भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६३ यदि ऐसा न हो तो उनके पतितपावनत्वादि गुणगण व्यर्थ और वन्ध्य हो जायँगे। अपनी अनन्तता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकताको भुलाकर बन्दरोंके साथ मिल-जुलकर आत्मीयताका व्यवहार करना यही अद्भुत सौशील्य है- प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥ (रा०च०मा० १।२९(क)) गृध्रराजको अपने अंकमें लेकर अपने ही हस्तारविन्दसे उनके अंगका मार्जन करना, नयनाश्रुओंसे अभिषेक करना, 'तात-तात' मधुर वचनामृत सुनाकर उनको सुरेन्द्रादिस्पृहणीय दिव्यगतिको प्रदान करना मनोहर मुखचन्द्रका दर्शन देना। विभीषण, सुग्रीवादिके संग मैत्री जोड़ना, श्रीहनुमान्के ऋणी रहना- 'सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।' (रा०च०मा० ५।३२।७) प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ (रा०च०मा० ५।३२।६) एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे। शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम्॥ -ये सब ऐसे कार्य हैं, जिनका होना साकेतलोक, गोलोकमें एवं निराकार निर्गुणरूपमें असम्भव है। श्रीदामासे पराजित होकर उसका घोड़ा बनना, व्रजांगनाओंके छछियाभर छाछपर नाच नाचना, वेदवचन मुनिमन अगम होकर भी चित्रकूटके कोल-भिल्लोंके वचनोंको बड़े चावसे सुनना ('बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥' रा०च०मा० २।१३६), जिसके छाया-स्पर्शमें भी मार्जनकी अपेक्षा हो उस निषादसे सख्य जोड़ना, महामहापतिताको जगत्पावन बनाना आदि कार्य बिना अवतार ग्रहण किये हो ही नहीं सकते। अतः प्रभु अपने ही प्रयोजनमें इन गुणों एवं अबन्ध्य सफलतासम्पादनके लिये हमलोगोंमें अवतीर्ण होते हैं। पण्डितराजने गंगाजीसे कहा है- 'हे अम्ब ! आपके मनमें बहुत दिनोंसे यह रुचि थी कि कोई ऐसा उत्कट पतित पातकी मिले कि जिसको तारनेमें कोई तीर्थ, तप, जप, व्रत एवं कोई देवता समर्थ न हो तो उसको मैं पावन करूँ। अम्ब! बस, मैं आपकी उसी रुचिको पूरा करने आया हूँ। मुझ-जैसा पातकी, महापतित और कौन कहाँ मिलेगा ? माँ! लो, मुझे तारकर अपना अभिलाष पूरा करो।' ठीक वैसे ही हम-सरीखे पतितों एवं दीनोंसे भरपूर इस मर्त्यलोकमें यदि प्रभु न पधारें तो कम-से-कम उनकी दीनवत्सलता, पतितपावनता आदि गुण तो व्यर्थ ही हो जायँ। अतः उन्हीं सबकी सफलताके लिये श्रीभगवान्का अवतरण होता है। दीनवात्सल्य, पतितपावनता, सौशील्य, औदार्य, कारुण्यसिन्धुत्व आदि गुणोंसे ही प्रेरित होकर प्रभु दीनोंकी, पतितोंकी कल्याणकामनासे ऊपरसे नीचे उतरते हैं। यदि यह सच है तो सचमुच किसीको निराश न होना चाहिये। भारतमें ही अवतार क्यों ? यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।७-८) हे भारत! जब-जब धर्मकी ग्लानि और अधर्मका अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं आत्माका सृजन अर्थात् अवतार ग्रहण करता हूँ। साधुओंके परित्राणार्थ, पापात्माओंके विनाशार्थ एवं धर्म- संस्थापनके लिये युग-युगमें मैं प्रकट होता हूँ। यहाँ यह विचार उठता है कि भगवान् भारतमें ही धर्मरक्षा आदिके लिये अवतार ग्रहण करके प्रकट
५६४ | भक्तिसुधा होते हैं या अन्यान्य देशोंमें भी ? यदि भारतमें ही, तब वे भगवान् कैसे ? वे तो अखिल विश्वके नियामक और ईश्वर हैं। समस्त विश्वको पाप- पंकसे उद्धृत करके उसे धर्मात्मा बनाना उनका कर्तव्य है। अतः विश्वकी ही धर्मग्लानि, अधर्माभ्युत्थान मिटाकर धर्मसंस्थापनकी आवश्यकता है। विश्वके ही साधुओंके पालन और दुष्कृतियोंके संहारकी आवश्यकता है, फिर भगवान्का उक्त कार्योंके लिये भारतमें ही क्यों अवतार होता है ? समदर्शी, सर्वसम भगवान्को सभी देशोंमें अवतार ग्रहण करके पूर्वोक्त कार्य करना चाहिये। यदि सभी देशोंमें भगवान्के अवतार होते हैं तो वे अवतार-पुरुष कौन-कौन हैं ? साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिये कि क्या सभी देशोंमें जो प्रचलित धर्म हैं, उनके भी स्थापक और पालक भगवान् ही हैं ? यदि ऐसा ही है तो भिन्न देशों एवं समान देशोंमें भी कालभेदसे विरुद्ध धर्मोंकी स्थापना क्यों की जाती है ? एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् भगवान्के प्रतिष्ठापित और पालित धर्मोंमें ऐसा विरोध और भिन्नता क्यों ? एक-एक धर्मके प्रतिष्ठापकोंने दूसरे धर्म-प्रतिष्ठापकोंका विरोध करके, यहाँतक कि दूसरे धर्मोंका नाशतक करके धर्मान्तरोंकी स्थापनाएँ की हैं। ऐसी स्थितिमें वे सभी धर्म हों या उनके प्रतिष्ठापक और पालक भगवान् हों— यह कैसे कहा जाय ? इस प्रश्नपर विचार करते हुए प्रथम यह देखना चाहिये कि गीताके श्लोकमें कौन-सा धर्म विवक्षित है। इसी निर्णयसे यह निर्णय भी हो जायगा कि साधु कौन और दुष्कृति (असाधु) कौन ? कारण भगवत्संस्थापित धर्ममें परिनिष्ठित ही साधु और उससे विमुख असाधु समझ लिये जायेंगे। इसमें सन्देह नहीं कि आजकल गीता और गीतोक्त धर्म-कर्मको सार्वभौम या व्यापक बनानेकी बुद्धिसे बहुत व्यापक अर्थ किया जाता है। यद्यपि गीताकी दृष्टिसे गीतोक्त धर्म-निर्णय करनेमें सरलता है। कारण गीताने ही यह निश्चय कर दिया है कि शास्त्रैकसमधिगम्य कर्म ही गीताको मान्य है तथापि आधुनिक विवेचकोंकी शास्त्रपर भी वही व्यापकताकी भावना है। उनका कहना है कि यदि केवल वेद ही शास्त्र हों और शास्त्रैकसमधिगम्य वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त कर्म ही धर्म हो, तब तो गीतामें संकीर्णता आ जाती है, जो गीता-जैसे सार्वभौम ग्रन्थके स्वरूपानुरूप नहीं है। इतने बड़े संसारमें छोटा-सा भारतवर्ष, वहाँके भी कुछ समूहोंमें ही वेद-शास्त्र और तदुक्त धर्मोंका आदर और प्रचार है। जब गीताका भी वही शास्त्र और धर्म है, तब तो वह एक देशकी ही वस्तु हो जाती है। फिर वह सार्वभौम एवं सर्वमान्य ग्रन्थ नहीं हो सकता। अतः भिन्न-भिन्न देश, कालकी परिस्थितिके अनुसार बुद्धिमान् विवेचकोंद्वारा निर्धारित किये गये कर्तव्याकर्तव्य- निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार, नैतिक, आर्थिक, वैयक्तिक, सामूहिक अभ्युदयके अनुकूल चेष्टा या हलचलें ही कर्म या धर्म हैं, या उन-उन देशों एवं कालोंके प्राणियोंके लौकिक- पारलौकिक कल्याणोंके लिये सर्वमान्यप्राय बुद्धिमान् महापुरुषोंद्वारा रचित कार्य-अकार्यके निर्णायक ग्रन्थ ही शास्त्र हैं। उन शास्त्रोंके अनुसार सब तरहके अभ्युदयानुकूल देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिके जो कर्म हैं, वे ही धर्म हैं। ऐसा माननेमें ही गीताकी सर्वमान्यता सुरक्षित रहती है। यद्यपि इन महानुभावोंकी दृष्टि तो अच्छी है, वे गीताको सार्वभौम बनाकर उसका उपकार ही करना चाहते हैं तथापि उसके सिद्धान्त और अभिप्रायको बाँधकर उसे सार्वभौम बनाना सम्भवतः उन्हें वाञ्छनीय न हो। स्वरूपकी रक्षा होते हुए ही उन्नति, उन्नति है। स्वरूपविनाशसे उन्नति, उन्नति कदापि नहीं कही जा सकती।
भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६५ धर्माधर्मके निर्णयमें बुद्धिबल नहीं, शास्त्र ही प्रमाण है बुद्धिमानोंको विदित है कि परिमित प्रज्ञा- क्रिया-शक्तिसम्पन्न मनुष्योंके लौकिक हिताहितका विवेचन कुछ अंशोंमें भले ही सम्भव हो, परंतु अलौकिक, पारलौकिक सुखों एवं सुख-साधनोंके विज्ञानकी ओरसे वे सर्वथा अन्धे ही हैं। अर्थ और कामविषयक उद्योगों और नीतियोंमें देशकाल-भेदसे निःसीम परिवर्तन सम्भव हो सकते हैं। अतः उन विषयोंमें नीति-निर्धारण करना मानवके लिये असम्भव नहीं है। परंतु सर्वज्ञकल्प प्रजापति, बृहस्पति, शुक्र, मनु आदि नीतिज्ञोंकी नीतिको आधार मानकर तदनुसार परिवर्तन या अनुवर्तन अधिक सुविधाजनक एवं निरुपप्लव होता है। किन-किन चेष्टाओंसे परलोकमें क्या दुःख और क्या सुख होगा, इसका परिज्ञान अल्पज्ञ जीवके लिये नितान्त असम्भव है। देश, काल, परिस्थितिके अनुसार धर्माधर्मका परिवर्तन निःसीम नहीं है। वस्तुतः अव्यवस्थित परिवर्तन नीतिमें भी असम्भव है, फिर धर्ममें तो वह कथमपि सम्भव ही नहीं है। कहीं भी लक्षणके अनुसार लक्ष्यका निर्णय हुआ करता है। प्रत्यक्ष विषयमें जहाँ लक्षण-निर्धारण करना होता है, वहाँ अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषोंसे रहित ही लक्षण हुआ करता है। परंतु जो लक्ष्य अप्रत्यक्ष है, उसका निर्णय लक्षणोंके ही अनुसार हुआ करता है। लक्षण (सूत्र) जहाँ नहीं घटता, वह लक्ष्य ही अशुद्ध समझा जाता है। परंतु आज प्राणियोंके आचरणके अनुसार धर्माधर्मका निर्णय किया जाने लगा है। आजकलके लोगोंमें वस्तुस्थितिकी अपेक्षाकर परिवर्तनके अनुवर्तन करनेका स्वभाव हो गया है। धर्मके लक्षणानुसार धर्मका निर्णय करना एक बात है, परिस्थिति और आचरण देखकर तदनुकूल धर्मकी परिभाषा बनाना दूसरी बात है। गीताकी दृष्टिमें यत्किंचित् हलचल या चेष्टा धर्म नहीं है। कारण, वह तो बिना विधान किये भी प्रकृति-सम्भव गुणोंकी प्रेरणासे स्वयं ही होगा। अतः 'कुरु कर्मैव' (गीता ४।