भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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चन्द्रसार-सरोवरसे उत्पन्न अद्भुत दीप्तिसम्पन्न लोकोत्तर नीलकमल है, जिसके सौन्दर्य-माधुर्यमय मादक मधुका पान करनेके लिये अलिकुलमाला अलकावलीके व्याजसे घेरे है। मानो मादक मधुर मधुका पानकर मत्त हुए भ्रमर गुंजार और चांचल्य छोड़कर विभोर हो रहे हैं। किंवा यह अलकावलीके छद्मसे 'अलं अत्यर्थं ब्रह्मात्मकं सुखं येषां ते अलकाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ब्रह्मविद् ही प्रभुके मुखपद्मके मादक माधुर्य-मधुका पानकर लोट-पोट हो रहे हैं। मनोहर भालपर सूर्यकी दो दिव्य किरणोंके समान किंवा विद्युत्‌की दो रेखाओंके समान कुंकुम- तिलक ऐसा शोभित होता है, मानो कामदेवने भ्रुकुटिरूप मरकत धनुषको तानकर दो तेजोमय कनकशर तमःस्तोकके लिये संधान किये हों। कामधनुषको भी लजानेवाली दिव्य श्यामल स्निग्ध भ्रुकुटी बड़ी ही सुन्दर है। किंचित् अरुणिमाको लिये हुए नील कमलदलके सरीखे सुन्दर नयन कर्णपर्यन्त शोभा दे रहे हैं। किंचित् अरुण और सित नयनोंके कोने बड़े मनोहर हैं। उनकी अरुणिमा मानो भक्तोंके मनोरथोंको रचनेवाली रजोगुणात्मिका और स्वच्छता भक्तोंके अभिलषित पदार्थोंकी रक्षा करनेवाली सत्त्वात्मिका माया है। शुकतुण्डको लजानेवाली बड़ी ही सुन्दर नासिका है। मानो नासिकापर ही मनोहर मुकुट और अलक एवं भालपर तिलककी शोभा आकर रुकी है। अति ललित गण्डमण्डल और विशाल भालपर सुन्दर तिलककी झलक निराली ही है। मंजु मुख-मयंकपर सुन्दर भौंहें सुन्दर अंकके समान भासित होती हैं। वंक भौंहें और भालमें विराजमान मनोहर कुंकुमरेखा अद्भुत शोभा सरसा रही है। नासिकामें सुन्दर मौक्तिककी शोभा अद्भुत ही है। अति मनोहर पद्मकोषके समान मुख बन्धूकपुष्प, बिम्बाफलके समान अत्यन्त सुन्दर दीप्तिमत्ता विशिष्ट अरुण अधर और ओष्ठ शोभित होते हैं। दाडिमबीज एवं कुन्दकलीके समान सुन्दर दन्तावली अत्यन्त मनोहर लगती है। स्वभावसे स्निग्ध और स्वच्छ दशनावली अधर तथा ओष्ठकी दिव्य अरुणिमासे अरुण हो रही है। जैसे अधर-ओष्ठकी अरुण दीप्तिसे दशनावलीमें स्निग्ध अरुणिमाकी आभा है, वैसे ही दशनावलीकी भी दिव्य स्निग्ध दीप्ति अधरोंपर प्रकट हो रही है अथवा जैसे अरुण पंकज-कोषमें मोतियोंकी अतिसुन्दर देदीप्यमान पंक्ति शोभित हो, वैसे ही भगवान्‌के मुखपंकजमें दशनावलीकी शोभा है। दोनों कपोल, चिबुक और भालपर्यन्त समस्त मुख तो नीलमणीन्द्रमय चन्द्रमा, किंवा अद्भुत-दीप्ति- सम्पन्न श्यामल महोमय श्रृंगार-रससार-सरोवर-समुद्भूत नील पंकजके समान है। परंतु मुख्य मुख तो पूर्णानुराग-रससार-सरोवर-समुद्भूत सरोज ही है; क्योंकि उसमें अरुण दीप्तिका प्राधान्य है और अनुराग भी अरुण ही है। अतः तत्सार-सरोजमें अति अरुणिमाका सामंजस्य हो सकता है। पूर्णानुराग-रससार-सरोवर-समुद्भूत अरुण मुख-पंकजमें ही वह अधर-सुधा है, जो अन्तरंग भावुक जनोंके तथा प्रभु-प्राणेश्वरीके निरतिशय निरुपाधिक रागका आस्पद है। अधर-ओष्ठमें तो यों ही अद्भुत सरसता, स्निग्धता एवं दीप्तिमत्ता-विशिष्ट अरुणिमा है, दूसरे वह भावुकोंके रागसे महानुराग- रस-रंजित हो उठती है। अधरकी सूक्ष्म रेखाओंसे ताम्बूलका कुछ चटकीला रस और ही शोभा दरसा रहा है। बाल सूर्यकी कोमल रश्मियोंसे अतसी-पुष्पमें जैसे स्वच्छतायुक्त अद्भुत श्यामता है, उससे भी शतकोटिगुणित स्वच्छतायुक्त मधुरता श्रीभगवान्‌के अंगकी है। उसमें विकसित नील-कमल-कोषके समान कपोल बड़े ही सुडौल और गोल हैं। उनपर दिव्य मुक्तामणि रत्नोंसे जटिल सुवर्ण मणिमय कुण्डलोंकी अद्भुत झलक विराजमान है। कुण्डलों और मुकुटकी झलकसे नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे युक्त स्निग्ध श्यामल कुन्तलोंकी भी आभा पड़ रही है। शोभा तथा छबिकी सीमा चिबुककी चमकीली श्यामलता विलक्षण