भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४६ भक्तिसुधा देहभावनासे ही देहकी सत्ता और मनके कारण ही जगद्विभ्रम स्वप्नके बाल्य, वार्धक्यके समान ही एक-एक अनुभवांशमें सहस्रों प्रपंच प्रतीत होते हैं। चित्त ही चिद्रूप परमानन्द हो जाता है। जैसे सिकताके अन्दर तैल नहीं है, वैसे ही वस्तुतः चित्तके भीतर जगत् नहीं है। चित्तमें चिद्भाग ही परमार्थ है। अचित् जड़भाग ही सर्वानर्थ है। जैसे स्वप्नद्रष्टा अविद्यमान ही स्वाप्निक प्रपंचको देखता है, वैसे ही जाग्रदादि सभी प्रपंच केवल द्रष्टाका स्वप्न ही है। सम्पूर्ण दृश्य उसी प्रकार चित्स्वरूपसे व्याप्त है, जिस प्रकार मृगतृष्णाका जल मरु-मरीचिकासे व्याप्त होता है। चित्तरूपी बालक अबोधके कारण मिथ्या ही जगद्रूपी यक्षको देखता है। बोध होते ही निरामय, निर्विकार ब्रह्मको देखने लगता है। चित्तके द्वारा ही वासिष्ठोक्त दस ऐन्दव ब्राह्मण पृथक्-पृथक् दस ब्रह्माण्डोंकी कल्पना करके ब्रह्मत्वको प्राप्त हो गये। एक-एकके ब्रह्माण्डमें इसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, सुमेरु, समुद्रादि सभी प्रत्यक्ष देखकर इस ब्रह्माण्डके ब्रह्माको आश्चर्य हुआ। मन ही जगत्का कर्ता है। मनसे कृत ही मुख्य रूपसे कृत समझा जाता है। देहभावनाके कारण ही प्राणी देहधर्मसे बाधित होता है। देह-भावनाके बाधित होनेपर प्राणी देहधर्मसे लिप्त नहीं होता। बाह्यदृष्टिवाला प्राणी ही सुख- दुःखको प्राप्त होता है। अन्तर्मुख होनेसे योगी सुख- दुःख, प्रिय-अप्रिय कुछ भी नहीं जानता। मनके कारण ही विविध प्रकारका जगद्विभ्रम होता है। इसी सम्बन्धमें 'वासिष्ठरामायण' में इन्द्र- अहल्याका आख्यान है। मगध देशमें इन्द्रद्युम्न राजा था। चन्द्रबिम्बके तुल्य उसकी कमललोचना रानी अहल्या थी। उसी नगरमें एक इन्द्र नामका विप्रकुमार था। अहल्याने कथाप्रसंगमें सुना कि पूर्वकालमें इन्द्रको अहल्या बहुत प्रिय थी। बस, फिर तो वह इन्द्रकी परमानुरागिणी हो गयी और वह इसलिये विह्वल हो उठी कि 'मैं अहल्या हूँ, फिर इन्द्र मेरे पास क्यों नहीं आते ?' मृणालतुल्य शीतल आस्तरणपर भी उसे विश्राम नहीं मिलता था। समग्र राजविभूतियाँ उसके लिये व्यर्थ प्रतीत होने लगीं। दिव्य राजकीय ऐश्वर्यमें भी वह जलविद्युत्, निदाघतप्ता मछलीके समान सन्तप्त हो रही थी। भावनाके परिपाकसे अहल्याको चारों ओर इन्द्र परिलक्षित होता था और विवशतासे लज्जाविहीन होकर इन्द्रके सम्बन्धमें ही वह प्रलाप करने लगी। उसकी प्रिय वयस्या (सखी)- ने उसे विकल देखकर कहा—'मैं तुम्हारे प्रिय इन्द्रको ला देती हूँ, तुम धैर्य धारण करो।' अहल्या दीन होकर उसके चरणोंमें गिर पड़ी। सखीने इन्द्र नामक द्विजकुमारके पास जाकर सब वृत्तान्त कहा और उसे लाकर अहल्यासे मिलाया। दोनों ही परस्पर प्रेमसे अनुरक्त हो गये और प्रेमके प्रकर्षके कारण ही रानी समस्त गुणोंसे परिपूर्ण, सर्वैश्वर्यसम्पन्न अपने राजाको भूल गयी और उस विप्रकुमार इन्द्रमें अनुरक्त होकर सम्पूर्ण विश्वको ही इन्द्रमय देखने लगी। इन्द्र भी पूर्णरूपसे उसके अनुरागमें अनुरक्त हो गया। इन्द्रके ध्यानमें भी अहल्याका मुख पूर्णचन्द्रके द्वारा प्रफुल्लित कैरवके तुल्य शोभित होता था। इन्द्रके भी अन्तःकरण, अन्तरात्मा तथा रोम-रोममें अहल्या भरपूर हो गयी और क्षणभर भी उसके बिना वह नहीं रह सकता था। इस तरह अति सघन स्नेहके कारण उनके व्यवहार निरावरण हो गये। राजा इन्द्रद्युम्नको यह वृत्तान्त विदित हो गया, राजाने उन दोनोंको ही विविध प्रकारका दण्ड दिया। शीतकालमें दोनोंको शीतल सलिलमें डाल दिया। दोनों सर्वथा अखिन्न होकर, प्रसन्न हो हँस रहे थे। राजाने पूछा—'तुम दोनों खिन्न न होकर हँस क्यों रहे हो?' वे परस्पर कान्तियुक्त, अनिन्दित मुखका स्मरण करते हुए बोले—'हम दोनों परस्पर प्रेमके कारण रूढ़भाव होकर देहादिका स्मरण ही नहीं करते, अब स्व- स्वांगोंके छिन्न-भिन्न होनेपर भी हमलोगोंको कुछ भी