भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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५६२ | भक्तिसुधा

हैं, जहाँ सावरण ब्रह्मका सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण तो निरावरण ब्रह्म हैं, अतः यहाँ तो जैसे विषबुद्धिसे भी पान करनेपर अमृत अमृतत्वको प्रदान करता है, वैसे ही जारबुद्धि या शत्रुबुद्धिसे भी निरावरण ब्रह्मात्मक श्रीकृष्णका भजन मोक्षका मूल है—'वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं रखती।' जैसे चिन्तामणिमें यदि दीपक-बुद्धिसे प्रवृत्ति हो तो भी लाभ चिन्तामणिका ही होगा, वैसे ही निरावरण ब्रह्म श्रीकृष्णमें शत्रु या जारबुद्धिसे भी प्रवृत्ति होनेपर प्रवृत्तको शुद्ध ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी, जार या शत्रु की नहीं। कहा जा सकता है कि शुद्ध ब्रह्म तो कूटस्थ एवं अदृश्य है, अतः विशुद्धसत्त्व या अचिन्त्य दिव्यलीला-शक्तिके योगसे ही उसकी श्रीकृष्णरूपमें अभिव्यक्ति माननी पड़ेगी। ऐसी स्थितिमें शक्तिका व्यवधान होनेसे आवरण अवश्य ही मानना पड़ेगा, फिर श्रीकृष्ण निर्गुण एवं निरावरण कैसे हुए? इसका उत्तर यह है कि जैसे बादल आदिके सम्बन्धमें सूर्यस्वरूप आवृत होता है; वैसे ही राजस, तामस उपाधियोंके सम्बन्धसे ब्रह्मस्वरूप आवृत हो जाता है। प्रपंचरूपमें विवर्तित ब्रह्म राजस, तामस उपाधियोंके सम्बन्धसे आवृत रहता है, परंतु विशुद्धसत्त्व दिव्यलीलाशक्ति तो अत्यन्त स्वच्छ है। जैसे शुद्ध काँच दूरवीक्षण यन्त्र या उपनेत्रके सम्बन्धसे सूर्यस्वरूप आवृत नहीं होता, किंतु निरावरण सूर्यकी अपेक्षा स्पष्ट-सूर्यका दर्शन होता है, वैसे ही लीलाशक्तिके सम्बन्धसे श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्म आवृत नहीं होता, अपितु निरावरण ब्रह्मकी अपेक्षा भी सुन्दर, मधुर एवं मनोहर होकर व्यक्त होता है। जैसे शीतलताके सम्बन्धसे बर्फरूपमें परिणत जल निरावरण ही समझा जाता है, वैसे ही श्रीकृष्णरूपमें व्यक्त ब्रह्म गुणकृत आवरण एवं प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण निर्गुण और निरावरण समझा जाता है। इसी अभिप्रायसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्।' इत्यादि उक्तियाँ हैं। ऊपर कहा गया है कि निर्गुण, गुणागार, अव्यय, अप्रमेय परब्रह्मकी ही श्रीकृष्णरूपमें अभिव्यक्ति प्राणियोंके कल्याणार्थ है। उनके मंगलमय श्रीअंगकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता हठात् प्राणियोंके मनको खींच लेती है और पाषाण तथा वज्रके समान हृदयको पिघलाकर नवनीतके समान कोमल एवं सरस बना देती है। सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्य-सौगन्ध्यसुधाजलनिधि श्रीअंगमें इन्द्रियों और मनकी स्वाभाविकी आसक्ति हो जाती है। अमृतमय मुखचन्द्रमें मन और नयनकी ऐसी आसक्ति होती है कि वे लौटना तो भूल ही जाते हैं। जो मन विषयोंसे एक क्षणके लिये पृथक् नहीं हो सकता, वही भगवान्‌में आसक्त होकर विषयोंको भूल जाता है। फिर ज्ञान-विज्ञान-अपेक्षित सभी दिव्य गुण सेवाके लिये व्यग्र हो उठते हैं। ऐसे परम मधुर मनोहर भगवान्‌में प्रीति-आसक्तिका होना स्वाभाविक ही है। यदि प्रीति न भी हुई तो काम, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध आदि हो गया तो भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जो जारबुद्धि अन्यत्र घोर नरकका मूल है, वही भगवान्‌में परम कल्याणका मूल हो जाती है। जैसे सुवर्णमुद्रिका और दिव्य रत्नका सम्बन्ध बनानेके लिये लाखका भी मूल्य बढ़ जाता है, वैसे ही भावुक और भगवान्‌का सम्बन्ध सुस्थिर करनेके लिये जारबुद्धि भी बहुमूल्य हो जाती है। अन्यत्र 'जार' का अर्थ 'जयति सर्वान् गुणान् धर्मस्वर्गापवर्गान् जारः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होता है कि सब गुणोंको या धर्म, स्वर्ग, अपवर्ग आदिको नष्ट करनेवाला। परंतु यहाँ 'जरयति अविद्या तत्कार्यात्मकं बन्धमविद्याग्रन्थिं कामान् वा इति जारः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होता है कि जो अविद्याग्रन्थिको जला दे, अविद्या—तत्कार्यात्मक बन्धको नष्ट कर दे अथवा समस्त कामवासनाओंको जलाकर नष्ट करनेवाला परमात्मा ही जार है। इस तरह साधारण-से-साधारण, उल्बण-से- उल्बण प्राणियोंकी सद्गतिके लिये ही श्रीभगवान्‌का अवतार है। कुछ अभिज्ञोंका कहना है कि भगवान् अपने ही सौशील्य, औदार्य, वात्सल्य आदि गुणगणोंकी सफलताके लिये इस मर्त्यलोकमें अवतीर्ण होते हैं।