भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४१ चाहिये। इसी प्रकार मुक्ता-माल, गुंजा, किरीट, मयूरपिच्छ आदिके विषयमें बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ भक्तोंने की हैं। भगवान्‌का मयूरपिच्छ-विनिर्मित मुकुट बंक होता है, अर्थात् कहीं दक्षिण और कहीं वाम ओर झुका रहता है। यह दक्षिण-वाम ओरका बाँकपन श्रीकृष्ण और श्रीराधिकाजीका परस्पर स्वात्मार्पण सूचित करता है। दोनोंके आभूषण भी परस्पर स्वात्मार्पणका भाव लिये हुए रहते हैं। आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र और श्रीवृषभानु-नन्दिनीके परस्पर स्वात्मार्पण और मिलनके अनेक भाव हैं। श्रीवृषभानुनन्दिनीके बिना श्रीकृष्णचन्द्रका ध्यान पूर्ण नहीं, क्योंकि श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य-माधुर्य ही श्रीकृष्णचन्द्रका दृग्विषय है। उसका वर्णन सनकादि मुनीन्द्र भी नहीं कर सके। वह वर्णनातीत है। श्रीराधिकाजीका गौर तेज श्रीकृष्णचन्द्रकी श्याम कान्तिमें और श्रीकृष्णकी श्याम कान्ति श्रीवृषभानु- नन्दिनीकी गौर कान्तिमें भावुकोंके देखनेकी वस्तु है। अस्तु, इस प्रकार युगल मूर्तिका नानाविध भावोंसे अनुसन्धान करते-करते मल सर्वथा धुल जानेपर विशुद्ध अन्तःकरणमें भगवत्स्वरूपका प्राकट्य होता है।

'साक्षान्मन्मथमन्मथः'

भगवान् तथा कामदेवका संवाद ब्रह्म-इन्द्रादि देव-शिरोमणियोंपर विजय प्राप्त कर लेनेसे कामदेवको अखर्व गर्व हुआ और उसे रुचि हुई कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्णचन्द्रपर विजय प्राप्त करूँ। ऐसा सोचकर भगवान्‌के पास जा उसने अपना मनोगत भाव प्रकट किया। भगवान्‌ने कहा कि तुम मुझसे कैसे लड़ना चाहते हो, दुर्गके आश्रयणसे या मैदानमें। कामने कहा—'भगवन्! इन दोनों युद्धोंका स्वरूप क्या है?' भगवान् बोले कि दुर्गका युद्ध यह है कि मैं विरक्त होकर, एकान्त निर्जन वनमें समाधिस्थ हो जाऊँ और फिर तुम यदि अपनी माया और कलाओंसे मुझे मोहित और क्षुब्ध कर सको, तब तुम्हारी विजय है, और न क्षुब्ध कर सको तो मेरी विजय होगी। मैदानका युद्ध दूसरे प्रकारका है। वह तब सम्भव है, जब श्रीमद्वृन्दावनधामके यमुनाका स्वच्छ सुकोमल पुलिन हो, अमृतमय पूर्ण चन्द्रमाकी दिव्य ज्योत्स्ना फैली हो, शीतल-मन्द-सुगन्ध पवनका संचार हो, विविध विहंगोंके कलरव एवं भ्रमरमण्डलियोंके गुंजारसे निनादित पुष्पित वनराजिकी लोकोत्तर सुहावनी छटा व्यक्त हो रही हो, हंस- सारसशोभित सरोवरकी अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य- सौरस्य-सम्पन्न, रतिके गर्वको दूर करनेवाली अपरिगणित व्रज-बालाओंके मध्यमें उनके मुखचन्द्रका चुम्बन करते हुए और उनके अवयवोंका आलिंगन करते हुए भी यदि मेरे मनमें विकार न हो तो मैं विजयी रहूँगा; और यदि मलयानिल तथा कान्ताओंके हाव-भाव और विलासोंसे मेरे मनमें क्षोभ हो जाय तो जीत तुम्हारी है। कामदेव मन-ही-मन विचार करने लगे कि यदि इन्होंने दुर्गका आश्रयण किया तो फिर मेरी विजय नहीं होगी, क्योंकि जिस समय ये नरनारायण- रूपसे योगासनासीन होकर बदरिकाश्रममें तप कर रहे थे, उस समय इन्द्रको यह भ्रम हुआ कि ये मेरे ऐन्द्र पदके लिये तपस्या कर रहे हैं, तब मैं इन्द्रका भेजा हुआ वसन्त-ऋतु तथा अप्सराओंके साथ नरनारायणके आश्रममें गया। अप्सराओंके अशेष हावभाव, वसन्तकी सहायता और मेरे बाण सब निष्फल हुए, फिर भी इनमें क्रोधका संचार नहीं हुआ, पुनः इन्होंने हम सबोंका आतिथ्य किया। तब अप्सराओंने कहा था कि 'हे नाथ! जिस भाँति सद्योजात बालिका हाव- भाव कटाक्षोंसे अपने प्रपितामहको मोहित करना चाहे, उसी भाँति आपकी मायासे मोहित होकर, हम सब आपको मोहित करने चली हैं।'