भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ भक्तिसुधा भैरवकी सिद्धि वहाँ होती है। ४४. जहाँ जिह्वाग्रका पतन हुआ, वहाँ गिरिपीठ हुआ तथा 'लकार' की उत्पत्ति हुई। यहाँ जप करनेसे वाक्सिद्धि होती है। ४५. मज्जाके पतनस्थानमें माहेन्द्रपीठ हुआ, वह 'वकार' के प्रादुर्भावका स्थान है, जहाँ शाक्त- मन्त्रोंके जपसे अवश्य सिद्धि होती है। ४६. दक्षिण अंगुष्ठके पातस्थानमें वामनपीठ हुआ एवं 'शकार' की उत्पत्ति हुई, यहाँ समस्त मन्त्रोंको सिद्धि होती है। ४७. वामांगुष्ठके निपतन-स्थानमें हिरण्यपुरपीठ हुआ, वहाँ 'षकार' की उत्पत्ति हुई। वहाँ वाममार्गसे सिद्धिलाभ होता है। ४८. रुचि (शोभा)-के पतन-स्थानमें महा- लक्ष्मीपीठ हुआ एवं 'सकार' का प्राकट्य हुआ। यहाँ सर्वसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ४९. धमनीके पतनस्थानमें अत्रीपीठ हुआ, वहाँ 'हकार' उत्पन्न हुआ और यावत् सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ५०. छायाके सम्पातन स्थानमें छायापीठ हुआ एवं 'ळकार' की उत्पत्ति हुई। ५१. केशपाशके पतनस्थलमें क्षत्रपीठका प्रादुर्भाव हुआ, यहीं 'क्षकार' का उद्गम हुआ। यहाँ समस्त सिद्धियाँ शीघ्रतापूर्वक उपलब्ध होती हैं। वर्णमालाएँ अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः। क, ख, ग, घ, ङ। च, छ, ज, झ, ञ। ट, ठ, ड, ढ, ण। त, थ, द, ध, न। प, फ, ब, भ, म। य, र, ल, व, श, ष, स, ह, ळ, क्ष— यही ५१ वर्णोंकी वर्णमाला है। यहाँ अन्तका ल 'ळ' रूपसे उच्चरित होता है तथा अन्तिम 'क्ष' अक्षमालाका सुमेरु है। इसी मालाके आधारपर सतीके भिन्न-भिन्न अंगोंका पात हुआ है। एतावता इतनी भूमि वर्ण- समाम्नायस्वरूप ही है। भिन्न-भिन्न वर्णोंकी शक्तियाँ और देवता भिन्न हैं। इसीलिये उन-उन वर्णों, पीठों, शक्तियों एवं देवताओंका परस्पर सम्बन्ध है, जिसके ज्ञान और अनुष्ठानसे साधकको शीघ्र ही सिद्धि होती है। मायाद्वारा ही परब्रह्मसे विश्वकी सृष्टि होती है। सृष्टि हो जानेपर भी उसके विस्तारकी आशा तबतक नहीं होती, जबतक चेतन पुरुषकी उसमें आसक्ति न हो। अतएव, सृष्टि-विस्तारके लिये कामकी उत्पत्ति हुई। रजःसत्त्वके सम्बन्धमें द्वैतसृष्टिका विस्तार होता है, परंतु तम कारणरूप है, वहाँ द्वैतदर्शनकी कमीसे मोहकी कमी होती है।* सत्त्वमय सूक्ष्मकार्यरूप विष्णु एवं रजोमय स्थूलकार्यरूप ब्रह्माके मोहित हो जानेपर भी कारणात्मा शिव मोहित नहीं होते। परंतु जबतक कारणमें भी मोह नहीं, तबतक सृष्टिकी पूर्ण स्थिति नहीं होती। इसीलिये स्थूल-सूक्ष्म कार्यचैतन्योंकी ऐसी रुचि हुई कि कारणचैतन्य भी मोहित हो। परंतु यह अघटितघटनापटीयसी महामायाके ही वशकी बात है। इसीलिये सबने उसीकी आराधना की। देवी प्रसन्न हुई, वह भी अपने पतिको स्वाधीन करना चाहती थी। स्वाधीनभर्तृका स्त्री ही परम सौभाग्यशालिनी होती है। वही हुआ, महामायाने शिवको स्वाधीन कर लिया, फिर भी पिताद्वारा पतिका अपमान होनेपर उसने उस पितासे सम्बन्धित शरीरको त्याग देना उचित समझा। महाशक्तिका शरीर उसका लीलाविग्रह ही है। जैसे निर्विकार चैतन्य शक्तिके योगसे साकार विग्रह धारण करता है, वैसे ही शक्ति भी अधिष्ठान चैतन्ययुक्त हो साकार विग्रह धारण करती है। इसीलिये शिव-पार्वती दोनों मिलकर अर्द्धनारीश्वरके रूपमें व्यक्त होते हैं। अधिष्ठान चैतन्यसहित महाशक्तिका
- 'तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्' (गीता १४।८)-के अनुसार तमस् अज्ञानसमुद्भूत और मोहक है तथापि रजोयुक्त तमस् ही अध्यासमें हेतु होनेसे मोहक है। स्वतः 'प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति' (गीता १४।८)-के अनुसार गाढ़ तमस् निद्रादिमें हेतु होनेसे द्वैतदर्शनका विलोप करनेवाला होनेसे अध्यासमूल अज्ञानात्मक है। वस्तुतः रजोगुणके नियामकका नाम ब्रह्मा है, सत्त्वगुणके नियामकका नाम विष्णु है और तमोगुणके नियामकका नाम शिव या रुद्र है। समष्टि रजस्, सत्त्व और तमस्का नियामक सनातन गुणातीत सर्वेश्वर ही हो सकता है। लक्षण-साम्यसे वस्तुसाम्यके कारण त्रिदेवमें सर्वेश्वरता चरितार्थ होनेसे एकरूपता है।