भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४ ] 'करपात्री स्वामी' एक युगपुरुष थे। इतिहास साक्षी है कि भारतकी इस पवित्र भूमिने समय- समयपर ऐसे सन्त-महात्माओं और आचार्योंको जन्म दिया, जिनके जीवनसे भारतीय संस्कृति तथा सनातन-धर्मको प्रकाश तो मिला ही साथ ही सुरक्षा भी मिली। आदिशंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानन्दाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभाचार्य आदिका अवतरण इस देशको इसी रूपमें प्राप्त हुआ। इसी कड़ीमें आदिशंकराचार्यकी परम्परामें अनन्तश्री स्वामी करपात्रीजी महाराज भी अवतरित हुए, जिनमें अलौकिक प्रतिभा थी और तपस्या एवं साधनाका अमित तेज था। कलिके इस प्रथम चरणमें जीवनपर्यन्त वर्णाश्रम-व्यवस्था और धर्मकी रक्षाके लिये वे संघर्षरत तो रहे ही, साथ ही उन्होंने जगत्को वेदशास्त्र और धर्मके सूक्ष्म तत्त्वोंसे अवगत भी कराया। 'भक्तिसुधा' का उद्देश्य आस्तिक जनताकी भावनाको दृढ़ करना एवं इस साहित्यके द्वारा सनातन-धर्मके प्रति फैली हुई भ्रान्तियोंको दूर करना है। अनेक प्रकारके वादोंके प्रसारसे जनताकी भावना उत्तरोत्तर शिथिल होती जा रही है। पाखण्डवादियोंद्वारा अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये अनेक भ्रान्त मत फैलाये जा रहे हैं। उन पाखण्डवादोंको रोकनेके लिये जनतामें सत्साहित्यद्वारा वैदिक धर्मके गूढ़ तत्त्वोंका प्रकाशन करना ही एकमात्र उपाय है। इस पुस्तकमें श्रीस्वामीजी महाराजने सनातन-धर्मके प्रधान अंग देवोपासनाके रहस्योंका विशद विवेचन किया है। भगवत्प्राप्तिके सरल तथा सुन्दर मार्गका उपदेश दिया है। धर्मके मर्मका विवेचन करते हुए वे उन गूढ़ तत्त्वोंको प्रकाशमें लाये हैं, जिनसे पाखण्डवादका स्वतः ही खण्डन हो जाता है। प्रस्तुत 'भक्तिसुधा' चार भागोंमें विभक्त है, पहला भाग श्रीकृष्णलीलादर्शन है, जिसमें श्रीकृष्णजन्म, श्रीकृष्णकी बालक्रीडा, वेणुरव, वेणुगीत, चीरहरण, रासलीला-रहस्य एवं श्रीरासपंचाध्यायी आदिका विशद विवेचन एवं रहस्योद्घाटन हुआ है। द्वितीय खण्डमें देवोपासनातत्त्वके अन्तर्गत पंचदेवोंका तात्त्विक विवेचन गायत्री तत्त्व, शक्तिका स्वरूप, शक्तिपीठ-रहस्य, श्रीरामजन्म- रहस्य, भगवदवतारका प्रयोजन, बुद्धावतारका प्रयोजन, निर्गुण-निराकारसे सगुण-साकार आदिका तात्त्विक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। तृतीय खण्डमें भक्तितत्त्वके अन्तर्गत भगवत्प्राप्ति, नामरूपकी उपयोगिता, इष्टदेवकी उपासना, मानसी आराधना, सगुणोपासनामें सरलता, विभीषण- शरणागति, प्रेमतत्त्व, भगवत्कथामृत, करुणालहरी, गजेन्द्रमुक्ति, संकल्पबल, ज्ञान और भक्ति एवं भक्तिरसामृतास्वादन आदि विषयोंपर मार्मिक विवेचन किया गया है। चतुर्थ खण्ड ज्ञानतत्त्वदर्शनके अन्तर्गत वेदान्तरससार एवं सर्वसिद्धान्तसमन्वयप्रकारकी मीमांसा की गयी है। इस प्रकार यह ग्रन्थ पूर्ण होता है, आशा है आस्तिक जनता इस भक्तिसुधाका पान करके अपना कल्याण-साधन करनेमें समर्थ हो सकेगी। —राधेश्याम खेमका