१५) इत्यादि वाक्योंमें विहित कर्म वही है, जो रागप्राप्त नहीं है, किंतु शास्त्रसे ही जिनकी कर्तव्यता विदित होती है। इसीलिये कहा गया है कि कार्य-अकार्यकी व्यवस्थामें एक शास्त्र ही प्रमाण है। अतः शास्त्रविधानको जानकर ही कर्म करे—'ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥' (गीता १६।२४) यह शास्त्र भी अव्यवस्थित, समय-समयके समाजसे निर्धारित यत्किञ्चित् नियम नहीं है; क्योंकि समयानुसार कभी भौतिकवादियोंका ही समाज और दल विजयी एवं उन्नत हो सकता है, कभी अध्यात्मवादियोंका ही दल विस्तृत हो सकता है। बहुत-से व्यक्तियोंका ही समाज बन जाता है। व्यक्तियोंकी बुद्धियोंका कोई ठिकाना नहीं रहता, बड़े-से-बड़े व्यक्ति साधारण- से-साधारण विषयमें भ्रान्त हो जाते हैं। उस समय उन्हें यही दृढ़ निश्चय होता है कि हम जो कुछ भी समझ रहे हैं, वह बिलकुल सत्य है। परंतु कालान्तरमें उन्हें अपने भ्रम और प्रमादोंका स्वयं बोध होता है। रज, तमके प्रभावसे बुद्धिसत्त्व आच्छन्न रहता है। बिना परमात्मभाव व्यक्त हुए योगाभ्याससे भी वह अत्यन्त निरावरण नहीं होता। अतः अज्ञान, भ्रम आदि जीवोंके सामने किसी-न-किसी कक्षामें खड़े ही मिलते हैं। व्यक्तियोंके समूहोंमें—समाजमें भी यही दशा होती है। अतः धर्म-अधर्मके निर्णयमें व्यक्ति, समाज या बहुमतका कोई भी मूल्य नहीं है। नैतिक, आर्थिक अभ्युदयमें भी केवल व्यक्ति या समाजकी निर्धारित नीतिके सहारे सदा विजय नहीं हो सकती। अतः वहाँ भी मन्वादि सर्वज्ञोंके आर्थिक, नैतिक विज्ञानके अनुसार ही सफलता होती है। फिर धर्मके विषयमें तो कहना ही क्या है? चिकित्साके विषयमें एक विज्ञ चिकित्सकके सामने दूसरे विषयके लाखों विद्वानोंकी भी सम्मतिका कुछ भी मूल्य नहीं।
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५६६ भक्तिसुधा इसी तरह धर्मके विषयमें सर्वज्ञकल्प अनादि वेदशास्त्रको छोड़कर भिन्न-भिन्न सामाजिक निर्णयोंका कोई भी मूल्य नहीं। शास्त्रोंमें संशोधनकी कल्पना नितान्त अल्पज्ञता गीताके अनुसार वेदशास्त्र ही कार्य-अकार्य कर्मोंके निर्णायक शास्त्र हैं। गीतामें शास्त्रके नाते वेदोंका ही नाम आता है—‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः’ (गीता १५।१५), ‘ऋक्सामयजुरेव च’ (गीता ९।१७), ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ (गीता १०।२२) गीता और उसके उद्गम-स्थान महाभारतके श्रोता, वक्ता, प्रणेता और भिन्न-भिन्न प्रसंगोंमें वर्णित सभी महापुरुष वैदिक संस्कृति, सभ्यताके ही माननेवाले थे। अतः गीताके शास्त्र, वेद और वेदाविरुद्ध वेदानुयायी स्मृति, इतिहास, पुराण आदि ही हैं। इन शास्त्रोंके अविरुद्ध और इनके अनुसार वर्ण, आश्रमके लौकिक, वैदिक सभी गीतोक्त कर्म हैं। लौकिक कर्मोंमें भी जितने अंशमें शास्त्रैक- समधिगम्यता है, मुख्य रूपसे वही विधेय है। अन्यांश लोकप्राप्त होनेपर भी शास्त्राविरुद्ध होनेसे उनका गीता-धर्ममें संनिवेश है। ये शास्त्र और धर्म यद्यपि विश्वभरके ऐहिक-आमुष्मिक सर्वविध कल्याणके मूल हैं, अधिकारके अनुसार सभी लोग इनसे लाभ उठा सकते हैं तथापि यदि कालक्रमसे इनका ह्रास होनेके कारण कोई इन्हें संकीर्ण या संकुचित कहे तो यह उसीका दोष है। वस्तुस्थिति प्राणियोंके मानने-न-माननेकी परवाह नहीं करती। लोकपरिवर्तनके पीछे परिवर्तित होनेवाली वस्तु तात्त्विक नहीं होती। किसी भी संस्थाके नियमोंका अनुसरण उसके सदस्योंको करना पड़ता है। उच्छृंखलताके कारण जो सदस्य उसके नियमोंको न मानें तो वे सदस्य ही संस्थासे निकाल बाहर किये जाते हैं। उन उच्छृंखल व्यक्तियोंके कारण संस्थाके नियमोंमें परिवर्तन नहीं किया जाता। वैदिक धर्म एवं संस्कृतिके विधायक एवं संचालक वेदशास्त्रोंके नियमोंका जो लोग उल्लंघन करते गये, वे क्रमेण इससे बहिर्भूत होते गये। ये नियम परमेश्वरीय एवं दृढ़ भित्तिके आधारपर थे। अतः इनमें कुछ भी हेर-फेर न हुआ। जो लोग हेर- फेरकी कल्पना करते हैं, वे वैदिक शास्त्रोंकी विवेचन-पद्धति ही नहीं जानते; क्योंकि यहाँ तो सर्वज्ञ भगवान्के स्वाभाविक निःश्वाससम्भूत ऋक्, साम, यजुः, मन्त्र, ब्राह्मण, सूत्र, कल्प, इतिहास, पुराण सभीकी अनादिता मान्य है। सब देश, काल एवं परिस्थितियोंको सोच-समझकर सब तरहके परिवर्तन-अनुवर्तनका निर्णय पहलेसे ही स्थिर है। सत्यका पालन करनेवालोंकी संख्या यद्यपि बहुत कम है तथापि वह संकीर्ण धर्म नहीं कहा जा सकता। परम तत्त्वका साक्षात्कार यद्यपि करोड़ोंमें किसी एकको प्राप्त होता है, यहाँतक कि उसे चाहनेवाले भी अति स्वल्प हैं, तो भी वह परमावश्यक व्यापक ही धर्म है। इसी तरह वैदिक शास्त्र और धर्म यद्यपि व्यापक और सार्वभौम ही है तथापि कालक्रमसे लोगोंमें उच्छृंखलताके बढ़ जानेसे अधिक देश और लोग हमसे च्युत हो गये। इसमें स्थित रहनेवाले भारतमें भी थोड़े ही रह गये। भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है शास्त्रोंको देखनेसे विदित होता है कि स्वर्गादिके समान भूलोकमें भी बहुत-से खण्ड भोगभूमि ही थे, कर्मभूमि नहीं। अतः मानव-धर्म या साधारण अहिंसा, सत्य आदि धर्मोंकी ही वहाँ प्रतिष्ठापना की गयी। पहलेसे भी विशेष रूपसे भारत ही कर्मभूमि समझा जाता था। यहाँ ही वर्णधर्म, आश्रमधर्म, यज्ञ-योगादि सम्पूर्ण वैदिक धर्मोंका पूर्ण विकास था। यहाँ कर्म, उपासना, ज्ञानकी सिद्धि सरलतासे होती थी। शतक्रतु इन्द्र यहींके कर्मोंसे ऐन्द्र पदको प्राप्त करता है। इसीलिये
भारतमें ही अवतार क्यों ? ५६७ देवता भी भारतमें जन्म चाहते हैं। जैसे गृहके एक देशमें भी रहकर दीपक समस्त भवनको प्रकाशित करता है, शरीरके एक देश हृदयमें ही अन्तरात्माकी अभिव्यक्ति होती है, परंतु समस्त शरीरका प्रकाश और कार्य उसीसे होता है, वैसे ही भारतवर्ष समस्त भूमण्डलकी नाभि है। पुराणोंके अनुसार जम्बूद्वीप अन्य समस्त द्वीपोंका मध्य है। उसीमें मेरु है और उसीका सारांश भारतवर्ष है। अतः यही सबका हृदय है। जैसे व्यापक होते हुए भी आत्माका हृदयमें ही विशेष रूपसे प्राकट्य होता है, वैसे ही व्यापक धर्म और शास्त्र एवं उनके पालक भगवान्का भारतमें विशेष रूपसे प्राकट्य होता है। भारतके ही ज्ञानालोक और धर्मके प्रभावसे विश्व आलोकित और धार्मिक हुआ। मनु कहते हैं— एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ (मनुस्मृति २।२०) अर्थात् इस देशसे उत्पन्न हुए ब्राह्मणसे पृथ्वीपर सब मनुष्य अपना-अपना आचार सीखें। शरीरके हस्त-पादादि अन्यान्य अंगोंके शुष्क हो जानेपर भी जीवन रह सकता है, परंतु हृदयके शुष्क हो जानेपर फिर जीवन नहीं रह सकता। इस तरह समस्त देशोंके धर्म और ईश्वरसे च्युत हो जानेपर भी विश्व रह सकता है, परंतु उसके हृदय भारतके धर्मशून्य होनेपर विश्वका संहार निश्चित है। इसीलिये भारतके धर्म और शास्त्रसे विमुख होते ही विश्वके नाशकी सम्भावना होती है। जैसे सर्वांगकी अपेक्षा हृदय-रक्षाका ध्यान अधिक होता है, वैसे ही यहाँ धर्म और शास्त्रोंके रक्षार्थ भगवान्का प्राकट्य होता है। वैदिक धर्म एवं संस्कृतिसे च्युत भिन्न-भिन्न देशोंके लोग यद्यपि अग्निहोत्रादि त्रैवर्णिक कर्मके अधिकारी नहीं रह गये तथापि सामान्य-धर्म या मानव-धर्मके अधिकारी हैं। अतः इतिहास-पुराणादिके श्रवणद्वारा वैदिक धर्मसे उनका भी कल्याण हो ही सकता है, परंतु अनुकूलोंके लिये ही सदुपदेश सफल होता है, प्रतिकूलोंके प्रति किसीका कोई वश नहीं। जो वेद, शास्त्र और वैदिक धर्मसे द्वेष करते हैं, वे भारतीय ब्राह्मण ही क्यों न हों, उन्हें कौन समझा सकता है? सभी जीव भगवान्के अंश होनेसे उन्हें प्रिय हैं, वे कभी भी भगवान् और भगवदीयोंके उपेक्ष्य नहीं हैं। अतः उन देशों और समाजोंमें भी किसी-न-किसी रूपमें उनकी उच्छृंखलता वारणकर कुछ सत्पथपर लानेके लिये किसी-न-किसी विभूतिद्वारा किसी-न-किसी धर्मका वहाँ भी स्थापन और प्रसार किया जाता है। कुछ-न-कुछ नियमन या पाशविक भावोंका नियन्त्रण वहाँ भी होता ही है, परंतु वास्तविक धर्म और उसके बोधक शास्त्रका भी संरक्षण कहीं-न-कहीं होना ही चाहिये। इसलिये विश्व-हृदय भारतवर्षमें सदा ही वेदादि शास्त्रोंकी रक्षा और तदुक्त धर्मोंकी रक्षाके लिये भगवान्का प्रादुर्भाव होता है। अन्यान्य देशोंमें भी कहा जाता है कि कहीं परमेश्वरके 'दूत' या 'पुत्र' का प्रादुर्भाव होता है, परंतु भारतमें तो स्वयं भगवान्का ही प्रादुर्भाव होता है। वहाँ वैदिक धर्मकी रक्षा और प्रकाशसे समस्त विश्वका प्रकाश और उसकी रक्षा हो सकती है। शरीरके सभी स्थानोंमें आत्माका प्रकाश नहीं होता, इससे आत्माकी संकीर्णताकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसी तरह भारतमें ही वैदिक धर्म और शास्त्रोंकी रक्षाके लिये यहाँ ही भगवान्का प्रादुर्भाव हो, इससे उनके शास्त्र और धर्ममें संकीर्णता नहीं कही जा सकती। योग्यता और अधिकारके व्यक्त होनेपर प्राणिमात्रका परम कल्याण वैदिक धर्मसे ही हो सकता है। इन्हीं सब भावोंको ध्यानमें रखनेसे यह समझमें आता है कि भगवान् भारतमें ही क्यों अवतार लेते हैं।
