भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिवेदन भारतीय संस्कृति पुनर्जन्म एवं कर्म-सिद्धान्तपर आधारित है। संसारमें सर्वत्र सुख-दुःख, हानि- लाभ, जीवन-मरण, दरिद्रता-सम्पन्नता आदि वैभिन्न्य स्पष्ट रूपसे दिखायी पड़ता है, पर यह भिन्नता क्यों है? इसपर विचार करना आवश्यक है। इतना ही नहीं पशु-पक्षी, कीट-पतंग तथा तिर्यक् आदि चौरासी लाख योनियोंमें भटकता हुआ जीव भगवत्कृपासे मानव-शरीर प्राप्त करता है। इस योनिमें उसे कर्म करनेकी सामर्थ्य, विवेक और बुद्धि भी भगवत्प्रदत्त है, परंतु इस विवेक- बुद्धि और सामर्थ्यका वह कितना सदुपयोग करता है—यह तो जीवपर ही निर्भर है। मनुष्य-जीवन पाकर भी मनमाना स्वेच्छाचारितापूर्वक भोग-विलासमें ही जीवन बिता दिया और धर्मशास्त्ररूपी भगवद्-आज्ञानुसार जीवनचर्या नहीं चलायी तो पुनः कूकर-शूकर, कीट-पतंग, पशु-पक्षी और तिर्यक् योनियोंमें दुःखरूप जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। इसीलिये सावधानीपूर्वक शास्त्रोंका स्वाध्याय, मनन और उनके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। मानव-जीवनका एकमात्र लक्ष्य है—अपना कल्याण करना अर्थात् जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त होना अथवा भगवत्प्राप्ति करना। ये तीनों बातें एक ही हैं। जीवनमें समग्र सफलता एवं शान्तिका समन्वय केवल आध्यात्मिक विचारों एवं चिन्तनसे ही सम्भव हो सकता है। जीवनमें सफलता एवं समृद्धि तथा मनकी शान्ति प्राप्त होती रहे और हमारा जीवन पूर्णतः सार्थक बने, इसके लिये हमें समुचित मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है। ऐसा मार्गदर्शन सच्चे सन्त-महात्मा या सात्त्विक महापुरुषद्वारा प्रणीत आध्यात्मिक साहित्यसे ही प्राप्त हो सकता है। हमारे आध्यात्मिक वाङ्मयमें वेद, उपनिषद्, पुराण, गीता, रामायणसहित ऐसे अनेक ग्रन्थ हैं, जो हमें आध्यात्मिक सन्देश प्रदान करते हैं; परंतु आजका मानव कभी-कभी इन सद्ग्रन्थोंका वास्तविक अर्थ एवं रहस्य न समझनेके कारण दिग्भ्रमित भी हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक 'भक्तिसुधा' के प्रणेता अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज (१९०७—१९८१ ई०) हैं। इस पुस्तकमें श्रीस्वामीजीने धार्मिक-तत्त्व और रहस्योंका विशद विवेचन किया है। मूर्तिपूजा, इष्टदेवकी उपासना आदिमें अनेक भ्रान्तियाँ एवं जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती हैं; उनका जबतक पूर्ण समाधान नहीं होता, तबतक उन कार्योंके प्रति पूर्ण दृढ़ता नहीं आती है। अतः इस पुस्तकमें गायत्री- तत्त्व, विष्णु-तत्त्व, शिव-तत्त्व, भगवती-तत्त्व आदि नामोंसे उन-उन देवताओंकी उपासनाका पूरा रहस्योद्घाटन किया गया है, जिससे उपासकके मनमें पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत पुस्तकमें धर्म-सम्बन्धी नानाप्रकारके प्रश्नोंका समाधान प्राप्त होगा, अपने इष्टदेवकी उपासनामें दृढ़ता आयेगी, वेदोक्त धर्मके प्रति पूर्ण आस्था होगी एवं भगवान्में अनन्य भक्ति होगी। इस तरह मनुष्य अपना कल्याण-साधन एवं सुख-शान्ति प्राप्त करनेमें सफल हो सकेगा।