भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिक गये और उन्होंने यही प्रार्थना की कि हमारा यह मन मत्तभृंगके समान आपके चरणारविन्दमें लालायित रहकर सदा यह दिव्य मकरन्द पान करता रहे। भगवान्के चरणतल दिव्य कमलपर न्यस्त- सुशोभित हैं। विशुद्ध सत्त्व ही यह कमल है, विशुद्ध अन्तःकरणपर ही तो भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। सुकोमल कमलकी अति कोमल पंखुड़ियोंकी अनन्तकोटि गुणित सुकोमलता भी महालक्ष्मीके चरणाम्बुजोंकी सुकोमलताकी बराबरी नहीं कर सकती। महालक्ष्मीके कर-कमलोंकी सुकोमलता उससे भी सूक्ष्म है और उससे भी कहीं अधिक सूक्ष्म भगवान्के चरणोंकी सुकोमलता है, जिसकी किसी प्राकृत उपमानसे कल्पना नहीं हो सकती। हाँ, इन उपमानोंसे कल्पना करनेमें सहायता मिलेगी, यथार्थ बोध तो भगवत्कृपासे ही सम्भव है। भगवान्के चरणचिह्नोंकी शोभा श्रीभगवान्के चरणचिह्न अलौकिक श्रीशोभा और सौन्दर्य-स्वरूप हैं। जिस किसीने इन चरणचिह्नोंका सौन्दर्य देखा, उसीकी दृष्टि सदाके लिये उनमें स्थिर हो गयी। भगवान्के भक्त इन्हीं चरणचिह्नोंको देख- देखकर अपने कामादि दुर्भावोंको नष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। ये चिह्न किसी आचार्यके मतसे १५, किसीके मतसे १६ और किसीके मतसे १९ हैं। श्रीभगवान्के दक्षिण पादांगुष्ठमें एक दिव्य चक्र है। इस चक्रके ध्यानसे चिद्ग्रन्थिका छेदन होता है। अंगुष्ठके पर्वमें यवका ध्यान है, जो सुख-सम्पदाका देनेवाला है। अंगुष्ठ और तर्जनीके बीचमेंसे चरणके मध्यतक एक ऊर्ध्व रेखा है। अंगुष्ठके चक्रके अधोभागमें तीन चिह्न हैं—पर्वमें यव, मूलमें चक्र और नीचेकी ओर तापनिवारक छत्र है। मध्यमांगुलीके मूलमें कमल है। यह अति शोभन है। यहाँ ध्याताका मन-मधुप मुग्ध हो जाता है। इस कमलके नीचे ध्वज है, जिसके अनुसन्धानसे सब अनर्थोंका नाश होता है। कनिष्ठिकाके मूलमें वज्र है, जिसके ध्यानसे भक्तोंके पाप-पर्वत नष्ट हो जाते हैं। एड़ीके मध्यमें अंकुश है, जो भक्तचित्तके मत्तगयन्दको वशमें करनेवाला है। श्रीभगवान्के दक्षिण पादका परिमाण लम्बाईमें १४ अंगुल है और चौड़ाईमें ६ अंगुल है। पदके मध्य भागमें ४ अंगुल स्थानमें कलश-चतुष्टय हैं और उनके अगल-बगल ४ जम्बूफल हैं। अधोभागमें द्वितीयाका चन्द्र अंकित है, जो भक्तोंके शुभका सूचक है। उससे भक्तके आह्लादकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। चन्द्रमाके नीचे गोपदी है, जो भवसागरको गोपदके समान कर देता है अर्थात् भगवत्समाश्रयण करनेवाले भवसागरको गोपदके समान बिना प्रयास ही पार कर जाते हैं। श्रीभगवान्के वामपादांगुष्ठके मूलमें दिव्य शंख है। उसका ध्यान करनेसे पार्थिव जड़त्व दूर होता है और सब मल धुल जाते हैं तथा ऋक्, साम, यजुरादि शुद्धातिशुद्ध मानसी-वृत्तिरूपा समस्त विद्याएँ ऐसे स्वच्छ अन्तःकरणमें प्रस्फुरित होती हैं, जैसे कि ध्रुवके कपोलमें शंखस्पर्श होते ही उसे समस्त विद्याएँ एक क्षणमें प्राप्त हो गयीं। वामचरणकी मध्यमांगुलीके मध्यमें अम्बरका अनुसन्धान है। अम्बर (आकाश) जैसे असंग है, वैसे ही इसके ध्यानसे ध्याताका चित्त भी विषय-रागसे विमुक्त और असंग होकर व्यापक परब्रह्माकाराकारित हो जाता है। वामपादारविन्दमें चार स्वस्तिक हैं, ये सकल शुभके सूचक हैं। स्वस्तिकोंके बीचमें अष्टकोण हैं। किसीके मतसे ये अष्ट- महासिद्धियोंके देनेवाले हैं और किसीके मतसे यह अष्ट लोकपाल हैं, जो यहाँ भक्तोंकी प्रतीक्षा किया करते हैं। वामपादकी कनिष्ठिकामें सूर्यतत्त्व अंकित है, जिसके अनुसन्धानसे अनेक प्रकारके ध्वान्त तिरोहित होते हैं। वामपादारविन्दमें ज्यारहित इन्द्र-धनुषका अनुसन्धान है। धनुषके पीछे चार कलश हैं। इनके बीचमें त्रिकोण है, जो त्रिलोकैश्वर्याधिकार सूचित करता है। त्रिलोकैश्वर्यकी प्राप्तिके लिये इस त्रिकोणका अनुसन्धान है, पर भगवद्भक्ति जिनमें पूर्ण होती है, वे भगवान्को छोड़ त्रैलोक्यके पीछे नहीं भटका करते। परम भक्त तो वही है, जिसकी भक्ति-गंगाकी धारा