५६८ | भक्तिसुधा
अवतारमीमांसा
अवतारके सम्बन्धमें आजकल बहुत-सी शंकाएँ उठायी जाती हैं। कहा जाता है कि 'यदि किसी एक विशिष्ट आकारको भगवान्का नित्य स्वरूप माना जाय, तो उस आकारको निर्विकार मानना होगा, परंतु किसी साकारको नित्य कहना दुर्घट ही है, अतः व्यावहारिक जगत्में विभिन्न दैहिक आकारोंमें भगवान्का अवतार असमंजस है। यह धारणा कैसे कर सकते हैं कि भगवान् उनके स्वभावगत नित्य, अच्युत- स्वरूपका कभी-कभी परित्याग करते हैं? जन्म- मृत्युके अधीन नये-नये आकारोंको ग्रहण किया करते हैं? सर्वशक्तिमत्ताके आधारपर भी ऐसी कल्पना नहीं हो सकती। अवतारोंके आकार परस्पर भिन्न और अपक्षयादिसे युक्त पाये जाते हैं, अतः अपने नित्य रूपके साथ ही भगवान्का जगत्में अवतरण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता।' परंतु विचार करनेपर उपर्युक्त बातें बेतुकी प्रतीत होती हैं। सर्वशक्तिमान् भगवान् एक रूप या अनेक रूपसे भिन्न-भिन्न कालमें या एक कालमें प्रवृत्त हो सकते हैं। उनके आविर्भाव-तिरोभावको ही अज्ञलोग उत्पत्ति और नाश मान बैठते हैं। भगवान्के शरीरमें किसी भी तरहका विकार नहीं माना जा सकता। जैसे मायावीके अंगमें मायासे अनेक विकारोंका स्फुरण हो सकता है, वैसे ही भगवान्में भी कल्पना की जा सकती है। भगवान्का स्वाभाविक पारमार्थिक स्वरूप निराकार, निर्विकार है। फिर भी भगवान् अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय महाशक्तिके आधार होनेसे सगुण और कारण हैं। उसी शक्तिके योगसे भगवान् सगुण, साकार, एकरूप, अनेकरूपमें प्रतीत होते हैं। यही बात 'अजायमानो बहुधा विजायते।' (यजु० ३१।१९), 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (बृहदा० २।५।१९) (परमात्मा अज होकर भी अनेक रूपसे जायमान होता है, इन्द्र—परमात्मा मायासे अनेक रूप होकर प्रतीत होता है) इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध है। कहा जाता है कि 'निराकार परमात्मा साकार किस प्रकार बनता है ? वह शरीरी जीवरूपसे स्वयं परिणामको प्राप्त होता है या विशिष्ट मानस भौतिक देहकी सृष्टि करता है और उसमें आत्मरूपसे प्रवेश करता है, किंवा अपनी विशेष शक्ति और ज्ञानको किसी विशेष शरीरधारीके जीवनमें अभिव्यक्त करता है, जिससे कि वह उसके साथ तादात्म्यापन्न होकर कार्य करता है ? इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि देशकालातीत, समस्त विकार और सीमासे रहित, पूर्ण आध्यात्मिक पुरुष किस प्रकार स्वयं देशकाल-सीमायुक्त और विभिन्न विकाराधीन किसी शरीरविशेषमें परिणामको प्राप्त होता है ? यदि निराकारता आकाररूपसे परिणामको प्राप्त हो सके और भगवत्ता भी सुरक्षित रहे, तो निराकारताको भगवत्स्वरूपके प्रति नित्य और स्वरूपगत रूपसे नहीं माना जा सकता। फिर तो उसके स्वरूपका प्रकार कोई अनित्य और विकारी ही होगा। अनन्त होकर भी अन्तवाले रूपमें परिणामको प्राप्त हो सकता है। नित्यस्वरूप अचिरकालस्थायी पुरुषरूपमें जन्म ग्रहण कर सकता है और साथ ही अपने नित्यस्वरूपको भी अक्षुण्ण बनाये रख सकता है। पूर्ण पुरुष अपूर्ण पुरुषका जीवनयापन कर सकता है, फिर भी अपने पूर्ण स्वरूपमें ही स्थिर रह सकता है। ऐसी धारणाएँ स्पष्ट विरुद्ध हैं।' इसपर कहना यही है कि परमेश्वरका पारमार्थिक रूप अज, अव्यक्त, अनन्त, अनाकार, पूर्ण होनेपर भी अनिर्वचनीय मायासे उसमें साकारता, अपूर्णताकी प्रतीति होती है। वस्तुतः वे अपने पारमार्थिक रूपमें सर्वदा ही प्रतिष्ठित रहते हैं। यह नियम है कि समान सत्तावाले भाव-अभावका ही विरोध होता है, विषम सत्तावाले भाव-अभावका विरोध नहीं होता। अतः पारमार्थिक एवं व्यावहारिक सत्ताके भेदसे साकारता- निराकारता, अनन्तता और एकदेशिताका सामंजस्य
अवतारमीमांसा [५६९]
हो सकता है। इसके अतिरिक्त जैसे नैयायिक, वैशेषिकोंके यहाँ देहदृष्टिसे साकारता होनेपर भी आत्माओंकी व्यापकता है, वैसे ही यह भी व्यवस्था बैठ सकती है। आत्मा व्यापक माना जाय तो अणु माना जाय तो हर दृष्टिसे निराकार ही है। फिर भी जैसे उसका साकार देह बन सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वरमें भी साकारता आदि बन सकती है। फिर भी जैसे अपने रूपसे आत्माका परिणाम नहीं मानना पड़ता, वैसे ही ईश्वरका भी परिणाम नहीं मानना पड़ेगा। भेद यही है कि जीवात्मा कर्मोंके परतन्त्र होकर उसमें अभिमानी होकर फँसता है और परमेश्वर लोकानुग्रहार्थ दिव्य देह ग्रहण करके कार्य करता है, फिर भी अपने निराकार स्वरूपमें सर्वदा प्रतिष्ठित रहता है। अपरिच्छिन्नमें परिच्छिन्नता आदि भी मायाको लेकर बन सकती है, परंतु स्वरूपच्युति न होगी, यही उसकी विशेषता है। भगवान्का पूर्णावतार या अंशावतार कहा जाता है कि 'भगवान् प्रत्येक विशेष अवतारमें स्वयं सम्पूर्ण रूपसे परिणामको प्राप्त होते हैं या आंशिक रूपसे? यदि प्रथम कल्प मान्य है, तब तो यह भी मानना पड़ेगा कि एक अवतार जबतक जीवित रहता है, तबतक निराकार भगवान् नहीं रहता और भगवान् जगत्के एक विशेष स्थलमें आबद्ध रहता है। ऐसा होनेपर यद्यपि अवतरित भगवान्का ज्ञान और शक्ति आन्तरिक रूपसे अनन्त और जगत्प्रपंचके शासन और रक्षणमें समर्थ मानी जाती है तथापि उसका अस्तित्व व्यापकरूपसे नहीं माना जा सकता और वह जगत्में ओतप्रोत भी नहीं माना जा सकता। उसका जगत्के साथ सम्बन्ध भी बाह्य रूपसे मानना होगा। फलतः यह सिद्धान्त कि 'भगवान् जगत्का उपादानकारण है' इस मन्तव्यसे मेल न खायेगा। विशेष रूपसे अवतरित भगवान्का जब तिरोभाव होगा, तब निराकारका पुनः जन्म मानना होगा। फिर निराकारका भी जन्म-मरण मानना होगा, इत्यादि।' परंतु यह विचार भी बालकोंकी ही बुद्धिमें भ्रम पैदा करनेमें समर्थ है; क्योंकि भगवान्का परिणाम न माननेसे उपर्युक्त वक्तव्य ही निराधार हो जाता है। कूटस्थ भगवान् अखण्ड, अनन्त, पूर्ण रूपसे सदा विराजमान रहकर ही दिव्य मायाशक्तिसे दिव्य देह ग्रहण कर लेते हैं। यह भी कहा जाता है कि 'यदि आंशिक रूपसे भगवान् परिणामको प्राप्त होते हैं, तो उसके एक अंशको निराकार और दूसरे अंशको परिणामी मानना पड़ेगा, जो कि स्पष्ट ही विरुद्ध है। परमात्मा निराकार, साथ ही अंशयुक्त और अंशमें विभागके योग्य नहीं माना जा सकता। यदि ऐसी धारणा सम्भव हो तो किसी अंशमें कोई परिणाम होनेपर आत्मा विकारको प्राप्त होगा और इससे वह एक विकारी, अस्थायी और व्यावहारिक पुरुष होगा। यदि इस आपत्तिका त्याग भी करें तो प्रश्न उपस्थित होगा कि अवतार-शरीरमें परिणत भगवद्-अंश, पूर्ण भागवतचेतनासे सम्पन्न है अथवा यह चेतना विशेषित या सीमायुक्त होती है? अवतार क्या स्वयं भगवान्के समान अनन्त ज्ञान और शक्तिको धारण करता है या भगवान्के अंशसे परिणामको प्राप्त (आकारवान्) होनेके कारण उसका ज्ञान और शक्ति अन्तयुक्त होती है? यह स्पष्ट है कि आंशिक अवतार स्वयं भगवान्के समान सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि अंश और सम्पूर्णमें पृथक्ताका लोप होगा अथवा एक ही कालमें दो प्रतिद्वन्द्वी भगवान् होंगे—एक रूपयुक्त और अपर रूपरहित। भगवान्की आंशिक अभिव्यक्तिकी धारणा उनकी शक्ति और ज्ञानकी आंशिक अभिव्यक्तिको बोधित करती है। ऐसा होनेपर यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि अज्ञानका आवरण अवतारी चेतनके ऊपर विद्यमान है तथा उसका ज्ञान और शक्ति, चाहे उसके समकालीन व्यक्तियोंकी तुलनामें कैसा भी उच्च
