भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ भक्तिसुधा श्रीरामजन्म-रहस्य जिस समय संसारमें दुराचार, दुर्विचारका परितः प्रसार होने लगता है; अहिंसा, सत्य, अस्तेय, धैर्य, न्याय आदि मानवोचित सद्गुणोंका अपमान होने लगता है, दम्भका ही साम्राज्य तथा वेद-शास्त्रोक्त वर्णाश्रम-धर्मका विलोप होने लगता है, दैत्य-दानवों या दैत्यप्राय कुपुरुषोंसे धरा व्याकुल हो जाती है, सत्पुरुष तथा देवगण अनीतिसे उद्विग्न हो उठते हैं, उस समय सर्वपालक भगवान् किसी-न-किसी रूपमें प्रकट होकर श्रुति-सेतुका पालन करते और अपने मनोहर, मंगलमय, परम पवित्र चरित्रोंका विस्तार करके प्राणियोंके लिये मोक्षका मार्ग प्रशस्त कर देते हैं। अभिज्ञोंका मत है कि यदि भगवान्का विशुद्ध, सत्त्वमय, परम मनोहर, मधुर स्वरूप प्रकट न होता तो अदृश्य, अग्राह्य, अव्यपदेश्य परब्रह्मके साक्षात्कारकी बात ही जगत्से मिट जाती। भगवान्की मधुर मूर्ति एवं चरित्रोंमें मनके आसक्त हो जानेपर उसकी निर्मलता और एकाग्रता सहजमें ही सिद्ध हो जाती है। निर्मल एवं एकाग्र चित्त ही भगवान्के अचिन्त्य रूपके चिन्तनमें समर्थ होता है। जैसे अंजनद्वारा शुद्ध नेत्रसे सूक्ष्म वस्तुका परिज्ञान सुगमतासे हो जाता है, वैसे ही भगवच्चरित्र एवं उनके मधुर स्वरूपके परिशीलनसे निर्मल होकर चित्त सूक्ष्म-से-सूक्ष्म भगवदीय रहस्योंको समझ लेता है। इसके अतिरिक्त अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको प्रेमयोग प्रदान करनेके लिये भी प्रभुके लीला- विग्रहका आविर्भाव होता है। इन्हीं सब भावोंको लेकर मधुमास (चैत्र)-के शुक्लपक्षकी नवमीको मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रका जन्म हुआ। अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक, सर्वान्तरात्मा, सर्व- शक्तिमान् भगवान्की भ्रुकुटीके संकेतमात्रसे उनकी मायाशक्ति विश्वप्रपंचका सर्जन, पालन तथा संहार करती है। जैसे अयस्कान्त (चुम्बक)-के सान्निध्यसे लौहमें हलचल होती है, वैसे ही भगवान्के सान्निध्यमात्रसे मायाशक्तिको चेतना प्राप्त होती है। जैसे झरोखोंमें सूर्य-किरणोंके सहारे निरन्तर परिभ्रमण करते हुए अपरिगणित त्रसरेणु दिखायी देते हैं, वैसे ही प्रकृतिपारदृश्वा लोकोत्तरपुरुष-धौरेयोंको भगवान्के सन्निधानमें अनन्त विश्व दिखायी देते हैं—'यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति॥' भगवान् अपने पारमार्थिक रूपसे निराकार, निर्विकार, निष्कल, निरीह, निर्गुण होते हुए भी मायाशक्ति- युक्तरूपसे अनादिबद्ध, स्वांशभूत जीवोंपर कृपा करके उनके कल्याणार्थ विश्वके सर्जन एवं संहारादि लीलाओंमें प्रवृत्त होते हैं। मनीषी बड़े कुतूहलसे सकल विरुद्धधर्माश्रय भगवान्के इस कौतुकको देखकर कहते हैं— त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो वदन्त्यनीहादगुणाद्विक्रियात् । त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३।१९) अर्थात् हे नाथ! विज्ञजन निर्गुण, निरीह, अविक्रियेसे ही इस विविधवैचित्र्योपेत विश्वकी जन्म, स्थिति तथा संहार बतलाते हैं। भला जो निरीह तथा सर्वथा निष्क्रिय है, वही निरन्तर चांचल्यपूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाला—यह कैसे? परंतु भगवान्के ईश्वर तथा ब्रह्म—इन दो रूपोंमें इन विरुद्ध धर्मोंके सामंजस्य होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं है। मायायुक्त ऐश्वररूपमें विश्वनिर्माणके उपयुक्त निखिल क्रियाएँ हैं, परंतु मायारहित ब्रह्मरूपमें निरीहता एवं निष्क्रियता ही है। अर्थात् मायाशक्तिके सहारे होनेवाले समस्त व्यवहारोंका मायाधिष्ठान, स्वप्रकाश, विशुद्ध ब्रह्ममें उपचार होता है। अस्तु, वही व्यापक ब्रह्म निरंजन, निर्गुण, विगत-विनोद, भक्तप्रेमवश श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूपमें श्रीकौसल्याम्बाके मंगलमय अंकमें व्यक्त होता है।