भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 573

भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६३ यदि ऐसा न हो तो उनके पतितपावनत्वादि गुणगण व्यर्थ और वन्ध्य हो जायँगे। अपनी अनन्तता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकताको भुलाकर बन्दरोंके साथ मिल-जुलकर आत्मीयताका व्यवहार करना यही अद्भुत सौशील्य है- प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥ (रा०च०मा० १।२९(क)) गृध्रराजको अपने अंकमें लेकर अपने ही हस्तारविन्दसे उनके अंगका मार्जन करना, नयनाश्रुओंसे अभिषेक करना, 'तात-तात' मधुर वचनामृत सुनाकर उनको सुरेन्द्रादिस्पृहणीय दिव्यगतिको प्रदान करना मनोहर मुखचन्द्रका दर्शन देना। विभीषण, सुग्रीवादिके संग मैत्री जोड़ना, श्रीहनुमान्‌के ऋणी रहना- 'सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।' (रा०च०मा० ५।३२।७) प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ (रा०च०मा० ५।३२।६) एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ -ये सब ऐसे कार्य हैं, जिनका होना साकेतलोक, गोलोकमें एवं निराकार निर्गुणरूपमें असम्भव है। श्रीदामासे पराजित होकर उसका घोड़ा बनना, व्रजांगनाओंके छछियाभर छाछपर नाच नाचना, वेदवचन मुनिमन अगम होकर भी चित्रकूटके कोल-भिल्लोंके वचनोंको बड़े चावसे सुनना ('बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥' रा०च०मा० २।१३६), जिसके छाया-स्पर्शमें भी मार्जनकी अपेक्षा हो उस निषादसे सख्य जोड़ना, महामहापतिताको जगत्पावन बनाना आदि कार्य बिना अवतार ग्रहण किये हो ही नहीं सकते। अतः प्रभु अपने ही प्रयोजनमें इन गुणों एवं अबन्ध्य सफलतासम्पादनके लिये हमलोगोंमें अवतीर्ण होते हैं। पण्डितराजने गंगाजीसे कहा है- 'हे अम्ब ! आपके मनमें बहुत दिनोंसे यह रुचि थी कि कोई ऐसा उत्कट पतित पातकी मिले कि जिसको तारनेमें कोई तीर्थ, तप, जप, व्रत एवं कोई देवता समर्थ न हो तो उसको मैं पावन करूँ। अम्ब! बस, मैं आपकी उसी रुचिको पूरा करने आया हूँ। मुझ-जैसा पातकी, महापतित और कौन कहाँ मिलेगा ? माँ! लो, मुझे तारकर अपना अभिलाष पूरा करो।' ठीक वैसे ही हम-सरीखे पतितों एवं दीनोंसे भरपूर इस मर्त्यलोकमें यदि प्रभु न पधारें तो कम-से-कम उनकी दीनवत्सलता, पतितपावनता आदि गुण तो व्यर्थ ही हो जायँ। अतः उन्हीं सबकी सफलताके लिये श्रीभगवान्‌का अवतरण होता है। दीनवात्सल्य, पतितपावनता, सौशील्य, औदार्य, कारुण्यसिन्धुत्व आदि गुणोंसे ही प्रेरित होकर प्रभु दीनोंकी, पतितोंकी कल्याणकामनासे ऊपरसे नीचे उतरते हैं। यदि यह सच है तो सचमुच किसीको निराश न होना चाहिये। भारतमें ही अवतार क्यों ? यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।७-८) हे भारत! जब-जब धर्मकी ग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं आत्माका सृजन अर्थात् अवतार ग्रहण करता हूँ। साधुओंके परित्राणार्थ, पापात्माओंके विनाशार्थ एवं धर्म- संस्थापनके लिये युग-युगमें मैं प्रकट होता हूँ। यहाँ यह विचार उठता है कि भगवान् भारतमें ही धर्मरक्षा आदिके लिये अवतार ग्रहण करके प्रकट