भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामभद्रका ध्यान [५५९]
ही है। भावुकोंने तो कपोल और चिबुकपर कस्तूरिका और कुंकुमसे मकरीपत्र और कल्पवृक्षके मनोहर चित्र भी बनाये हैं, जो कि मनको बरबस खींच लेते हैं। अधरकी मनोहर अरुणिमासे स्वच्छ मोती भी विद्रुमके समान प्रतीत होने लगता है। नयनोंसे निरीक्षण-कालमें नयन-पुतरियोंकी दीप्तिसे मोती गुंजाके समान प्रतीत होने लगता है। जब यह कुतूहल देखकर वे हँस देते हैं, तब ब्रह्मस्मित चन्द्रिकाके सम्पर्कसे वह मोती हो जाता है। यह स्मित चन्द्रिका या उदार हास मानो हृदयस्थ अनुग्रहचन्द्रकी ही अमृतमयी दिव्य दीप्ति है। इस उदार हास दिव्य कलचन्द्रिकासे तो मानो नभोमण्डल धौत हो जाता है। सौगन्ध्य-लोभसे आये हुए भ्रमरवृन्द भी अपनी नीलिमा खोकर स्वच्छ रूप धारण कर बैठते हैं। उदार हास वक्षःस्थलपर हारके समान शोभायमान होता है। मनोहर मुखपंकजमें स्मित चन्द्रिका और उदार हास ऐसे शोभित होते हैं, मानो किसी अद्भुत नील कुवलयमें विलक्षण चन्द्रमा कभी छिपता है और कभी प्रकट होता है। विशेष स्वादकी बात यह है कि अरुण अधरमें मधुर बोलते समय दशनावली दामिनीके समान चमकती है। सुन्दर हास और मनोहर चितवन तो मनको लुभा लेती है। अरुण अधरके मध्यमें स्निग्ध दशन-पंक्ति और मनोहर हास मनोहर लगता है, मानो विद्रुमके विमानपर सुर-मण्डली बैठकर फूल बरसा रही हो अथवा अरुणतर अधरोंमें मनोहर हासयुक्त दशन- पंक्ति ऐसी शोभित होती है, जैसे सुवर्णके कमलमें तड़ितोंके साथ कुलिशोंने निवास किया हो। कमलदल-सरीखे दोनों नयनोंमें पुतलियाँ मधुकरके समान प्रतीत होती हैं। नासिका शुकतुण्डके समान मानो लड़ती हुई धनुषरूपी अवलियोंमें बचाव करनेके लिये प्रकट हुई है। सुषमाके अयन नयन और कुंचित केश, कलकुण्डल और नासिका ऐसी सुहावनी लगती है, मानो चन्द्रबिम्बके मध्यमें कमल तथा मीन और खंजनको देखकर भ्रमर-मकर अपनी-अपनी गाँव ताककर आये हों। शंखके सदृश कण्ठ बड़े ही शोभित हो रहे हैं। निर्मल पीताम्बर ऐसे शोभित होते हैं मानो नवनीलनीरदपर दामिनी दमकती है। अथवा सुचन्दन-चर्चित श्यामल श्रीअंगपर पीत दुकूल ऐसी छबि देता है, जैसे नील जलदपर चन्द्रिकाकी चमक देखकर दामिनी दमकती हो। अतः दामिनीको विनिन्दित करनेवाला, सुषमा-सदन मदनको भी मोहनेवाला सौन्दर्य-सार-सर्वस्व सुन्दर पीताम्बर प्रभुके श्रीअंगपर बड़ा ही सुहावना लगता है। श्रीवक्षःस्थलपर मनोहर सुन्दर श्यामल तरुण तुलसीदल-मालसहित मुक्तावली ऐसी शोभित होती है, जैसे महेन्द्रमणि-शिखरपर हंसकी पंक्तियोंसे युक्त श्रीरविनन्दिनी विराजमान हों। रुचिर उपवीत तथा अनेक प्रकारकी मुक्ताओंकी मालाएँ ऐसी मालूम पड़ती हैं, जैसे इन्द्रधनुष नक्षत्रोंके साथ तिमिर-राशिपर विराजमान हो। उसे देखकर अश्विनीकुमार, मदन, सोम सभी लज्जित होते हैं। भूषण तो ऐसे ज्ञात हो रहे हैं, मानो तरुण शृंगारतरु सुन्दर फलोंसे भरपूर हो अथवा कन्दर्प ही भूषणके छद्मसे शोभासार सुधाजलनिधि श्रीप्रभुके अंगसे शोभा लेने आये हों। पर वे लोभी लोभवश वहीं रह गये; जा न सके। प्रभुके श्रीअंगपर रोम-रोमपर अनन्तकोटि सोम और काम न्योछावर किये जा सकते हैं। श्रीभगवान्की मनोहर भुजाएँ चमकीली और मनोहर श्यामतासे युक्त हैं। उनमें कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनका विलिम्पन है और वे नाना प्रकारके अंगद, कंकण, मुद्रिकाओंसे भूषित हैं। कुछ भावुकोंका कथन है कि श्रीभगवान्की भुजाएँ श्रीजीके स्नेहरूप वरवेलिवेष्टित वटतरु हैं। प्रेमबन्ध ही वटवारि है। मंजुल मंगल मूल ही उसका मूल है। अँगुलियाँ मनोहर शाखाएँ, रोमावली ही पत्रावली, नख ही सुमन और सुजनोंके अभीष्ट ही सुफल हैं। उसकी अविचल, अमल, अनामय, सान्द्र, ललित, छद्मरहित, शुभ छाया समस्त सन्ताप, राग, मोह, मान, मद, मायाको शमन करनेवाली है। पवित्र मुनि-भृंग-विहंग ही इसका सेवन करते हैं।