५७० | भक्तिसुधा
क्यों न हो, सीमायुक्त है तथा उसकी सम्पूर्ण रूपसे अभिव्यक्ति नहीं है। तब व्यावहारिक जगत्के असाधारणसामर्थ्ययुक्त किसी मनुष्य और अवताररूपसे मान्य व्यक्तिमें वस्तुगत भेद क्या रह गया ? सब मनुष्य या प्राणी उस भगवान्की आंशिक अभिव्यक्ति हैं, जो सब व्यावहारिक पदार्थोंका एकमात्र आश्रय, कारण और द्रव्य माना जाता है।' परंतु यह कथन भी सारशून्य है। निराकार, निर्विकार चेतनमें यद्यपि अंशांशिभाव नहीं है तथापि मायारूप उपाधिके भेदसे अंशांशिभाव बन जाता है, अतएव अंशावतार, पूर्णावतार आदि व्यवहार होता है। जहाँ सम्पूर्ण भगवत्ता प्रकट होती है, वहाँ पूर्णावतारका व्यवहार होता है, जहाँ अंशतः भगवत्ताका प्राकट्य होता है, वहाँ अंशावतारका व्यवहार होता है। निराकार चेतनतत्त्व अंशतः या सम्पूर्णतः किसी प्रकार परिणामको प्राप्त नहीं होता, अतः परिणाम-पक्षके सभी दूषणोंका अवकाश ही नहीं है। लोककल्याणार्थ भगवदिच्छासे अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिके द्वारा दिव्य शरीरका निर्माण होता है। उसीमें अपरिणामी परमेश्वर प्रतिष्ठित होकर विविध लीलाओंका अनुसरण करते हैं। जिन अवतारोंमें सीमायुक्त चेतनाका विकास अभीष्ट है, वहाँ सीमित और जहाँ निःसीम चेतनाकी अभिव्यक्ति अभीष्ट है, वहाँ निःसीम चेतनाका आविर्भाव होता है। भगवदिच्छा ही इस भेदकी नियामिका है। सम्पूर्ण रूपसे भी अवतारोंमें ज्ञान-क्रिया-शक्तिका विकास होनेमें कोई आपत्ति नहीं है। अतएव भगवान्के अवतारोंमें प्रतिद्वन्द्विताकी कल्पना केवल अनभिज्ञता ही है। जब योगी अनेक शरीरोंका निर्माण करके उनसे व्यवहार कर सकता है और सर्वत्र अभिमानी एक होनेसे प्रतिद्वन्द्विताको अवकाश नहीं रहता, वैसे ही जब एक ही ईश्वर अनेक अवतारोंमें प्रकट होता है, तब प्रतिद्वन्द्विताको अवकाश ही कहाँ है ? रूपरहित तत्त्व ही विशिष्ट शक्तिके योगसे रूपवान् होता है। विशेषतः अवतार पूर्ण ही होते हैं। जहाँ जैसे कार्यकी आवश्यकता होती है, वहाँ वैसी ही शक्तियोंका प्राकट्य होता है। राम, कृष्णके अवतारमें सभी शक्तियोंका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। अंशावतारोंमें भी जीवोंकी अपेक्षा विलक्षणता होती है। जीवोंकी मलिनसत्त्वप्रधाना अविद्या उपाधि होती है, ईश्वरकी विशुद्धसत्त्वप्रधाना माया उपाधि होती है। यद्यपि जड़- चेतन सभी रूपमें एक ईश्वरकी ही अभिव्यक्ति होती है तथापि अवतारोंमें उन सबसे विशेषता इसीलिये होती है। तमःप्रधाना प्रकृतिसे परमेश्वर जड़ जगत्का कारण बनता है, अविशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृतिके द्वारा जीवोंका कारण होता है और विशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृतिके द्वारा अवतार ग्रहण करता है। जीवोंमें वह बात नहीं होती, जो ईश्वरके अवतारोंमें होती है। जो सृष्टिको विचित्र बतलाकर उसमें अवतारोंके सदृश अनेक जीवोंका होना सिद्ध करना चाहते हैं, उनको इस ओर भी ध्यान देना चाहिये कि जब सृष्टि- वैचित्र्यसे ही, बिना प्रमाणके भी, अन्धश्रद्धासे अवतारोंके सदृश अन्य जीवोंका होना मान लिया जाता है, तब शास्त्रप्रमाणसे अवतारोंके सदृश अन्योंका न होना ही क्यों नहीं मान लिया जाता ? फिर सृष्टिवैचित्र्यसे ही ईश्वरके समान ही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् अन्य जीव भी क्यों न मान लिये जायें ? जब ईश्वर अनेक नहीं हो सकते, तब अवतारोंके समान जीवदेह नहीं हो सकते, यह भी मान्य ही होना चाहिये। अवतार-देह दिव्य होते हैं, उनमें जरा-मरणादि नहीं होते, वे केवल भगवदिच्छासे आविर्भूत और तिरोभूत होते रहते हैं। अवतारदेह और जीवदेहका पार्थक्य कहा जाता है कि 'भगवान् एक विशेष मानस भौतिक देहकी सृष्टि करते हैं और आत्मरूपसे इसमें प्रवेश करते हैं। जब सभी मानस भौतिक देह भगवान्की ही सृष्टि है, तब फिर इस कथनका क्या अर्थ है कि अवतार-देह एक विशेषरूपसे सृष्ट देह
है ? क्या यह अपर देह जिस नियम और पद्धतिसे उत्पादित होते हैं, उसके अनुसार उत्पन्न नहीं हुआ ? यह क्या विशेष काल और देशमें माता-पिताजनित व्यावहारिक देह नहीं है ? यह क्या अपर देहके समान वृद्ध होकर तथा नाना विकारको प्राप्त होकर मृत्युग्रस्त नहीं होता ? फिर कैसे हमलोग अवतारदेह और किसी अपर जीवित देहमें कोई भेद कर सकते हैं?' इसका उत्तर यह दिया जाता है कि अवतारदेहमें जितने विशेष लक्षण रहते हैं, उतने अपर किसी साधारण रीतिसे उत्पन्न जीवित देहमें नहीं पाये जाते। कदाचित् यह सत्य हो, किंतु फिर भी यह सिद्धान्त नहीं किया जा सकता कि ऐसा विशेषलक्षणयुक्त देह, पूर्ण भगवदात्माद्वारा अधिष्ठित होनेके उद्देश्यसे विशेषरूपसे सृष्ट हुआ है। इस वैचित्र्यमय विश्व जगत्में विशेष- लक्षणसहित असंख्य प्रकारके जीवके देह पाये जाते हैं। एक मनुष्यजातिमें ही विभिन्न जातिके पुरुष, विभिन्न प्रकारके भेदसहित स्वस्वजातीय लक्षणयुक्त होते हैं और एक ही जातिके अन्तर्भूत अनेक व्यक्तियोंमें भी परस्पर अत्यन्त भेद पाया जाता है। परंतु यह कथन ठीक नहीं है। भगवान्के शरीरोंमें साधारण शरीरोंसे विशेषता है ही। साधारण शरीर भौतिक होते हैं, परंतु भगवान्का शरीर मायासे (मायोपहितचैतन्यसे) बनता है। जैसे शैत्यके योगसे जल ही घनीभूत हो जाता है, वैसे ही मायाके योगसे निराकार भगवान् साकार होते हैं, किंवा जैसे घृतवर्तिका आदिके योगसे निराकार अग्नि दाहकत्व- प्रकाशकत्वविशिष्ट आकार ग्रहण कर लेता है, वैसे ही अचिन्त्य, अनिर्वाच्य दिव्य शक्तिके योगसे आत्मा सगुणविग्रह धारण कर सकता है। यद्यपि उपर्युक्त दृष्टान्तोंमें कथंचित् परिणाम तथा विकारकी कल्पना की जा सकती है तथापि निर्विकार चेतनमें विकारकी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि वह अनिर्वचनीय मायाके योगसे अविकृत रहकर ही अनेक कार्योंका उत्पादन कर सकता है। जैसे चिन्तामणि, कल्पवृक्ष, कामधेनुको भिन्न-भिन्न अभिलाषकोंको अभिलषित अनेक पदार्थोंके सम्पादनमें विकृत होनेकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही परमात्माको भी प्रपंचोत्पादनमें विकृत होनेकी अपेक्षा नहीं है। अतएव 'सम्पूर्ण रूपसे परिणाम हुआ या एकदेशसे' इत्यादि विकल्प भी निरर्थक ही हैं। 'निराकार साकार नहीं बन सकता' यह शंका भी व्यर्थ ही है। जैसे निर्गन्ध जल गन्धवती पृथ्वीके रूपमें बनता है, जैसे नीरस तेज सरस जल और नीरूप वायु रूपवान् तेजके रूपमें बनता है, वैसे ही निराकार तत्त्व साकाररूपमें और निर्गुण सगुण- रूपमें व्यक्त हो सकता है। जैसे स्पर्शविहीन आकाश स्पर्शवान् वायुके रूपमें प्रकट होकर भी अपने आकाशरूपमें बना रहता है, वैसे ही अनेक रूपोंमें प्रकट होकर भी परमात्मा अपने निर्गुण-निराकार रूपमें बना ही रहता है। अनेक रूपमें प्रकट होकर भी परमात्मा अपने निर्गुण-निराकार रूपमें बना ही रहता है, इसीलिये भगवान् क्रीड़ाके लिये अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे दिव्य देहका निर्माण करते हैं। वह देह सोपाधिक चेतनका कार्य होनेपर भी प्राकृतिक कार्योंसे विलक्षण होता है। जैसे सूर्य मेघसे आवृत हो जाता है, परंतु नेत्र और सूर्यके मध्यमें दूरवीक्षण यन्त्र होनेसे वह उसका आवरण नहीं होता, वैसे ही तामसी या अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृतिसे चैतन्य आवृत हो जाता है, परंतु विशुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृति, माया या दिव्य शक्तिसे निरावरण ही रहता है। अतः तामस, राजस देहोंकी अपेक्षा विशुद्ध सत्त्वमय शरीरोंमें विशेषता रहती ही है। इस दृष्टिसे देहवान् होकर भी भगवान् भगवान् ही रहते हैं। अतएव वे जगदतीत हैं ही। जब अनित्य दिव्य लीलाक्तिके योगसे भगवान्का अवतार बन सकता है, तब उनके द्वारा वेदोंका उच्चारण हो सकता है और इसीलिये शास्त्रप्रमाणसे कलावतार, अंशावतारकी भी
