भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 557

माँके श्रीचरणोंमें ५४७ कष्ट नहीं होता।' राजाने उन दोनोंको भ्राष्ट्र (भाड़)- में डाल दिया तो भी दोनों एक-दूसरेको निहारते हुए प्रसन्न थे। उन्नत गजेन्द्रके पैरोंतले दोनोंको बाँधा गया। दोनोंको कोड़े लगवाये गये, फिर भी वे प्रसन्न थे। इन्द्रने कहा—'राजन्! मुझे तो सम्पूर्ण संसार प्रिय अहल्याके ही रूपमें दिखलायी देता है और अहल्याको सब कुछ मैं ही प्रतीत होता हूँ। अतः कोई दुःख हम दोनोंको बाधा नहीं पहुँचा सकते। जहाँ-जहाँ रहता हूँ, निपतित होता हूँ, वहाँ प्रिय-संगमसे भिन्न मुझे कुछ भी अनुभूत नहीं होता।' वस्तुतः पुरुष मनोमात्र ही है। देहादि प्रपंच उसीका विकार है। इस तरह सहस्रों दण्ड-विधानोंसे भी उनके मनको बदलनेमें राजा असमर्थ रहा। वस्तुतः दृढ़ निश्चयवाले मनको भिन्न करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है। शरीर भले ही वृद्धिको प्राप्त हो, भले कभी कण-कण विदीर्ण हो जाय, दृढ़ निश्चयवाला मन भावित अर्थमें स्थिर ही रहता है। अभीष्ट अर्थमें आविष्ट मनको बाधा पहुँचानेमें शरीरस्थ भाव समर्थ नहीं होते। तीव्र वेगसे मन जिस भावका चिन्तन करता है, उसे ही देखने लगता है। वर-शापादि कोई भी क्रिया उस मनको विचलित नहीं कर सकती। जैसे मृग महापर्वतको विचलित नहीं कर सकते, वैसे ही तीव्र वेगसे भावित अर्थसे मनको कोई भी शक्तियाँ विचलित नहीं कर सकतीं। महोत्सेध देवागारमें भगवतीके समान यह असितापांगी मेरे मनःकोशमें प्रतिष्ठित है, अतः जीवनाधिका प्रियतमासे रक्षित होनेके कारण मुझे कोई भी दुःख नहीं व्यापते। जैसे मेघमालासे प्रावृत पर्वतमें ग्रीष्म, दावाग्निका दाह नहीं व्यापता, वैसे ही प्रियासे व्याप्त मनमें कोई कष्ट नहीं व्यापता। धीर प्राणीके मेरुतुल्य एकनिष्ठ मनको वर-शाप आदिसे भी विचलित नहीं किया जा सकता— एककार्यनिविष्टो हि मनो धीरस्य भूपते। न चाल्यते मेरुरिव वरशापबलैरपि ॥ वर-शापसे देहमें अन्यथात्व हो सकता है, परंतु विजिगीषु मनपर उनका प्रभाव नहीं पड़ता। इन्द्रने कहा—'राजन्! मन ही मुख्य वस्तु है। उसके रहनेपर सहस्रों देह उत्पन्न होते रहते हैं। उसके नष्ट होनेपर कुछ भी नहीं रह जाता। अंकुर रहनेसे ही पल्लवादि होते हैं, अंकुर न रहनेपर पल्लवादि नहीं होते। राजन्! दिशाओं- विदिशाओंमें मैं उसी हरिणाक्षीको ही देखता हूँ। मेरा मन तन्मय होनेसे अन्य दुःखादि मुझे कुछ भी प्रतीत नहीं होता।' राजाने अपने समीप विराजमान भरतमुनिसे अनुरोध किया कि वे इन दुर्मतियोंको शाप देकर नष्ट कर दें। भरतमुनिने भी विचारकर उन्हें शाप दे दिया कि 'तुम दोनों ही विनष्ट हो जाओ।' शाप सुनकर इन्द्र और अहल्याने कहा— 'आपके इस शापसे हमलोगोंका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। केवल आपकी तपस्याका मात्र क्षय हो गया।' घनस्नेहसे दोनोंका ही मन सम्बद्ध था। उसी घनस्नेहसे सम्बद्धमनस्क दोनोंकी देह नष्ट हो गयी और दोनों ही मृगयोनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी दोनों ही परस्पर प्रेमासक्त थे। अनन्तर विहंग हुए। वहाँ भी वही लोकोत्तर अनुरागोद्रेक हुआ। पुनः दोनों ही परम तपस्वी ब्राह्मण-दम्पती हुए। उनके अकृत्रिम प्रेम-रसानुविद्धस्नेहको देखकर वृक्ष भी रसानुविद्ध होकर शृंगारचेष्टाकुलित होते हैं— अकृत्रिमप्रेमरसानुविद्धं स्नेहं तयोस्तं प्रतिवीक्ष्य कान्तम्। वृक्षा अपि प्रेमरसानुविद्धा शृङ्गारचेष्टाकुलिता भवन्ति॥ (योगवासिष्ठ, उत्पत्ति० ९०।१४) इस तरह चित्तकी कल्पना ही संसार है। चित्ताकाश, महाकाश (भूताकाश), चिदाकाश—ये तीनों ही अनन्त हैं। चिदाकाशमें ही दोनोंका पर्यवसान होता है।