भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 563

शक्तिपीठ-रहस्य ५५३ उस लीलावग्रह सती-शरीरसे तिरोहित हो जाना ही सतीका मरना है। प्राणीको तपस्या एवं आराधनासे ही शक्तिको जन्म देनेका सौभाग्य एवं उसे परमेश्वरसे सम्बन्धितकर अपनेको कृतकृत्य करनेका सौभाग्य प्राप्त होता है, परंतु यदि बीचमें प्रमादसे अहंकार उत्पन्न हो जाता है तो शक्ति उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है और फिर उसकी वही स्थिति होती है, जो दक्षकी हुई। सतीका शरीर यद्यपि मृत हो गया तथापि वह महाशक्तिका निवास-स्थान था, श्रीशंकर उसीके द्वारा उस महाशक्तिमें रत थे, अतः मोहित होनेके कारण भी फिर उसको छोड़ न सके। यद्यपि परमेश्वर सदा स्वरूपमें ही प्रतिष्ठित होते हैं, फिर भी प्राणियोंके अदृष्टवश उनके कल्याणके लिये सृष्टि, पालन, संहरण आदि कार्योंमें प्रवृत्त-से प्रतीत होते हैं। उन्हींके अनुरूप महामायामें उनकी आसक्ति और मोहकी भी प्रतीति होती है। इसी मोहवश शंकर महाशक्तिके अधिष्ठानभूत उस प्रिय देहको लेकर घूमने लगे। देवताओं और विष्णुने शिवका मोह मिटानेके लिये उस देहको उनसे वियुक्त करना चाहा। साथ ही अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिके अधिष्ठानभूत उस देहके अवयवोंसे लोकका कल्याण हो, यह भी सोचकर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें विभिन्न अंगोंको गिराया। भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठानभूत भिन्न-भिन्न अंग जिन स्थानोंमें पड़े, वहाँ उन शक्तियोंकी सिद्धि सरलतासे होती है। जैसे कपोत और सिंहके मांस आदिमें भी उनकी विशेषता प्रकट होती है, वैसे ही सतीके भिन्न-भिन्न अवयवोंमें भी उनकी विशेषता प्रकट होती है। इसीलिये जैसे हिंगुके निकल जानेपर भी उसके अधिष्ठानमें उसकी गन्ध या वासना रहती है, वैसे ही सतीकी महाशक्तियोंके अन्तर्हित होनेपर भी उन अधिष्ठानोंमें वह प्रभाव रह गया। जैसे सूर्यकान्तमणिपर सूर्यकी रश्मियोंका सुन्दर प्राकट्य होता है, वैसे ही उन शक्तियोंके अधिष्ठानभूत अंगोंमें उनका प्राकट्य बहुत सुन्दर होता है। यहाँतक कि जहाँ-जहाँ उन अंगोंका पात हुआ, वे स्थान भी दिव्य शक्तियोंके अधिष्ठान माने जाते हैं। वहाँ भी शक्तितत्त्वका प्राकट्य अधिक है। अतएव उन पीठोंपर शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। अंग-सम्बन्धी कोई अंश या भूषण-वसनादिका जहाँ पात हुआ, वहीं उपपीठ हैं। उनमें भी उन-उन विशेष शक्तितत्त्वोंका आविर्भाव होता है। अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिका जो अधिष्ठान हो चुका है, वह एवं तत्सम्बन्धी समस्त वस्तुओंमें शक्तितत्त्वका बाहुल्य होना ही चाहिये। वैसे तो जहाँ भी कहीं, जिस किसी भी वस्तुमें जो भी शक्ति है, उन सबका ही अन्तर्भाव महामायामें ही है— यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। (श्रीदुर्गासप्तशती १।८२-८३) अपनी-अपनी योग्यता और अधिकारके अनुसार इष्ट देवता, मन्त्र, पीठ, उपपीठके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे सिद्धिमें शीघ्रता होती है। तथा च— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दरूपं यदक्षरम्। विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ —इत्यादि वचनोंके अनुसार प्रणवात्मक ब्रह्म ही निखिल विश्वका उपादान है। वही शक्तिमय सती-शरीररूपमें और निखिल वाङ्मय-प्रपंचके मूलभूत एकपंचाशत् वर्णरूपमें व्यक्त होता है। जैसे निखिल विश्वका शक्तिरूपमें ही पर्यवसान होता है, वैसे ही वर्णोंमें ही सकल वाङ्मय-प्रपंचका अन्तर्भाव होता है; क्योंकि सभी शक्तियाँ वर्णोंकी आनुपूर्वीविशेषमात्र हैं। शब्द-अर्थका, वाच्य-वाचकका असाधारण सम्बन्ध किंबहुना अभेद ही होता है, अतएव एकपंचाशत् वर्णोंके कार्यभूत सकल वाङ्मय-प्रपंचका जैसे एकपंचाशत् वर्णोंमें अन्तर्भाव किया जाता है, वैसे ही वाङ्मय-प्रपंचके वाच्यभूत सकल अर्थमयप्रपंचका उसके मूलभूत एकपंचाशत् शक्तियोंमें अन्तर्भाव करके वाच्य-वाचकका अभेद प्रदर्शित किया गया है। यही ५१ पीठोंका रहस्य है।