उपपत्ति हो जाती है। जो क्रिया-ज्ञान-शक्तियाँ साधारण जीवोंमें सम्भव नहीं, उनकी स्थिति जहाँ-कहीं देखी जाती हो और साथ ही आर्ष ग्रन्थोंमें जिसका प्रमाण हो, वहीं अवतारका व्यवहार होता है। कहा जाता है कि 'ईश्वरका शरीर-धारण सम्भावित न हो सकनेसे ईश्वरने शरीर धारणकर वेदकी रचना की है, सो भी मान्य नहीं हो सकता। वेद निराकार ईश्वररचित है, इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है। अतएव वैदिक सम्प्रदायोंका यह सिद्धान्त कि वेद ईश्वररचित हैं, केवल कल्पनामात्र है। निराकार भगवान् किसी व्यक्तिविशेषको शास्त्ररचना करनेमें प्रेरणा करते हैं, यह पक्ष भी विचार-सह नहीं है; क्योंकि इस पक्षका निर्णय हमलोगोंको अनुमानके द्वारा करना पड़ेगा और अनुमान, हेतु और साध्यका नियत-साहचर्य दर्शन-मूलक होता है, अतएव वह (अनुमान) दृष्ट साधर्म्यकी अवश्य अपेक्षा करेगा। सुतरां ज्ञात पदार्थका विधर्मी या विरोधी किसी पदार्थका अस्तित्व अनुमानद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता, अतएव दृष्टान्तकी सहायताके बिना अनुमान किसी अतीन्द्रिय पदार्थको प्रमाणित नहीं कर सकता। प्रकृत स्थलमें निराकार ईश्वर किसीको प्रेरणा करता है, यह प्रमाणित करनेके लिये हमलोगोंको अपने साधारण अनुभवकी सीमाके भीतर अनुभूत किसी दृष्टान्तका निर्देश करना आवश्यक है, जहाँ निराकार पुरुष किसी अन्य पुरुष-विशेषको प्रेरणा करता हो, परंतु ऐसा कोई दृष्टान्त पाया नहीं जाता। सुतरां, निराकार भगवान् किसीको शास्त्रकी रचनामें प्रेरणा करता या शिक्षा देता या शिक्षा देनेके लिये कहीं किसीको भेजता है, यह विचार- विहीन स्वकपोलकल्पना है। ईश्वरका शरीरधारण सम्भव न होनेसे यह स्वयं शरीर धारणकर स्वयं शिक्षा नहीं दे सकता।' इस उपर्युक्त कथनमें भी कोई सार नहीं है; क्योंकि वैदिकोंके मतोंमें निराकार अन्तर्यामी ही सभी भावोंका प्रेरक है। जब साकार देहका भी प्रेरक निराकार ही है, तब केवल साकारमें प्रेरकता कहाँसे आयेगी? जिस तरह श्रवण-दर्शनादि क्रियाद्वारा अतीन्द्रिय इन्द्रियोंका अनुमान होता है तथा जगत्का कर्ता सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्रूपसे अदृष्ट होनेपर भी अनुमेय होता है, वैसे ही निराकारमें प्रेरकता भी सिद्ध है। निराकार ही मन-देहादिका प्रेरक है। निराकार इच्छाकी भी प्रवर्तकता सिद्ध है, अतः ईश्वरकी प्रेरणासे वेदादिकोंका भान होनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है। ऋषियोंसे भी मन्त्रोंका दर्शन हो सकता है। यद्यपि साधारण जीवोंमें विशिष्टज्ञान सम्भव नहीं है तथापि तपस्या और उपासनाओं एवं योगोंकी महिमासे रज और तमका प्रभाव मिट जानेसे स्वभावसे ही सर्वार्थावभासनशाली चित्तमें मन्त्रोंका दर्शन हो सकता है। जैसे दूरवीक्षण, अणुवीक्षण आदि यन्त्रोंकी सहायतासे दूरस्थ और सूक्ष्मतत्त्वोंका ग्रहण हो सकता है, किंवा रेडियोके द्वारा दूर-से-दूरके शब्दोंका ग्रहण बन सकता है, वैसे ही योगकी महिमासे किसी रूपमें, कहीं भी विद्यमान शब्दोंका ग्रहण किया जा सकता है। भावनाकी महिमासे मनमें विशिष्ट शक्तिका आविर्भाव होता है। सामान्य मन-इन्द्रियोंकी सहायतासे ही बाह्य अर्थका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ईश्वरको इन्द्रिय बिना ही बाह्य-अभ्यन्तर, सभी अर्थ प्रकाशित होते हैं, वैसे ही भावना और एकाग्रताकी सहायतासे मनको विशिष्ट ज्ञानमें सामर्थ्य प्राप्त होता है। फिर ऋषियोंको तो 'सुप्तप्रतिबुद्धन्याय' से पूर्वजन्मके अधीत मन्त्रोंका भी दर्शन हो सकता है। इन सब दृष्टियोंसे विचार करनेपर विदित होगा कि निर्गुण, निराकार परमेश्वर सगुण, साकार राम- कृष्ण आदिके रूपमें अवतार-ग्रहण करते हैं और अधर्माभ्युत्थान मिटाकर सन्मार्गस्थ सत्पुरुषोंका रक्षण करते हुए वेदशास्त्रोक्त धर्मका संस्थापन करते हैं।
बुद्धावतारका प्रयोजन ५७३
बुद्धावतारका प्रयोजन
कुछ लोगोंके प्रश्न होते हैं कि ‘बौद्धमतप्रवर्तक बुद्धदेव भगवान्के नवें अवतार माने जाते हैं, हर एक संकल्पके देश-कालसंकीर्तनमें ‘बौद्धावतारे’ पढ़ा जाता है, फिर उनसे प्रतिष्ठापित धर्म अधर्म कैसे हो सकता है?’ कुछ लोग यह भी कहने लगते हैं कि ‘बुद्धने वेदों और वैदिक धर्मका खण्डन नहीं किया, किंतु वैदिक धर्ममें फैले हुए पाखण्डोंका खण्डन किया है। आगे चलकर बौद्ध धर्ममें अनाचार फैल जानेसे भगवान्ने ही श्रीशंकराचार्यरूपसे अवतीर्ण होकर उसे दूर किया।’ इसपर वैदिकोंका कहना है कि अवश्य ही बुद्ध भगवान्के अवतार थे, परंतु जिन पुराणोंमें बुद्धावतारका वर्णन है, वहीं उसका प्रयोजन भी कहा गया है। यह ठीक है कि गीताके कथनानुसार भगवान्का अवतार धर्मग्लानि एवं अधर्माभ्युत्थानको मिटाने और धर्मसंस्थापनके लिये ही होता है। इसी दृष्टिसे बुद्धावतारका भी यह प्रयोजन अवश्य होना चाहिये। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि जैसे वैदिक धर्ममें अधिकारियोंकी प्रवृत्ति न होना दोष है, वैसे ही अनधिकारियोंकी प्रवृत्ति होना भी दूषण ही है और जैसे अधिकारियोंको कर्मोंमें प्रवृत्त करना आवश्यक है, वैसे ही अनधिकारियोंकी निवृत्ति भी आवश्यक है। ये दोनों ही कर्म दुष्कर हैं। आज जो पुराणश्रवण और मन्दिरशिखरदर्शनसे ही कृतकृत्य हो सकते हैं, वे ही नव्य लोगोंके बहकानेमें आकर शास्त्रमर्यादाके विपरीत वेदाध्ययन तथा मन्दिर-प्रवेश चाहते हैं और हितैषियोंके समझानेसे भी नहीं मानते हैं। किसी समय ठीक ऐसी ही स्थिति हो गयी थी। वेदाध्ययन तथा तदुक्त अग्निहोत्रादि कर्मके अनधिकारी देवताओंके अभिनव करनेकी दृष्टिसे इन कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये और यज्ञ-व्याजसे पशुवध तथा सुरापानका विस्तार करने लगे। शास्त्रोंमें यज्ञके अंगरूपसे यद्यपि पशुवध अनुमोदित है तथापि यज्ञ-व्याजसे उदर-पोषणार्थ पशुवध पाप ही है। इस तरह धर्मकी ओटमें अधर्मका प्रचार होने लगा। उस समय किसीके समझाने- बुझानेसे भी उनकी उन कर्मोंसे निवृत्ति असम्भव थी। ऐसी स्थितिमें उन्हें उन कर्मोंसे निवृत्त करनेके लिये भगवान्को उनके श्रद्धेय बनकर प्रकट होनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई। बस, इसीलिये बुद्धावतार हुआ। बुद्धदेव महाविरक्त और सिद्ध थे। उन्होंने अपने चमत्कारोंसे उन असुरस्वभाववालोंके मनोंको मोहित कर लिया, फिर वेदों और वेदोक्त धर्मोंसे उनकी अश्रद्धा उत्पन्न कर दी। जब बुद्धदेवमें ऐसे लोगोंकी पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न हो गयी, तब उन्होंने जो कुछ भी कहा, उसपर उन लोगोंने पूर्ण विश्वास किया। बस, वे भी वेद और वेदोक्त धर्मकी निन्दा करने लगे। जो किसीके समझानेसे भी असम्भव था, वह सरल हो गया। इस कार्यके सम्पन्न हो जानेपर बुद्धदेवने उस रूपसे फिर दूसरी बात कहना अनुचित समझा। बादमें जब बुद्धके चमत्कारके प्रभावसे धर्माधिकारियोंको भी अपने धर्मसे अश्रद्धा होने लगी, तब फिर भगवान्को अवतार-ग्रहणकी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः वेद एवं तदुक्त धर्मोंमें श्रद्धा स्थिर करनेके लिये भगवान् फिर शंकराचार्यरूपमें प्रकट हुए और बौद्धमत-खण्डन करके वैदिक धर्मकी स्थापना की। इस तरह दोनों ही अवतारोंकी सार्थकता हो जाती है। वैदिकगण जैसे भगवान्को अनादि मानते हैं, वैसे ही वेदोंको भी। अतएव ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ के आधारपर वेदनिन्दकको ही नास्तिक कहा जाता है। तुलसीदासजीने भी कहा है— कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥ अतएव आस्तिक लोग भगवान्से भी अधिक सम्मान वेदोंका करते हैं। नैयायिक आदि परमेश्वर- निर्मित होनेसे वेदोंका प्रामाण्य मानते हैं, परंतु वेदान्तियोंका कहना है कि यदि परमेश्वरनिर्मित होनेसे वेदोंका
प्रामाण्य है तो यह कहना होगा कि परमेश्वरमें क्या प्रमाण है ? यदि वेदको प्रमाण कहें, तब तो 'अन्योन्या- श्रयदोष' अवश्य होगा अर्थात् वेदके आधारपर ईश्वरसिद्धि और ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदप्रामाण्यसिद्धि। कहा जा सकता है कि 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्' इत्यादि अनुमानोंसे परमेश्वरकी सिद्धि होगी और ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदोंका प्रामाण्य सिद्ध होगा। पर यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुमानसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होती है, ईश्वरविशेषकी नहीं, जैसे धूमसे वह्निसामान्यकी ही सिद्धि होती है, वह्विविशेषकी नहीं। अनुमानसिद्ध परमेश्वर 'वेदकार' है या 'बौद्धागमकार', 'बाइबिलकार' है या 'कुरानकार' यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह कौन परमेश्वर है, यह सिद्ध नहीं होता। जिन-जिन युक्तियोंसे नैयायिक, वैशेषिक 'वेदकार' को परमेश्वर सिद्ध करेंगे, उन्हीं युक्तियोंसे 'बाइबिल' आदिके अनुयायी
