भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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'साक्षान्मन्मथमन्मथः' ४५ यद्यपि पूर्ण विरक्त एवं शान्त समाहित महापुरुष वेदान्तोंके श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे परम तत्त्वका साक्षात्कार कर सकते हैं तथापि शीघ्रातिशीघ्र तत्त्व- साक्षात्कारके लिये किसी विशेष स्वरूपकी उपासना अत्यन्त आवश्यक है, कारण कि प्राणियोंके चित्तमें नाना प्रकारके शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध एवं अन्धकार, प्रकाश आदि दृश्योंका स्फुरण ही बना रहता है, निद्रा या विक्षेपसे शून्य अवस्था दुर्लभ है। दृश्यके स्फुरणनिरोध बिना, दृश्यातीत निर्दृश्य विशुद्ध तत्त्वका स्फुरण अत्यन्त असम्भव है। जगत् यद्यपि दुःखमय है तथापि मोहवश जगत्के चिन्तनमें मिठास प्रतीत होती है और प्रपंचातीत भगवान् परमानन्दमय एवं सर्वानर्थनिवर्तक हैं तथापि उनमें जीवका आकर्षण नहीं होता। जैसे ज्वराक्रान्त व्यक्तिको तिग्म आतपमें स्वाद किंवा सर्पदंशनके विष

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