भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

कि जो पुरुष मेरे दिव्य जन्म-कर्मको जानता है, वह पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता; तो भगवान्‌की अप्राकृतताके विषयमें किसी सन्देहका अवकाश ही कहाँ है? वामनपुराणका वचन है— सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः। हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित्॥ इसी प्रकारकी और भी बहुत-सी उक्तियोंसे सिद्ध होता है कि भगवान्‌का दिव्य मंगल-विग्रह अप्राकृत ही है। जो लोग युक्तिवादसे उसे अनित्य या भौतिक सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं, उन्हींसे श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं—'ये तु भगवतो विग्रहं लक्षीकृत्य युक्तिशरानादित्सवस्ते घोरे नरके निपतिष्यन्ति अलं तैः सहा़लापेन।' अर्थात् जो लोग भगवान्‌की दिव्य मंगलमयी मूर्तिको लक्ष्य करके युक्तिरूप बाणोंको ग्रहण करना चाहते हैं, वे घोर नरकमें गिरेंगे, उनके साथ बात करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। ऐसा क्यों है? जिस प्रकार 'परदारान्नाभिगच्छेत्' इत्यादि निषेध वाक्योंका अतिलंघन करनेसे जीव नरकगामी होता है, उसी प्रकार भगवदीय रहस्यके विषयमें कुछ भी वाद-विवाद करनेवाले पुरुषको अवश्य उसका दुष्परिणाम भोगना पड़ता है; क्योंकि भगवान्‌की गति अचिन्त्य है और अचिन्त्य विषयोंके सम्बन्धमें तर्क करना सर्वथा निन्दनीय है—'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।' अतः भगवद्विग्रहके अप्राकृतत्वके विषयमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये। उसमें उसका अनित्यत्व सिद्ध करनेवाले सावयवत्वादि हेतुओंका अभाव है; क्योंकि वह प्राकृतत्व आदि दोषोंसे रहित है। इस क्रमसे देखें तो भगवान् अप्राकृत होनेके कारण नित्य हैं। यदि कहो कि भगवद्विग्रहको अप्राकृत और नित्य माननेपर तो अद्वैतवाद भी सिद्ध न हो सकेगा तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्रकृतिकी सत्ता वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार नहीं, बल्कि सांख्यमतसम्मत है। वेदान्तियोंने तो 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' इत्यादि सूत्रोंसे उसका खण्डन किया है। यहाँ सांख्यवादी यह आपत्ति करता है कि 'सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्' इस उक्तिके अनुसार जब कि चेतनको सत्त्वगुणके संसर्गसे ही ज्ञान होता है तो सत्त्वगुणवाली प्रकृतिको भी ज्ञान हो ही सकता है; अतः 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' इस सूत्रके अनुसार भी वही जगत्‌का उपादान कारण होना चाहिये। यदि कहो कि सत्त्वकी अपेक्षासे रहित चेतनमें ही ज्ञान (ईक्षण) होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि यह प्रश्न होता है कि चेतनमें नित्य ज्ञान है या अनित्य? यदि नित्य कहें, तब तो पुरुषकी स्वतन्त्रताका व्याघात होगा। कारण, नित्यवस्तुका कर्ताके अधीन होना असम्भव है और तुम्हारे कथनानुसार ज्ञान चेतन कर्ताके अधीन होना चाहिये; इसके विपरीत यदि उसमें अनित्य ज्ञान माना जाय तो वह सहेतुक ही होना चाहिये। ऐसी अवस्थामें हेतुके सम्बन्धमें भी ऐसा विकल्प होगा कि वह नित्य है या अनित्य। यदि हेतु नित्य है तो उससे नित्य ज्ञान होना चाहिये और यदि अनित्य है तो उसका भी कोई अन्य हेतु होना चाहिये, इससे अनवस्था दोष उपस्थित होगा। इन सब आपत्तियोंका वेदान्ती इस प्रकार उत्तर देते हैं—प्रकृतिमें ज्ञान (ईक्षण) नहीं हो सकता; क्योंकि उसमें जिस प्रकार ज्ञानका हेतु सत्त्वगुण है, उसी प्रकार उसका निरोध करनेवाला तमोगुण भी है। अतः केवल चेतनमें ही ईक्षण हो सकता है; क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप है। इस प्रकार यद्यपि उसमें नित्यज्ञान ही सिद्ध होता है तथापि आगन्तुक विषयके संसर्गसे उसका आगन्तुक होना भी सम्भव है ही। जैसे नित्य प्रकाशस्वरूप सूर्यमें आगन्तुक प्रकाश्यके संसर्गसे सूर्य प्रकाशित करता है, इस प्रकार आगन्तुक प्रकाशनका व्यपदेश होता है। यहाँ जो प्रकाश्य है, वह अनादि और अनिर्वाच्य तत्त्व है। सांख्यवादीकी गुणमयी प्रकृति भी उसीके अन्तर्गत है, परंतु भगवच्छक्ति परम दिव्य और शुद्ध है तथा मूलप्रकृति त्रिगुणमयी एवं जड़ है। देखो, एक वृक्षके बीजमें कितनी शक्तियाँ रहती हैं।