भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 570

५६० भक्तिसुधा उरमें सुन्दर भृगुचरण और श्रीवत्स तथा लक्ष्मीका सुन्दर चिह्न है। दक्षिण वक्षःस्थलमें दक्षिणावर्त विसतन्तुके समान स्वच्छ स्निग्ध रोमोंकी राजि है। मध्यमें भृगुचरण और वाम वक्षःस्थलमें वामावर्त सुवर्णवर्ण रोमोंकी राजि है। यही दोनों रोम-राजियाँ श्रीवत्स और लक्ष्मीके चिह्न हैं। अनेक भूषणोंसे भूषित, प्रलम्ब, श्यामल, चमकीली भुजाएँ पीताम्बरसंयुक्त होकर अद्भुत शोभा बढ़ा रही हैं। सुन्दर कौंधनी (करधनी) नितम्ब-बिम्बपर ऐसी शोभित होती है, मानो कनककमलकी अति सुहावनी पंक्ति मरकत- मणिशिखरके मध्यमें जाकर विराजमान हो अथवा मुखचन्द्रके भयसे ऊपर न जाकर वहीं नमितमुख होकर विकस रही हो। अति गम्भीर नाभि-सरोवर यमुना-भँवरके समान है। उसके ऊपरकी रेखाएँ बड़ी ही मनोहर हैं। दामिनीको लजानेवाले दिव्य पीताम्बरसे समावृत चमकीले श्यामल जानु और ऊरु अद्भुत छविमय सम्पन्न हो रहे हैं। नाना मुक्तामणिगण-जटित नूपुर ऐसा सुहावना लगता है, मानो मधुमत्त अलिगण युगल चरणकमलको देखकर झूम रहे हों। श्रीभगवान्‌के चरणपृष्ठ श्यामल, तल अरुण और नखश्रेणि कुछ स्वच्छ है। यह मानो यमुना, गंगा तथा सरस्वतीका संगम है, जिसमें अंकुश, कुलिश, कमल, ध्वज आदि चिह्न ही सुन्दर भँवर-तरंग हैं अथवा यह जो चक्र है, वह मानो भक्तजनके अरिषड्वर्गको नाश करनेके लिये है। कमल ध्यातृचित्तरूपी द्विरेफ (भ्रमर)- को मोहित करनेके लिये है, ध्वज भक्तजनके सर्वानर्थका नाशक वज्र है, वह भक्तके पापाद्रि-भेदनार्थ ही है। पाष्णिमध्यमें जो अंकुश है, वह मानो भक्तचित्तेभको वशमें करनेके ही लिये है। कमलदल-सरीखी अंगुलियोंपर नखमणि-श्रेणी ऐसी शोभित होती है, मानो कमलदलपर अरुणिमासे रंजित तुषारके कण रंजित होते हैं। किंवा नखोंमें सुन्दर अरुण ज्योतिःसम्पन्न नख-श्रेणी ऐसी मनोहर लगती है, मानो कमलदलोंपर दस मंगल सुन्दर सभा बनाकर अचल होकर बैठे हों। उन्नत चरण- पृष्ठ कदली-स्तम्भके समान, दोनों जंघा काम- तूणीरके समान सुहावने लगते हैं। इसी तरह भावुकोंने अनेक प्रकारसे भगवान् श्रीरामचन्द्रके अद्भुत दिव्य रूपका वर्णन किया है। भगवदवतारका प्रयोजन श्रीभगवान्‌के अवतार ग्रहण करनेके अनेक प्रयोजन हैं—धर्मग्लानि, अधर्माभ्युत्थानका निवर्तन, धर्मका संस्थापन, सन्मार्गानुगामी साधुओंका रक्षण, दुष्कृतियोंका संहार करना इत्यादि—ये सब प्रयोजन साक्षात् श्रीमुखने ही कहे हैं। कुन्ती महारानीका कहना है कि अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगविधान करनेके लिये भगवान्‌का अवतार होता है— तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) अर्थात् परमहंसोंके प्रत्यक्चैतन्याभिन्न विशुद्ध ब्रह्मके अपरोक्ष साक्षात्कारको भक्तियोगद्वारा सरस एवं सुशोभित बनाकर उन्हें श्रीपरमहंस बनानेके लिये आपका प्रादुर्भाव होता है। भगवत्प्रीतिका बिना नैष्कर्म्यज्ञानकी शोभा नहीं होती— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। (श्रीमद्भा० १।५।१२) 'सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।' (रा०च०मा० २।२७७।५) वेदान्तवेद्य, अदृश्य, अग्राह्य, भगवान् अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे परममनोहर, सगुण, साकार सच्चिदानन्दघनरूपमें व्यक्त होकर अमलात्मा परमहंसोंके भजनीय बनकर उनके भक्तियोगके विधायक बनते हैं। ऐसे ही अन्यान्य अनेक प्रयोजन भगवान्‌के अवतारके

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 570, कुल 778 में से · BharatKosha