भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ भक्तिसुधा भगवान्ने आश्वासन करके सबको विदा किया, सो किलेबन्दीके युद्धमें इन्हें कौन पायेगा? अतः कामने कहा—'भगवान् ! आप मैदानमें ही मुझसे युद्ध कीजिये।' भगवान्ने कहा—'तथास्तु, मैं मैदानमें ही तुमसे युद्ध करूँगा।' कामदेव भी 'बहुत अच्छा' कहकर चला तो गया, पर उसने जाकर श्रीव्रजांगनाओंके शरीररूप कांचन दुर्गका आश्रयण किया। इधर श्रीकृष्णचन्द्रने विचार किया कि द्वितीयासे चतुर्दशीतक चन्द्रमा अपूर्ण रहते हैं, अतः उनपर राहु भी आक्रमण नहीं करता, सो भगवान् शंकरकी कोपाग्निसे दग्धप्राय अपूर्ण कन्दर्पपर विजय प्राप्त कर लेनेमें कौन-सी महत्ता है? अतः कन्दर्पको पूर्ण करके ही उसको जीतना युक्त है। बस, यह सोचकर श्रीकृष्णभगवान्ने मुरलीको, अपने अमृतमय मुखचन्द्रपर धारण करके उसे अधर- सुधासे पूरित किया और वेणुछिद्रोंद्वारा निःसृत गीतपीयूषको श्रोत्रपुटोंद्वारा व्रजांगनाओंके हृदयमें पहुँचाकर दग्धप्राय कन्दर्पको पुनरुज्जीवित किया। श्रीकृष्णकी अधरसुधासे दग्धप्राय काम उत्तेजित हो उठा। वेणुवादन व्याजसे मानो फूत्कारद्वारा कामाग्निको उत्तेजित करके उसमें अधर-सुधा-सिंचनद्वारा मानो घृतकी आहुति दी। इतनेपर भी व्रजेन्द्रनन्दनने यह सोचा कि यह कन्दर्प मनसे उत्पन्न होनेवाला है, इसीलिये मनसिज या मनोज कहलाता है। श्रीव्रजांगनाओंका मन मेरा भक्त है, अतः भगवद्भक्त पिताके सन्निधानसे कन्दर्पके प्रागल्भ्यमें प्रतिबन्ध हो सकता है। यही सोचकर भगवान्ने वेणुगीतपीयूषप्रवाहसे श्रीव्रजांगनाओंके मनको हरण कर लिया, यथा—'व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीत- मानसाः'। इतरप्रवाह स्वसंसृष्ट वस्तुको गन्तव्य स्थानमें ले जाता है, परंतु वेणुगीतपीयूषप्रवाह तो स्वसंसृष्ट पदार्थोंको अपने उद्गम-स्थान श्रीकृष्णके सन्निधानमें पहुँचाता है अथवा श्रीकृष्णचन्द्रके मुखपंकजसे निर्गत वेणुपीयूष व्रजांगनाओंके अनावृत कर्णकुहरमें प्रविष्ट होकर उनके हृदयमें विद्यमान धैर्य-वैराग्य-विवेक- लज्जादि रत्नोंसे पूरित मंजूषाको हर ले गया, इसलिये काम अत्यन्त स्वच्छ हो गया और वेणुगीतपीयूषसे आप्यायित होकर अत्यन्त प्रगल्भ हो गया। इधर वसन्तने भी सोचा कि मित्रका अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक विश्वपति भगवान्से संग्राम है, मुझे भी अपने मित्रकी सहायता करनी चाहिये। मेरे मित्र मनोज पुष्पधन्वा हैं, पुष्प ही इनके अस्त्र-शस्त्र हैं। विरहीजनोंके हृदय विदारण करनेके कारण ही मानो रक्तरंजित लाल किंशुक बरछीका काम करता है। कमल, कुन्द; कुड़मल, केतकी आदि ही भालाका कार्य करते हैं। ऐसे ही अन्यान्य पुष्प भी अस्त्र- शस्त्रका काम करते हैं। यह समझकर ही वसन्तने विविध प्रकारके कमल, कमलिनी, कुमुद, कुमुदिनी, केतकी, चम्पक, मालती आदि अनेक प्रकारके पुष्पोंको विकसित किया। इस भाँति मित्रकी सहायतासे सम्पन्न, हृष्ट-पुष्ट हो तथा शस्त्रसे सुसज्जित होकर व्रजांगनाओंके श्रीअंगोंके ही दिव्य कांचनमय कामगामी दुर्गमें अधिष्ठित हुआ और श्रीमद्वृन्दारण्यधाममें श्रीकृष्णचन्द्रसे संग्राम करनेके लिये गया। भगवान् उस दिव्य धाममें आयी हुई श्रीव्रजांगनाओंके मध्यमें निर्विकार भावसे धर्म-तत्त्वका उपदेश करने लगे। तब कन्दर्पने कहा कि इन व्रजसुन्दरियोंके संगमें अंग-संग एवं विविध प्रकारके रास-विलासोंमें यदि आपका मन क्षुब्ध और मोहित न हो, तभी आप विजयी हो सकते हैं। श्रीकृष्णजीने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही किया। श्रीव्रजांगनाओंके श्रीअंगरूप कामदुर्गपर आक्रमण करके ब्रह्मादि-जय-संरूढ़-दर्प कन्दर्पके दर्पका दलन कर दिया। इतना ही नहीं, अपने स्वरूपभूत ब्राह्मसंस्पर्शसे व्रजांगनाओंको आत्मसात् करके उन्हें सर्वथा निर्विकार कर दिया। परिरम्भण करके, अलक-उरु-नीवी- स्तनका स्पर्श करके, परिहास, नखपात, क्ष्वेलि,