भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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अनवरत श्रीकृष्णचन्द्ररूप आनन्दसुधा-सिन्धुकी ओर ही प्रधावित होती है। भगवदीय कथासुधाका पान करते-करते कुछ कालमें भगवत्कथासे अनुराग होता है और यह अनुराग बढ़ते-बढ़ते प्रभु-चरणोंमें अनन्य हो जाता है। ऐसी अनन्य भक्ति जिसे प्राप्त हुई, वह लवनिमेषार्धके लिये भी त्रैलोक्यैश्वर्यके लिये भी प्रभु- चरणोंसे पृथक् नहीं होता। त्रिकोणसे दूसरा अभिप्राय त्रैगुण्य-विषय भी ले सकते हैं— मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ (गीता १४।२६) अथवा यह कहिये कि ऋक्-साम-यजुः—इन तीनों वेदोंसे प्रतिपाद्य जो तत्त्व है, उसकी प्राप्तिका यह सूचक है—'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः।' (गीता १५।१५) मनोवाक्काय तीनोंसे भगवान् ही वन्द्य हैं और तीनों अवस्थाओंमें भी वे ही एक आराध्य हैं। ऐसी अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ इस विषयमें भावुक कर सकते हैं। श्रीभगवान्के चरणचिह्न श्रीविष्णुपुराणमें १५ ही मिले। जीवगोस्वामी आदि आचार्योंने १९ निश्चित किये हैं। श्रीचरणोंके अंगुलादि परिमाण भी हैं। इन परिमाणोंको देखें तो १६ ही चिह्न रहते हैं। श्रीभगवान्के रूप और वर्ण आदिकी भावनाके अनुसार ही कल्पना करनी चाहिये। सगुणरूपमें भगवान् स्वतन्त्र नहीं होते—भक्त-भावनाके अधीन होते हैं; क्योंकि भक्तकी भावना-सिद्धिके लिये ही उनका प्रादुर्भाव होता है। स्वयं ब्रह्माजीने भगवान्‌की स्तुति करते हुए कहा है कि— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) भगवान् भक्तोंके पराधीन हैं। स्वेच्छामय हैं अर्थात् स्वकीयोंकी इच्छाके अधीन हैं। 'तं यथायथोपासते तथैव भवति' ऐसी श्रुति है और गीताका भी यह वचन प्रसिद्ध है कि— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११) अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके निदान भगवान् और भगवान्‌के निदान भक्त। इसलिये सर्वजगन्नियामक भक्त ही हुए। ये यदि श्रीभगवान्के पदचिह्नोंको जरा इधर-उधर कर दें तो ऐसा करनेमें वे स्वतन्त्र हैं। वे जो भी कल्पना करेंगे, वह सत्य है। वह कल्पना सत्य होती है, इसीसे तो भक्तोंकी कल्पनाके अनुसार भगवान् नित्य नये रूपमें प्रकट होते हैं। मनुष्यके मनका यह स्वभाव है कि वह नित्य नयी बात चाहता है। इसलिये भावुकोंको नित्य नूतन कल्पना करनी आवश्यक ही है। भगवान्‌के रूप ही नहीं, भगवान्‌के चरित्र भी भावुकोंको नित्य नवीन प्रतीत होते हैं—'तस्यांघ्रियुगं नवं नवम्।' श्रीभगवत्तत्त्व तो अनन्त है। जैसे-जैसे जिसका मन विशुद्ध होता जाता है, वैसे-वैसे नव-नव रूप- चमत्कृति देखनेको मिलती है। भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहमें नित्य नवीन कल्पना करनेमें सच्चे भावुक स्वतन्त्र हैं। उन्हें भगवान्‌के भूषणवसनादिमें नित्य नयी-नयी कल्पना करनी ही चाहिये। सगुण उपासकोंके लिये यह आवश्यक है। जैसे भगवान्‌के पीतपटको कहीं विद्युत्का उपमान दिया गया है तो कहीं कदम्ब-किंजल्ककी-सी आभा बतायी गयी है और कहीं रविकिरणकी उपमा दी गयी है। इसी प्रकार नखमणि कहीं मुक्तापंक्ति है तो कहीं नीलिमा, अरुणिमा और स्वच्छताके दिव्य सम्मेलनका ध्यान है और कहीं उसमें अँगूठियोंकी दीप्तिमत्ता भी मिली हुई है और नखमणि-मण्डलकी ज्योत्स्ना ऊर्ध्वमें उच्छ्वसित हो रही है। भगवान्के युगलस्वरूपके चिन्तनसे अन्तःकरणकी निर्मलता भगवान्के श्रृंगारके सम्बन्धमें इसी प्रकार आठों यामकी अष्टविध कल्पनाएँ हैं। भगवान्‌का रूपसौन्दर्य- माधुर्य प्रतिक्षण नवीन होता रहता है, इसलिये कम- से-कम ८ पहरमें ८ बार तो नवीन कल्पना करनी ही