भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

कैसे होता ? किंतु भगवान्‌ने ऐसा किया क्यों ? इसका उत्तर यही है कि उनका यह अवधिनिर्देश व्रजांगनाओंकी निष्ठाके परिपाकके लिये था। अभीतक तो उन्हें भगवान्‌की प्राप्ति ही बहुत दुर्लभ जान पड़ती थी; क्योंकि यदि वे भगवान्‌को सुलभ समझतीं तो कात्यायनी-पूजन और व्रतादि तपस्याका कष्ट सहन क्यों करतीं ? तपस्या तो सर्वदा दुर्लभ वस्तुके लिये ही की जाती है और जो वस्तु दुर्लभ होती है, उसके प्रति विशेष प्रेम नहीं हुआ करता। देखो, साधारण मनुष्योंको मोक्ष और साम्राज्यादिकी प्राप्तिके लिये भी इतनी इच्छा नहीं होती, जितनी दस-बीस रुपये और स्त्री- रमणादि प्राकृत भोगोंकी हुआ करती है; क्योंकि वे तो उन्हें अपने सामर्थ्यसे बाहर जान पड़ती हैं। जिस वस्तुके मिलनेकी सम्भावना नहीं होती, उसके लिये उत्कट इच्छा भी नहीं हुआ करती। अतः जबतक उन्हें भगवान् दुर्लभ प्रतीत होते थे, तबतक उनके प्रति उनका उत्कट प्रेम नहीं था और भगवत्प्राप्तिका साधन एकमात्र उत्कट प्रेम ही है। अब, जब भगवान्‌ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया तो उनको भगवद्दर्शनकी योग्यता तो प्राप्त हो गयी थी, परंतु रमणकी योग्यता नहीं थी। रमणकी योग्यता तो तभी होगी जब भगवान्‌को सुलभ समझकर उनके प्रति उत्कट प्रेम हो। अतः भगवान्‌ने उन्हें वही साधन दिया, जिससे कि वे उन्हें सुलभ समझने लगें। भगवान्‌के वर देनेसे उन्हें भगवान्‌की सुलभता अनुभव होने लगी और उन्हें विश्वास हो गया कि अब तो भगवान् अवश्य रमण करेंगे। जब किसी इष्ट वस्तुकी प्राप्तिकी सम्भावना हो जाती है तो उसकी प्रतीक्षा असह्य हो जाया करती है। अतः भगवान्‌के इस वरदानसे उनका प्रेम इतना उत्कट हो गया जितना कि अबतक कभी न हुआ था। इसीलिये भगवान्‌ने एक वर्षका व्यवधान रखा था। इसका एक और भी कारण है। यह सिद्धान्त है कि प्राकृत गुणमय शरीरके साथ रमण करनेकी योग्यता नहीं रखता। इसके लिये अप्राकृत रसमय शरीर होना चाहिये, किंतु इसकी प्राप्ति कैसे होती है ? उसका प्रकार यह है—जिस दिनसे प्राणी करुणासिन्धु श्रीभगवान्‌की कृपाका अनुसन्धान करता है, उसी दिनसे उसका अप्राकृत रसमय शरीर बनना आरम्भ हो जाता है। इसे स्पष्टतया समझनेके लिये एक बातपर ध्यान देना चाहिये। लोकमें यह देखा जाता है कि ग्राह्य-ग्राहक भावोंमें साजात्य रहा करता है। तैजस नेत्रसे तैजस रूपका ज्ञान होता है तथा आकाशीय श्रोत्रसे ही आकाशीय शब्दका ज्ञान होता है। मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका कार्य है, इसीलिये उससे पाँचों भूतोंके गुणोंका ग्रहण हो सकता है। इसी प्रकार यहाँ भी देखना चाहिये। भगवान् प्राकृत हैं या अप्राकृत ? वे तो सत्यज्ञानानन्तानन्दमूर्ति ही हैं। सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) उनके महान् माहात्म्यको समझनेमें तो वेदान्तविद् भी असमर्थ हैं। उनमें प्राकृत भावका लेश भी नहीं है। दीपकलिका क्या है ? वह शुद्ध अग्निमात्र ही तो है। जिस प्रकार बत्ती और तैलको निमित्त बनाकर अग्नि ही दाहकत्व-प्रकाशकत्व विशिष्टरूपमें परिणत हुआ करता है, उसी प्रकार परमान्तरंग अचिन्त्य- दिव्यातिदिव्य लीलाशक्तिको ही निमित्त बनाकर वह शुद्ध परमानन्दघन परब्रह्म ही भगवान् कृष्णरूपमें प्रकट होता है। जिस समय भगवान् ऊखलमें बँध गये थे, उस समय ऐसा कहा गया है—'बबन्ध प्राकृतं यथा'॥ (श्रीमद्भा० १०।९।१४) यहाँ 'प्राकृतं यथा' इस उक्तिका क्या तात्पर्य है? इसका यही रहस्य है कि भगवान् प्राकृत-भिन्न हैं। गीता (४।९)-में भगवान्‌ने कहा है— जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ इस प्रकार जब स्वयं भगवान् ही कह रहे हैं