समस्त वाङ्मय भी वस्तुतः यद्यपि यह दूसरी बात है कि 'अकारो वै सर्वा ब्रह्मरूप ही है। वाक्' इस श्रुतिके अनुसार सम्पूर्ण वाङ्मय-प्रपंचका इसके सिवा श्रुतियोंके अवान्तर तात्पर्य अन्य अकारमें और अकारका उकारमें और उकारका होनेपर भी उनका प्रधान तात्पर्य तो ब्रह्ममें ही है। मकारमें तथा उसके पश्चात् सम्पूर्ण प्रपंचका तुरीयमें शब्दसे दो बातोंका बोध हुआ करता है-जाति और लय होता है। व्यक्ति। त्वतलादि प्रत्ययवेद्य जाति भावरूप ही होती तात्पर्य यही है कि अभिधानात्मिकता श्रुतियाँ है। 'तस्य भावस्त्वतलौ' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार अनन्त चैतन्यान्दसुधासिन्धुकी तरंगोंके समान हैं घटकी भावरूप जाति ही घटत्व है, वह वस्तुतः एक और वे अभिधेयरूप उसकी अन्य तरंगोंके साथ भाव-विशेषमें स्थित मृत्तिका ही है। इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होकर प्रकाशित होती हैं; क्योंकि