भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 566

आत्मा 'तुरीय विराट्' है और सूक्ष्म प्रपंच-भासक 'अनुज्ञा आत्मा' तुरीय हिरण्यगर्भ है। इसी तरह कारण-भासक अनुज्ञाता आत्मा 'तुरीय अव्याकृत' है और सर्वभास्यादि प्रपंच-वर्जित अविकल्प आत्मा 'तुरीय-तुरीय' है। इस पक्षमें 'तुरीय विराट्' शत्रुघ्न, 'तुरीय हिरण्यगर्भ' लक्ष्मण, 'तुरीय अव्याकृत' भरत और 'तुरीय-तुरीय' श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्ररूपमें प्रकट होते हैं और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री महाशक्ति श्रीजनकनन्दिनीरूपमें प्रकट होती हैं। सर्वथाऽपि पूर्णतम पुरुषोत्तम वेदान्तवेद्य भगवान्‌का ही श्रीरामचन्द्ररूपमें प्राकट्य होता है, तभी तो उनके दर्शन, स्पर्श, श्रवण, अनुगमनमात्रसे प्राणियोंकी परमगति हो जाती है— स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ (