भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामभद्रका ध्यान ५५७ शीतल सुकोमल अमृतमयी चन्द्रिका छिटकी हो। सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासे भरपूर प्रेमानन्दरस बरसानेवाले लोकोत्तर अभिनव नील नीरदसे भी शतकोटिगुणित प्रभुके मंगलमय श्रीअंगमें सौन्दर्य, माधुर्य, सौरस्य सुधा है, जिससे पारावारविहीन अलौकिक प्रेमा- नन्दामृतकी वर्षा होती है। जब नीर प्रदान करनेवाले नव जलधरमें दीप्तिमत्ता, विशिष्ट श्यामलता, गम्भीरता तथा तापापनोदकता है, तब फिर प्रभुके श्रीअंगमें अद्भुत आकर्षकता, अद्भुत श्यामलता, गम्भीरता एवं तापापनोदकताका कहना ही क्या है! भावुकोंने भगवान्को श्रृंगार-रससार-सागर, आनन्द-रससार-सागर किंवा पूर्णानुराग-रससार-सागरसे समुद्भूत निर्मल निष्कलंक लोकोत्तर चन्द्रमा कहा है। भावुकोंने मधुरताके लिये अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दुके उद्गम-स्थान अचिन्त्य, अनन्त, परमानन्द-सुधासार-सरोवर-समुद्भूत पंकजका उपमान युक्त कहा है; क्योंकि जैसे क्षीर-सागरका पंक क्षीरसारनवनीत होता है, वैसे पूर्णानुराग-रस-सार सरोवरमें पंक उसका सार ही होगा और पंकज उसका भी सार होगा। माधुर्याधिष्ठात्री प्रभुकी हृदयेश्वरीके सम्बन्धमें महानुभावोंने कहा है कि यदि छबिसुधापयोनिधि हो उसमें निमग्न, परमरूपमय कच्छप हो, एवं उसी परम रूपके आश्रित श्रृंगारमय मन्दर हो, शोभामयी रज्जु हो और इन सामग्रियोंसे युक्त साक्षात् लोक-विलक्षण मन्मथ अपने करकमलोंसे मन्थन करे तो फिर उसमेंसे जो सुन्दरतासुखमूलमयी लक्ष्मी निकले—वही कथंचित् प्रभुकी हृदयेश्वरीका उपमान हो सकती है अथवा सुषमा- कामधेनुसे श्रृंगार-रससार दुग्धको दुहकर कामदेवने अपने दिव्य करकमलोंसे अमृतमय दही जमाया हो और उसका मन्थन करनेपर जो नवनीत निकले, उसीसे श्रीजनकनन्दिनी और श्रीरामचन्द्रजीको रचा गया है। भालपर सहस्रों सूर्योंकी दिव्य दीप्तियोंका तिरस्कार करनेवाला सुन्दर मुकुट शोभित हो रहा है। उसमें नाना प्रकारके नील, पीत, हरित परम प्रकाशमय मणि और मुक्ताएँ लगी हैं। मोतियोंकी मनोहर लड़ियाँ सुन्दर रूपमें लटक रही हैं। ऊपरकी स्निग्ध, सचिक्कण, श्यामल अलकावलियाँ मुकुटकी दिव्य दीप्तिसे वैदूर्यके समान नाना छबिसे परिप्लुत हो रही हैं। कपोल प्रान्तके स्निग्ध श्यामल कुटिल कुन्तल अति दिव्य कुण्डलोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान हो रहे हैं। महानुभावोंका कहना है कि प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके समीप दोनों कुण्डल तथा दिव्य किरीटके नील और लाल रत्नोंके साथ वे श्यामल स्निग्ध केश-समूह ऐसे शोभित होते हैं, जैसे अन्धकार-सार-समूह शुक्र-बृहस्पति एवं भौम और शनिको आगे लेकर चन्द्रमासे वैर मिटाकर मिलने चला हो। यहाँ दोनों कुण्डल शुक्र, बृहस्पतिके समान, नील तथा रक्त रत्न शनि एवं मंगलके समान और केश अन्धकार-सारके समान हैं। मुखचन्द्रकी दिव्य द्युतिसे कुण्डल और मुकुट जगमगा रहे हैं। मुकुट तथा कुण्डलोंकी आभा मुखचन्द्रपर शोभित हो रही है। भुजमूलतक लम्बायमान मयूरके आकारवाले कलकुण्डल अद्भुत शोभा बढ़ा रहे हैं। कुण्डलोंकी आभा कुटिल कुन्तलोंपर बड़ी सुहावनी लगती है, मानो दो कामदेव हरके डरसे प्रभुके कानोंमें लगकर मेरुकी बात कर रहे हैं। अत्यन्त स्निग्ध, सचिक्कण, श्यामल अलका- वलियाँ मुखचन्द्रपर ऐसी शोभित होती हैं, जैसे नागोंके छोटे-छोटे चमकीले श्यामल शिशु चन्द्रमापर अमृत पानेके लोभसे विराज रहे हों। चंचलताके समय मानो नागशिशु चन्द्रमासे लड़ते हैं और स्थिरताके समय मानो सौन्दर्य-माधुर्य अमृतका पान करके लोटपोट हो रहे हैं अथवा अमृतमय मुखचन्द्र और नयनकमल एवं अलकावलीका सामंजस्य ऐसा सुन्दर लगता है, मानो पूर्णचन्द्रके समक्ष कमलदल देखकर कौतुकसे विपुल अलिवृन्द आ गये हों। किंवा नीलमणीन्द्रमय मुखचन्द्रमें कमलदल-सरीखे आयत नयनोंको देखकर मानो आश्चर्यसे अलकावलीके छद्मसे भ्रमरवृन्द आये हों अथवा मानो भगवान्का मुख एक अद्भुत पद्म है, जो पूर्वोक्त प्रकारसे श्रृंगार, पूर्णानुराग या आनन्दसार-सरोवरसे उत्पन्न है अथवा