भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भगवदवतारका प्रयोजन ५६१

हैं। उनकी इयत्ताका निर्णय कोई नहीं कर सकता। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥' (रा०च०मा० १।१२१।२) भगवदवतरणके विभिन्न प्रयोजनोंके विविध अभिप्राय इन एक-एक प्रयोजनोंके अनेक अभिप्राय हैं, परंतु यहाँ इनमें एक-दो प्रयोजनोंपर ही विचार करना है। श्रीशुकदेवजीने कहा है कि— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) अर्थात् अव्यय, अप्रमेय, निराकार, निर्विकार, निर्गुण एवं गुणागार भगवान् अनन्तकोटिकन्दर्पमदमोचन श्रीकृष्णचन्द्रकी परमानन्दकन्दरूपमें अभिव्यक्ति जन- साधारणके कल्याणार्थ होती है। इस श्लोकमें 'नृणाम्' शब्दका 'नरमात्राभिमानी अज्ञानी' अर्थ विवक्षित है, जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' इस मन्त्रका व्याख्यान करते हुए श्रीमच्छंकरभगवत्पादने कहा है। जो विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परब्रह्मात्माको पहचान चुका है, वह तो नर, नाग, देव, गन्धर्वादि कार्यकारणसंघातोंसे पृथक् अन्तरात्माको देखता है, वह नरमात्राभिमानी नहीं होता। जो स्वधर्मानुष्ठान, उपासना एवं श्रवण, मनन, निदिध्यासनादिद्वारा अपने शुद्ध स्वरूपका साक्षात्कार कर चुके हैं, वे तो निःश्रेयसरूप ही हैं। परंतु जो उसमें असमर्थ हैं, उनके निःश्रेयसार्थ भगवान् श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए हैं। अतएव अत्यन्तबहिर्मुख प्राणियोंका भी, जिनका कि अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, ब्रह्मसाक्षात्कार या उपासनामें चित्त ही नहीं लगता, भगवान्‌के मनोहरस्वरूपमें चित्त निविष्ट हो सकता है। अतएव काम, क्रोध, भय, स्नेहसे या ऐक्यभावसे यथाकिञ्चित् भगवान्‌में मनका प्रवेश करके प्राणी संसारसे छूटकर भगवद्रूप हो जाता है। कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) कंस भयसे, शिशुपाल द्वेषसे, कुब्जा कामसे श्रीकृष्णमें लीन हो गयी; मारनेकी इच्छासे पूतना कालकूटविषलिप्त स्तन्य पिलाकर भी कृतकृत्य हो गयी। कुछ व्रजांगनाएँ उन्हीं पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान्‌का जारबुद्धिसे चिन्तनकर तल्लीन हो गयीं। कहा जा सकता है कि यदि वे व्रजांगनाएँ बिना तत्त्वसाक्षात्कार किये ही श्रीकृष्णको जार समझती हुई ही ब्रह्मलीन हो गयीं, तब तो ज्ञानकी आवश्यकता ही न रह जायगी। ऐसी स्थितिमें 'नैनमविदितो देवो भुनक्ति।', 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।' इत्यादि श्रुतियोंका यह कहना विरुद्ध होगा कि भगवान् बिना प्रत्यक् चेतनरूपसे साक्षात्कार किये साधकका पालन नहीं करते और बिना ज्ञानके मुक्ति नहीं होती। यदि कहा जाय कि वस्तुतः श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं, अतः उनके ज्ञानकी अपेक्षा नहीं है। विष जानमें या अनजानमें यथाकथंचित् सेवन करनेसे भी अपना फल देता है। अमृत भी ज्ञानमें, अज्ञानमें सर्वथा अपना फल देता ही है। वैसे ही श्रीकृष्ण ब्रह्म हैं, चाहे ब्रह्मबुद्धिसे, चाहे जारबुद्धिसे उनका सेवन किया जाय, अवश्य उसका फल होगा। परंतु इसपर यह कहा जाता है कि वस्तुदृष्टिसे यह समस्त विश्व ही ब्रह्म है, फिर तो सभीके पति, पुत्र, शत्रु, मित्र ब्रह्म ही हैं, उनका चिन्तन करनेसे भी मुक्ति होनी चाहिये। अतः इस ब्रह्माकारवृत्तिसे मूलाज्ञानके नष्ट होनेपर निरावरण ब्रह्मका साक्षात्कार ही मोक्षका कारण है। बिना निरावरण ब्रह्मका अनुभव हुए पति, पुत्रादि प्रीति सावरण एवं भिन्न-भिन्न प्रपंचाकारमेंसे विवर्तित ब्रह्मकी प्रीति मोक्षका हेतु नहीं बन सकती। इसपर अभिज्ञोंका कहना है कि यह ठीक है कि निरावरण ब्रह्मका अनुभव ही मोक्षका कारण है और उसके लिये ब्रह्माकारवृत्ति या ब्रह्मविज्ञान अपेक्षित है, परंतु श्रीकृष्ण लौकिक पति-पुत्रादिकोंके समान सावरण ब्रह्म या विवर्तित ब्रह्म नहीं हैं, किंतु वे तो निर्गुण, निरावरण, शुद्ध ब्रह्म ही हैं। अतः उनका अनुभव, उनके मनकी आसक्ति अवश्य ही मुक्तिका मूल है। 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' इत्यादि श्रुतियाँ वहाँके लिये