निराकारसे साकार [५७५]
गौका दुग्ध होनेसे आदर करते हैं, न कि सर्वज्ञ परमेश्वरकी उक्ति होनेसे— 'सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।' यहाँ विज्ञगण भगवान्की सर्वज्ञताका उपयोग अकृत्रिम वेदका सिद्धान्त निर्णय करनेमें करते हैं। सर्वज्ञनिर्मित भी ग्रन्थ कृत्रिम होनेसे वैसा आदरणीय नहीं होता, जैसा कि अकृत्रिम अपौरुषेय वेद। अतएव आस्तिकगण बुद्धकी पूजा करते हुए भी वेदविरुद्ध होनेसे उनकी उक्तिका आदर नहीं करते। श्रीकृष्णकी उक्तिका वेदसम्मत होनेसे आदर करते हैं। एक बार भीष्मजी अपने पिताका श्राद्ध कर रहे थे, उस समय उनके पिताका दिव्य हस्त प्रकट हुआ। भीष्मने उसे पहचाना और वैदिकोंसे प्रश्न किया कि 'क्या हस्तपर पिण्डदान करनेकी विधि है?' वैदिकोंने कहा—'नहीं, वेदी और कुशाओंपर ही पिण्ड-प्रदानकी विधि है।' तब भीष्मने हस्तपर पिण्ड न देकर कुशाओंपर ही पिण्डदान किया। भीष्मके पिता बड़े प्रसन्न हुए और कहा कि 'मैं तुम्हारी शास्त्रश्रद्धा देखनेके लिये ही प्रकट हुआ था।' इस दृष्टिसे वेद ही मुख्य शास्त्र है, तदुक्त कर्म ही मुख्य धर्म है, उनकी मर्यादा-रक्षार्थ ही बुद्धदेव एवं शंकराचार्यका अवतार हुआ। वैदिक धर्मसे यद्यपि प्राणिमात्रका कल्याण हो सकता है, परंतु अधिकारके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य— त्रैवर्णिक उपनयनादि संस्कारसम्पन्न होकर वेदाध्ययनके अधिकारी हैं। शेष, अन्त्यज आदि वेदोपबृंहणरूप इतिहास-पुराण-श्रवणके अधिकारी हैं। राजसूयमें क्षत्रियका अधिकार है, ब्राह्मणका नहीं और वाजपेयमें ब्राह्मणका ही अधिकार है, क्षत्रियादिका नहीं। जैसे वैद्यके औषधालयकी सभी औषधें सब रोगियोंके लिये उपयुक्त नहीं हैं, वैसे ही वेदोक्त सभी कर्म सबके लिये उपयुक्त नहीं हैं। किंतु वहाँ अधिकारकी चर्चा आवश्यक है। इन सब विचारोंका ध्यान रखनेसे बुद्धदेवको भगवान्का अवतार मानते हुए भी उनके उपदेशको अधर्म बतलानेमें कोई विरोध नहीं पड़ता। यदि साधारण दृष्टिसे देखें तो भी इससे वैदिक धर्मकी अनुपमेय उदारताका ही परिचय मिलता है। वैदिक धर्मको छोड़कर क्या संसारका कोई ऐसा धर्म है, जिसने अपने विरोधीको भगवान्का अवतार मानकर उसका आदर किया हो?
निराकारसे साकार
कुछ लोगोंका कहना है कि निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्म परमात्मा साकार नहीं हो सकता। यद्यपि इस विषयपर समाजियों एवं सनातनियोंके मध्य अनेक बार शास्त्रार्थ हो चुके हैं। उनके शास्त्रार्थोंमें युक्तियोंकी प्रधानता थी और वेदमन्त्रोंसे ईश्वरका साकार होना सिद्ध करनेकी बातका प्राधान्य था, परंतु आजकल कभी अपनेको वेदान्ती कहनेवाले लोग भी अवतारके अस्तित्वका अपलाप करने लगते हैं। उनका कहना है कि 'ईश्वरो नावतरति, व्यापकत्वात्, आकाशवत्' अर्थात् ईश्वर अवतार नहीं लेता, क्योंकि वह व्यापक है, जैसे आकाश, इस अनुमानसे ईश्वरका अवतार बाधित हो जाता है। इसपर कहा जा सकता है कि इस अनुमानका दृष्टान्त ही असिद्ध है; क्योंकि आकाश भी वायुरूपमें अवतीर्ण होता है। वायु, तेज, जलादि क्रमेण पृथ्वीरूपसे भी उसीका अवतरण होता है। यदि कहा जाय कि यह तो वेदान्तियोंके मतानुसार हुआ, परंतु नैयायिकोंके मतसे क्या उत्तर है ? तो यह कहना पड़ेगा कि व्यापकत्व हेतु अनैकान्तिक है; क्योंकि व्यापकत्व नैयायिकोंके आत्मामें रह जाता है, परंतु वहाँ अवतरण होता है। साकार होना ही अवतार पदार्थ है। जब नैयायिकोंके व्यापक आत्मा देहवान् हो जाते हैं, तब परमात्मा देहवान् क्यों नहीं हो सकता ? इसपर यदि कहा जाय कि आत्माके कर्म होते हैं, परंतु परमात्माके कर्म नहीं
५७६ भक्तिसुधा होते तो इसका उत्तर यह है कि विश्वके उत्पादन- पालनादि कर्म ईश्वरके भी होते हैं। फिर भी शंका हो सकती है कि देहारम्भ-प्रयोजक कर्म ईश्वरके नहीं हैं। किंतु इसके उत्तरमें कहा जा सकता है कि कौन कर्म देहारम्भक है, कौन भोगारम्भक है, यह बात शास्त्रैकगम्य है। फल-वैचित्र्यसे हेतु-वैचित्र्यका अनुमान हो सकता है, परंतु किस कर्मसे कौन फल होता है, इसका निर्णय अनुमानसे नहीं होता। जब जीवोंके जन्मारम्भक कर्मोंको जाननेके लिये शास्त्रोंके प्रामाण्यकी अपेक्षा है, जब शास्त्रप्रामाण्य मान्य है, तब तो फिर प्राणिकल्याणार्थ अचिन्त्य, दिव्य लीलाशक्तिसे ही प्रभुका दिव्य जन्म-कर्म हो ही सकता है। इसपर किसीका कहना है कि मधुसूदन स्वामीने माना है कि अवतार नहीं होता, किंतु भक्तकी भावनासे ही विधुरपरिभावित-कामिनी-साक्षात्कारके समान कृष्ण आदिका स्वरूप दिखलायी पड़ता है, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि— अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ (गीता ४।६) 'गीता' के इस मूल वचनसे अज, अव्यय ईश्वरका मायाके द्वारा जन्म सिद्ध होता है और मधुसूदन भी— वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्। पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥ —इस तरह श्रीकृष्णके विषयमें अपना अभिप्राय प्रकट कर रहे हैं। जहाँ भी कहीं आचार्योंने भगवान्के स्वरूपका वर्णन किया है, वहाँ यही कहा है कि भगवान् वस्तुतः अज, सर्वभूतान्तरात्मा होते हुए भी अपनी दिव्यलीला- शक्तिसे देहवान् होकर प्रस्फुरित होते हैं। जैसे घृतवर्तिकाके सम्बन्धसे निराकार अग्नि ही दाहकत्व, प्रकाशकत्वविशिष्ट दीपशिखाके रूपमें अभिव्यक्त होती है, वैसे ही निराकार भगवान् लीलाशक्तिके सम्बन्धसे साकार होकर प्रतीत होते हैं। जैसे घृत-वर्तिकादि तटस्थ रहकर ही दीपशिखाका कारण बनते हैं, दीपशिखाके भीतर-बाहर शुद्ध अग्नि ही है, वैसे ही लीलाशक्ति तटस्थ ही रहती है, भगवान्के स्वरूपमें भीतर, बाहर शुद्ध चिदानन्द ही है, किंवा जैसे निर्मल जल ही बर्फके रूपमें शैत्य-सम्बन्धसे प्रकट होता है, वैसे ही अचिन्त्य, विशुद्ध सत्यके सम्बन्धसे सच्चिदानन्द ब्रह्म साकार हो जाता है। जिस तरह सच्चिदानन्द ब्रह्म ही अनिर्वचनीय मायाके आध्यासिक सम्बन्धसे नाम-रूप- क्रियात्मक प्रपंचरूपसे प्रकट होता है, उसी तरह विशुद्ध सत्त्वके आध्यासिक सम्बन्धसे ब्रह्म साकार देहधारी हो जाता है। कम-से-कम आकाशादि प्रपंचके समान तो अवश्य ही साकार ब्रह्मका अस्तित्व कट्टर-से- कट्टर वेदान्तीको मान ही लेना चाहिये। वैसे तो बाध्यत्व, मिथ्यात्व, अबाध्यत्व, सत्यत्वको लेकर चलें तो शुक्ति- रूप्य आदिकी अपेक्षा अबाध्य घटादि कार्योंका सत्यत्व है, मृत्तिकाकी अपेक्षा घटादिमें बाध्यता होनेसे मिथ्यात्व है, तदपेक्षया मृत्तिकामें अबाध्यत्व होनेसे सत्यत्व है। इसी तरह अपर जल, तेज, वायु, आकाश आदिमें कार्यकी अपेक्षा कारणमें सत्यत्व और कारणकी अपेक्षा कार्यमें मिथ्यात्व होता है। इस दृष्टिसे पारमार्थिक सत्तापेक्षया किञ्चिन्न्यूनसत्ताकत्व ही उस दिव्य शक्तिका व्यावहारिकत्व है। तथा च ब्रह्ममें पारमार्थिक दृष्टिसे अजायमानता रहनेपर भी व्यावहारिक दृष्टिसे जायमानता हो सकती है।
परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव
और व्यावहारिक दृष्टिसे जन्मका भाव
समान सत्तावाले भाव-अभावका ही विरोध होता है, विषम सत्तावाले भाव-अभावका विरोध नहीं होता, अतएव वे दोनों एक जगह भी रह सकते हैं। इसीलिये एक शुक्तिकामें व्यावहारिक सत्तासे रूप्यका अभाव और प्रातिभासिक सत्तासे रूप्यका भाव रहनेमें कोई भी विरोध नहीं है। इसी दृष्टिसे परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव और
