भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४३ अवलोक हाससे भी कन्दर्पको निगृहीत करके ही व्रजसुन्दरियोंको रमण कराया, यथा— बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरु- नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातैः । क्ष्वेल्यावलोकहसितैर्व्रजसुन्दरीणा- मुत्तम्भयन् रतिपतिं रमयाञ्चकार॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४६) श्रीव्रजांगनाओंके साथ श्रीकृष्णजीके नानाविध हाव-भाव, कटाक्षों तथा कन्दर्प, वसन्त आदिके अस्त्र-शस्त्रप्रयोग सब व्यर्थ हो गये और आत्माराम श्रीकृष्ण ज्यों-के-त्यों निर्विकार रह गये। अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत कामबिन्दुका उद्गमस्थान, जो साक्षात् मन्मथ है, उसके भी मनको श्रीकृष्णचन्द्रने मथ डाला, इसलिये वे साक्षात् मन्मथमन्मथ कहलाते हैं। वस्तुतः प्रेममयी व्रजांगनाओंके स्मरणसे कामका दर्प दलित हो सकता था। भावुकोंका मत है कि श्रीकृष्णके नखमणिचन्द्रिकाकी एक रश्मिछटाके ही दर्शनसे साक्षात् मन्मथ मोहित हो गया। इतना ही नहीं, उसने उत्कट उत्कण्ठासे यह दृढ़ संकल्प कर डाला कि सहस्रों जन्मोंतक तीव्रातितीव्र तपस्याओंके द्वारा व्रजांगनाभावको प्राप्त करके प्रियतम प्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दकी नखमणिचन्द्रिकाकी रश्मिछटाका सेवन करूँगा। इसलिये ही तो भगवान् साक्षात् मन्मथमन्मथ हुए। ब्रह्मसाक्षात्कार तथा ब्राह्मसंस्पर्शसे कामादि विकारोंका आत्यन्तिक क्षय हो जाना स्वाभाविक ही है, फिर प्रेममयी व्रजांगनाओं और उनके प्रियतम प्राणधन भगवान्में कामका प्रभाव क्या पड़ सकता था ? काम पराजित होकर ही प्रद्युम्नरूपसे श्रीकृष्णका पुत्र बना, अतएव श्रीकृष्ण और व्रजांगनाओंके रमणमें कामका उपयोग नहीं है, किंतु वहाँ तो प्रेमका ही उपयोग होता है और वही प्रेम कामपद व्यपदेश्य होता है, तभी तो भावुकोंने कहा है—'प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्।' गोपांगनाका प्रेम ही काम नामसे प्रसिद्ध हुआ। वस्तुतः कृष्णविषयक काम काम ही नहीं हो सकता। भगवान्ने कहा है कि मुझमें जिसकी बुद्धि प्रविष्ट हो चुकी है, उन लोगोंका काम काम नहीं है, जैसे भर्जित किंवा क्वथित बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही श्रीकृष्णविषयक काम संसारका मूल नहीं होता, यथा— न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते। भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।२६) नायिका-नायक परस्पर मिलनका मूलभूत स्नेहविशेष ही काम है। शृंगाररस सभी रसोंमें श्रेष्ठ और सबका अंगी है। उसे उज्ज्वल रस कहते हैं। किसी पदार्थकी तृष्णा प्राणीके हृदयको कण्टकके समान उद्वेजित करती है। तृष्णारूप कण्टकसे व्यथित अतएव चंचल मनपर व्यापक अखण्ड अनन्त ब्रह्मानन्दका प्राकट्य नहीं होता। यहीं अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिसे, क्षणिक-तृष्णा वृत्तिकी निवृत्तिसे शान्त अन्तःकरणपर ब्रह्मात्मक सुखकी अभिव्यक्ति होती है। नायक-नायिकाके परस्पर सम्मिलनकी तृष्णा सर्वातिशायिनी होती है, अतएव उस समय तृष्णासे व्यथित हृदयमें अशान्ति, चंचलता भी अधिक होती है, ऐसे अवसरमें परस्पर सम्मिलनसे तृष्णाकण्टकके निकलनेसे क्षणभरके लिये शान्त अन्तःकरणपर ब्रह्मानन्दके प्राकट्यकी भी विशेषता रहती है। इसीलिये और रसोंकी अपेक्षा शृंगाररसकी प्रधानता है। तत्पश्चात् शिशुओंके समर्पणके ब्याजसे एवं दृष्टियोंसे प्रियतमका अंगसंग प्राप्त करके दुरन्त भावसे भरी हुई अन्तरात्मासे उन्होंने अपने प्राणनाथका परिरम्भण किया— पत्यः पतिं प्रोष्य गृहानुपागतं विलोक्य सज्जातमनोमहोत्सवाः। उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात् साकं व्रतैर्व्रीडितलोचनाननाः ॥ तमात्मजैर्दृष्टिभिरन्तरात्मना दुरन्तभावाः पररेभिरे पतिम्।