भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ भक्तिसुधा निरुद्धमप्यास्त्रवदम्बु नेत्रयो- र्विलज्जतीनां भृगुवर्य वैक्लवात्॥ (श्रीमद्भा० १।११।३१-३२) जल और तरंगका सम्मिलन ही यथार्थमें अत्यन्त व्यवधानशून्य सम्मिलन है। हाँ, कुछ भावुकोंका कहना है कि सुकोमल कमलका मकरन्दमधु पान करनेवाला मधुप होता है, परंतु वास्तवमें यदि कमलको ही रसना और घ्राण हो, तभी व्यवधानशून्य उसके सौगन्ध्य और सौरस्यका अनुभव किया जा सकता है। जीवात्मा और परमात्माका मिलन जीवात्मा और परमात्माके मिलनका अनेक भावोंसे शास्त्रोंमें वर्णन किया गया है। यद्यपि शुद्ध प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परमात्मा नित्यप्राप्त वस्तु है तथापि जब प्राप्तिका वर्णन किया जाता है, तब कहीं तो 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' ब्रह्मविदका यहाँ ही ब्रह्म- सम्भोग करना कहा जाता है और कहीं 'सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तसुखमश्नुते' बाह्य संस्पर्शसे अत्यन्त विरक्त, ज्ञानीका ब्रह्मसंस्पर्शजन्य लोकोत्तर सुखका भोग करना कहा जाता है। निर्विशेष चित्सुखस्वरूप ब्रह्मके संस्पर्शकी कल्पना अद्भुत है। कहीं श्रुतियोंने इसे अन्य दृष्टान्तसे स्पष्ट किया है—'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्।' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) जैसे कान्त अपनी प्रियतमा भार्यासे परिरम्भण करके प्रेमानन्दके उद्रेकमें बाह्याभ्यन्तर प्रपंचको भूल जाता है, भेदमें व्यवधानकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होती। अतः भेदयुक्त सम्मिलनसे रसिकोंको सन्तोष नहीं होता। पुत्र, देह, मन, अन्तरात्मासे जितनी अन्तरंगता, व्यवधानशून्यता उपलब्ध होती है, उतनी अधिक प्रीति व्यक्त होती है। सर्वान्तर सर्वापेक्षया सन्निहित अन्तरात्मासे ही प्राणियोंको निरतिशय एवं निरुपाधिकपर प्रेम होता है, अतः भगवान्के साथ घनिष्ठ प्रेम तभी होता है, जब उनकी नितान्त अन्तरंगता व्यक्त हो। अतः अभेद बोध आवश्यक होता है, फिर भी अत्यन्त अभेदमें ब्रह्मसे स्पर्श या प्राज्ञात्माका परिष्वंग नहीं बनता, अतः काल्पनिक भेद और पारमार्थिक अभेद स्वीकार किया जाता है। घटाकाशका यथा महाकाशके साथ सम्मिलन है, तथैव जीवात्माका परमात्माके साथ सम्मिलन होता है, परंतु इससे भी सरस सुन्दर दृष्टान्त है, तरंग- जलका। जैसे वीचीके भीतर, बाहर, मध्य या सर्वांगमें जल भरपूर रहता है, इसी तरह जीवात्मामें ब्रह्मात्माका सम्मिलन है। वीची और वारिके निर्जीव दृष्टान्तको सजीवरूपमें लाते हुए उसीको नायिका और नायकका रूपक दे दिया गया। सजीव दृष्टान्तोंमें नायिका- नायकसे बढ़कर कोई भी ऐसा दृष्टान्त नहीं है, जहाँ