निराकारसे साकार ५७७ व्यावहारिक दृष्टिसे जन्मका भाव रहनेमें भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती। इसपर कहा जा सकता है कि दृष्टि-सृष्टिवादकी दृष्टिसे अवतार कथमपि नहीं सिद्ध होता। परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि दृष्टि-सृष्टिवादमें भी आकाशादि प्रपंचका सत्त्व है। कम-से-कम साकार ब्रह्मका उतना अस्तित्व तो मानना ही होगा। सर्वव्यापि विधुरपरिभावित- कामिनीसाक्षात्कारसे कृष्णसाक्षात्कार विलक्षण है। जब विधुरपरिभावित-कामिनीसाक्षात्कारकी अपेक्षा कामिनीका साक्षात्कार विलक्षण है, फिर कृष्ण- साक्षात्कार विलक्षण क्यों नहीं? सारांश यह कि किसी भी दृष्टिसे व्यवहारका उपपादन करना पड़ता है। 'व्याघातावधिराशङ्का' लोकव्याघात ही शंकाकी अवधि है। प्रपंचके स्वरूप निषेध-पक्षमें भी श्रवण, मनन, साक्षात्कार आदि चीजोंका उपपादन करना पड़ता है। फिर जब उन वस्तुओंका उपपादन करना है, तब तो अवतारका उपपादन ठीक ही है। फिर 'दृष्टिसृष्टिवादमें अवतार नहीं बनता' यह कथन ही व्यर्थ है। जब उस पक्षमें आकाशादि प्रपंच ही नहीं बनता, तब अवतार नहीं बनता, यह विशेषोक्ति व्यर्थ है। यदि किसी दृष्टिसे जीव, जगत्, ईश्वर ही न बनता हो तो उस पक्षमें अवतार भी न बने तो कोई दोष नहीं है। विचार तो ईश्वरके अवतारका है, जो ईश्वर ही नहीं सिद्ध करता, वह अवतार क्यों मानेगा? वस्तुतः 'बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति' (महाभारत, आदिपर्व १।२६८) 'अल्पश्रुतसे वेद डरता है कि मुझपर यह प्रहार करेगा।' शास्त्रोंके भिन्न-भिन्न वादोंका आचार्य- परम्परासे बिना अध्ययन किये उनका अभिप्राय नहीं लगता। अज्ञ प्राणी शास्त्र-वचनोंसे ही अपना अनर्थ कर बैठता है। कुछ लोग— मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरावुभौ। यथेच्छं पिबतां द्वैतं तत्त्वं त्वद्वैतमेव हि॥ (पञ्चदशी ६।२३६) —'माया नामकी कामधेनुके जीव, ईश्वर दोनों बछड़े हैं। यथेच्छ द्वैतको ही पीयें, तत्त्व तो अद्वैत ही है।' इन वचनोंको पढ़कर उपासनाकी तिलांजलि दे बैठते हैं। कोई 'जीव-कल्पित ईश्वर है' वाचस्पतिके इस मतको देखकर ईश्वरकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। सीधी बात तो यह है कि कांचन-कामिनी या रोटी- दालको तो सच्चा मानकर प्राणी उनमें आसक्त है, परंतु भगवान्के मिथ्यात्वका ही आग्रह उसे कल्याणकारक मालूम पड़ता है। वस्तुतः 'रामायण' के राम, 'भागवत' के कृष्ण, 'विष्णुपुराण' के विष्णु, 'शिव-स्कन्दपुराणादि' के शिव केवल आभास नहीं हैं, अपितु अधिष्ठानभूत ब्रह्म ही इन स्थलोंमें विष्णु आदि नामोंसे कहा गया है। जहाँ मायामें आभास ईश्वर, अविद्यामें चैतन्यका आभास जीव, यह पक्ष माना गया है, उस पक्षमें भी केवल आभास ईश्वर आदि नहीं है, किंतु अधिष्ठानसहित ही आभास ईश्वरादिरूपमें मान्य है। भागवतादिमें अधिष्ठानप्रधान ब्रह्मरूपको ही कृष्ण, राम माना गया है। अतएव 'एकस्त्वमात्मा पुरुषः पुराणः सत्यः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।' इत्यादि वचनोंसे भगवान्को पुराणपुरुषोत्तम, सत्य, स्वयंज्योति कहा गया है। 'रामायण' में रामको मायाका आश्रय और विषय दोनों ही कहा गया है। यही स्थिति 'विष्णुपुराण', 'शिवपुराण' के विष्णु, शिव आदि स्वरूपोंकी है। 'श्रीमद्भागवत' में भगवान्के स्वरूपोंको मायातीत, अनन्त सच्चिदानन्दरूप कहा गया है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) श्रीशंकराचार्य भी कहते हैं कि जिसने ब्रह्माको अद्भुत, अनन्त ब्रह्माण्ड दिखलाया और वत्सोंसहित गोपोंको अनेक विष्णुरूपमें दिखलाया, शम्भुने जिनके चरणावनेजनको अपने सिरपर रखा, वह कृष्ण मूर्तित्रयातीत कोई अविकृत चिदानन्दघन ही है— ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमत्यद्भुतान् गोपान् वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णूनशेषांश्च यः।
शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात् कृष्णो वै पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा। (प्रबोधसुधाकर २४२) महात्मा तुलसीदास भी कहते हैं—व्यापक, निरंजन, निर्विकार परमात्मा ही कौसल्याकी गोदमें रामचन्द्र होकर प्रकट होते हैं— ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ (रा०च०मा० १।१९८) अघासुरके मुखमें कृष्ण-प्रवेशको 'भागवत' ने शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही प्रवेश माना है। बछड़ों और ग्वाल-बालोंके अघासुरके मुखमें समाविष्ट होनेपर कृपामय भगवान् आनन्दकन्द कृष्णचन्द्र भी उसके मुखमें प्रविष्ट हुए। प्रभुने जिस समय अपनी महिमासे अघासुरको मार दिया, अमृतवर्षिणी कृपादृष्टिसे ग्वाल- बालोंको जिलाया, उसी समय अघासुरके शरीरसे एक ज्योति निकली और कृष्णके स्वरूपमें प्रविष्ट हो गयी। यह सुनकर परीक्षित्को आश्चर्य हुआ कि गो-ब्राह्मण- मांस-रुधिराशी अघासुरको ऐसी दुर्लभ गति क्यों और कैसे मिली? इसपर शुकाचार्य भगवान् बोले— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) अर्थात् जिनके श्रीअंगकी मंगलमयी मानसी प्रतिमाको सौभाग्यशाली लोग एक बार भी हृदयमें रखकर भागवती गतिको पा जाते हैं, फिर मायासे असंस्पृष्ट, नित्य, चिदानन्दात्मा वह भगवान् ही जिसके अन्दर प्रविष्ट हो गये, उसे भागवती गति प्राप्त कर लेनेमें क्या आश्चर्य है? अतएव प्रभुके प्रादुर्भावका प्रयोजन भी धर्मग्लानि-अधर्माभ्युत्थान- निवृत्तिपूर्वक धर्मस्थापन, साधुपरित्राण, दुष्कृति-विनाशके अतिरिक्त अमलात्मा परमहंसोंको भक्तियोगका विधान करना है। प्रकृति-प्राकृत-प्रपंचातीत, शुद्ध परब्रह्म कृष्ण ही दिव्य लीलाशक्तिके योगसे सगुण, सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर योगीन्द्र, मुनीन्द्रोंके निर्मल मनोंको आकर्षित करते हैं। प्रकृति या प्राकृतप्रपंच उन सत्यानृत-विवेकी अमलात्मा परमहंसोंका मन नहीं खींच सकते, अतएव उनका भजनीय शुद्ध ब्रह्म ही है। भेद इतना ही है कि जैसे इक्षुरसका ही परिणाम सिता, शर्करा, कन्दकी मिठास इक्षुरससे विलक्षण होती है, वैसे ही शुद्ध सच्चिदानन्दसे तत्त्वतः अपृथक् होनेपर भी भगवान्का सगुण स्वरूप अद्भुत चमत्कारपूर्ण होता है। जैसे इक्षुदण्डमें दैवात् मीठा फल लग जाय या चन्दन-वृक्षमें मनोहर पुष्प लग जाय, वैसे ही परमानन्द-रसरूप निर्गुण ब्रह्ममें सगुण, साकार ब्रह्मका होना है। यही तो कारण है कि निर्गुण ब्रह्मानुभवी जनकादिकोंका चित्त भी रामचन्द्रके सगुण, साकार स्वरूपपर मुग्ध हो गया था— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५) साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता जैसे केवल नेत्रसे सूर्य-दर्शनकी अपेक्षा दूरवीक्षण यन्त्रोपहित नेत्रसे सूर्य-दर्शनमें चमत्कार होता है, वैसे ही केवल निर्मल अन्तःकरणसे ब्रह्म देखनेकी अपेक्षा पवित्र अन्तःकरणसे लीलाशक्तिद्वारा साकाररूपमें प्रकट भगवान्के दर्शनमें विलक्षणता होती है। निरुपाधिक स्वरूप निरतिशय है, इसमें भी कोई बाधा नहीं। यद्यपि अन्यान्य प्रपंच भी ब्रह्मका ही परिणाम या विवर्त है तथापि वह तामसी, राजसी प्रकृति— रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वात्मिका प्रकृतिसे आवृत रहता है। भगवत्स्वरूप विशुद्ध सत्त्वात्मिका योगमाया या दिव्य लीलाशक्तिसे साकार रूपमें प्रकट ब्रह्म निरावरण ही रहता है। जैसे दूरवीक्षणादि नेत्र और सूर्यके मध्यमें रहकर सूर्य-स्वरूप-दर्शनमें सहायक होता है, अन्य पाषाणादि सूर्य-दर्शनका प्रतिबन्धक हो जाता है, वैसे
निराकारसे साकार ५७९ ही दिव्य लीलाशक्ति परमात्म-स्वरूप दर्शनमें सहायक होती है, अन्य राजसी, तामसी शक्तियाँ प्रतिबन्धक होती हैं। साकाररूपमें किसी भी भावसे चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण कोई तो प्रकृतिसे पृथक् ही भगवान्की अन्तरंगा शक्ति मानते हैं, कोई महाशक्तिके अन्तर्गत होनेपर भी उसे दिव्य मानते हैं। जैसे गुलाबके बीजमें कण्टक, पत्र, नाल, स्कन्धादिकी उत्पादिनी शक्तिसे सौन्दर्य- माधुर्य-सौरस्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न फूलको उत्पन्न करनेकी शक्ति विलक्षण होती है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी अन्यान्य शक्तियोंकी अपेक्षा सगुण, साकार भगवान्के प्राकट्यानुकूला लीलाशक्तिमें चमत्कारपूर्ण विलक्षणता रहती है। सारांश यह है कि शुद्ध परब्रह्म ही निराकार रूपसे ही सगुण, साकार रूपमें प्रकट होते हैं। तभी उनको भाव, कुभाव, अनख, आलस किसी तरहसे भी भजनेसे प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। इसीलिये कहा है— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) अर्थात् प्राणिमात्रके कल्याणार्थ अव्यय, अप्रमेय, निर्गुण, गुणान्तरात्मा भगवान्का साकार स्वरूपमें प्राकट्य होता है। इस स्वरूपमें काम, क्रोध, स्नेह, किसी तरह भी चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण हो जाता है— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१५) ठीक ही है, जैसे कोई चिन्तामणिको दीपक समझकर उसे लेने चले तो भी वहाँ दीपक नहीं, अपितु चिन्तामणि ही मिलेगी, वैसे परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम, शुद्ध सच्चिदानन्द परब्रह्मको कोई जार समझकर, कोई शत्रु, मित्र, कुछ भी समझकर प्रवृत्त हो, परंतु वहाँ मिलेगा शुद्ध परब्रह्म परमात्मा ही, प्राकृत वस्तुकी प्राप्ति नहीं होगी। अतएव कुछ व्रजांगनाएँ जारबुद्धिसे भी कृष्णको भजकर मुक्त हो गयीं— तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।११) पति, भ्राता आदिसे अवरुद्ध होनेके कारण कुछ व्रजांगनाएँ मदनमोहनके वेणुनादसे आकर्षित होनेपर वृन्दावनचन्द्र कृष्णचन्द्रके पास न जा सकीं। वे कृष्णकी भावनासे भावितमनस्का होकर, आँख मींचकर वहीं ध्यान करने लगीं। प्रियतम कृष्णके दुःसह विरहजन्य तीव्रतापसे उनके अशुभ कर्म विधूत हो उठे और ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेष (परिरम्भण)- जन्य आनन्दोद्रेकसे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका भी फल समाप्त हो गया अथवा उनके दुःसह, प्रेष्ठ-विरहजन्य तीव्रतापसे विश्वके ही अशुभ कर्म काँप उठे और ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेषसे संसारके सम्पूर्ण मंगल अपनेको कम जानकर दुर्बल हो गये। इस तरह सद्यःप्रक्षीणबन्धना होकर जारबुद्धिसे भी उन्हीं परमात्माको प्राप्त होकर वे व्रजांगनाएँ गुणमय पंचकोशों या तीनों देहोंसे मुक्त हो गयीं। सगुणस्वरूपका चिन्तन सरल एवं सुगम भावुकोंने तो इस सगुण स्वरूपके चिन्तनको सरल, सुगम, श्यामीभूत ब्रह्म ही बतलाया है। अद्वैतसिद्धिकारका ही कहना है कि जो लोग निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मकी उपासना, ध्यानाभ्यासवशीकृत मनसे करते हैं, वे करें, पर मेरे तो लोचन-चमत्कारके लिये वही तत्त्व प्रस्फुरित हो, जो कालिन्दी-पुलिनमें श्यामतेज रहता है— ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति॥ किन्हीं भावुकोंने व्रजांगनाओंके पुंजीभूत प्रेमको ही कृष्ण माना है, किन्हींने यदुओंके मूर्तीभूत भागधेयको ही कृष्ण माना है, श्रोत्रियोंने श्रुतियोंके गुप्त वित्तको
ही श्यामीभूत ब्रह्म कृष्ण माना है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ किसीका कहना है कि पूर्णानुरागरससार- सरोवरसमुद्भूत पंकज श्रीकृष्ण है, किसीने कहा नहीं, सच्चिदानन्दरससार-सरोवरसे ही इस कृष्ण-कुवलयका प्राकट्य हुआ है। वह ऐसा कुवलय है कि भृंगों (भक्तमनोमिलिन्दों)-ने अभीतक उसका आघ्राण किया ही नहीं। चाहे ऐसा कह लें कि यद्यपि वे अनादि कालसे ही उस कृष्णके सौन्दर्य-कुवलयमधुका पान कर रहे हैं तथापि उन्हें प्रतिदिन, प्रतिक्षण उसमें नवीनताका ही स्फुरण होता है अर्थात् प्रतिक्षण ही उसमें नवीनताका ही भान होता रहता है— 'तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्' इसी तरह कवीन्द्ररूप अनिलोंने अभीतक इस कुवलयके यशःसौरभका अपहरण नहीं किया अर्थात् उन्हें भी नवीनताकी ही स्फूर्ति होती है। ऊर्मीकणभरोंसे—सांसारिक षडूर्मियोंसे— यह कुवलय आहत नहीं हुआ। इतना ही क्यों, आजतक किसीने इसे देखा भी नहीं है— अनाघ्रातं भृङ्गैरनपहृतसौगन्ध्यमनिलै- रनुत्पन्नं नीरेष्वनुपहतमूर्मीकणभरैः। अदृष्टं केनापि क्वचन च चिदानन्दरससो यशोदायाः क्रोडे कुवलयमिवौजस्तदभवत्॥ (आनन्दवृन्दावनचम्पू २।११) देवकीने मुक्त मुनीन्द्रोंका अन्वेष्टव्य एक अद्भुत फल उत्पन्न किया, व्रजेन्द्रगेहिनी नन्दरानीने उसे पाला, श्रीव्रजसीमन्तिनियोंने उस फलका अनुभव किया— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः॥ (पद्यावली २९९) श्रुतियोंमें सगुण-साकाररूपकी अवधारणा सच्चिदानन्द परब्रह्मका सगुण, साकार रूप होता है, यह 'केनोपनिषद्' में भी प्रसिद्ध है। देवासुर-संग्राममें परमेश्वरके अनुग्रहसे देवताओंको जय मिली, परंतु देवताओंने समझा कि हमारे ही परिश्रमका यह फल हुआ। भगवान्ने समझ लिया कि यदि इन्हें भी गर्व हुआ तो असुरोंसे इन देवताओंमें अन्तर ही क्या रह जायगा? असुषु प्राणोपलक्षितेषु अनात्मसु रमन्ते ये ते असुराः। अथवा अशोभने अनात्मनि रमन्ते ये ते असुराः। अर्थात् अशोभन अनात्मामें रमण करनेवाले असुर कहलाते हैं। भगवान् यह सोचकर परम प्रकाशमय सगुण, साकार, दिव्य रूपमें प्रकट हुए। उस स्वरूपको देखते ही देवता घबड़ाये और 'सपक्षका है या विपक्ष का' यह जाननेके लिये अग्नि, वायु और इन्द्रको भेजा। अग्नि, वायु उस परमात्माके सामने एक तृण भी उठाने एवं जलानेमें समर्थ न हुए। दोनों देवताओंके लौटनेपर इन्द्र गये। इन्द्रको आते देखते ही वे प्रभु अन्तर्हित हो गये। इन्द्र लज्जित होकर वहीं उस स्वरूपकी जिज्ञासासे तप करने लगे। बहुत दिनोंके तपसे भगवती उमा (ब्रह्मविद्या) प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रह्मका परिचय कराया। ब्रह्मज्ञानी होनेसे ही देवताओंमें अग्नि, वायु, इन्द्र प्रधान हैं। उनमें भी इन्द्रने पहले ब्रह्मका परिचय प्राप्त किया, अतः वही श्रेष्ठ माने गये हैं। 'ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये' इत्यादि श्रुतियोंमें ये बातें स्पष्ट हैं। 'छान्दोग्य' में भी सूर्यमण्डलान्तर्गत एक हिरण्मय, हिरण्यश्मश्रु, तेजोमय परम पुरुषका वर्णन आता है, वह भी सच्चिदानन्द ब्रह्मका ही सगुण, साकार रूप है। यह बात उत्तरमीमांसाके 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रमें भी स्पष्ट है। आचार्य श्रीशंकरभगवान् कहते हैं कि परमात्माका माया (विशुद्ध सत्त्व)-के योगसे विग्रह बन सकता है। यद्यपि वह भूतगुणों—शब्दादिसे युक्त प्रतीत होता है तथापि वह शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है। शब्दादिमत्ताकी प्रतीति उसमें भ्रान्ति ही है। 'कैवल्योपनिषद्' में 'उमासहायं परमेश्वरं विभुम्' इस वचनसे भी उमा-महेश्वरका स्वरूप वर्णित है। 'अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे। पृथिव्याः सप्तधामभिः' इस मन्त्रमें बतलाया गया है कि विष्णुगायत्र्यादि सप्त छन्दोंद्वारा देशपर विविध
क्रमण-चरण-विन्यास करते हैं। 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्। समूढमस्य पाꣳसुरे स्वाहा'। इस मन्त्रसे ज्ञात होता है कि त्रिविक्रमावतारधारीने इस प्रतीयमान विश्वको अपने चरणोंसे आक्रान्त किया है, अपने चरणसे तीन प्रकारसे पादविन्यास किया है। इन विष्णुके धूलियुक्त पादस्थानमें सम्पूर्ण विश्व अन्तर्भूत होता है। 'त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्' इसमें भी कहा गया है कि किसीके द्वारा जिसकी हिंसा नहीं हो सकती, उस सर्वजगत्के रक्षक विष्णुने अग्निहोत्रादि कर्मोंका पोषण करते हुए पृथिव्यादि स्थानोंमें अपने तीन पदोंसे क्रमण किया। इस तरह अनेक श्रुतियोंमें परमात्माके सगुण, साकार रूपका वर्णन है। 'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते। तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा।।' यहाँ भी कहा है कि प्रजापति गर्भके भीतर आता है, वह स्वरूपसे अज होकर भी अनेक रूपोंसे प्रकट होता है, उसके प्राकट्यका धर्मरक्षणादि प्रयोजन धीर लोग जानते हैं। 'या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥' 'नीलग्रीवाः शितिकण्ठाः' इत्यादि अनेक स्थानोंमें परमेश्वरका ही नीलकण्ठ महादेवरूपमें वर्णन मिलता है। एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः। स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ इस मन्त्रमें कहा गया है कि यही ईश्वर सब दिशाओंमें व्याप्त होकर, पहले गर्भमें रहकर प्रकट हुआ, वही सर्वतोमुख परमेश्वर पहले अनेक रूपसे उत्पन्न हुआ है और आगे भी उत्पन्न होगा। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ (गीता ४।६) इस श्लोकपर निम्नलिखित अभिप्राय केशव काश्मीरीका है- 'यद्यपि मैं अज हूँ अर्थात् जीवोंके समान कर्मनिमित्त अपूर्व देह-ग्रहण नहीं करता, अव्ययात्मा=पूर्वदेहवियोगरहित हूँ तथापि अपनी प्रकृति (स्वभाव) - असंगत्व, अजेयत्व, अनतिक्रमणीयत्वादिको न छोड़कर ही अपनी माया - संकल्पसे लोकहितार्थ जन्म लेता हूँ।' इस व्याख्यानमें 'प्रकृति' का अर्थ स्वभाव और 'माया तु वयुनं ज्ञानम्' इस 'निघण्टु' वचनसे 'माया' का अर्थ ज्ञान लिया गया है। 'अजायमानो बहुधा विजायते' (मुद्गल० ३।१) इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध किया गया है। 'आनन्दरूपममृतं यद् विभाति' (मुण्डक २।२।७), 'आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्' (श्वेता० ३।८), 'हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेशः आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः' (छान्दोग्य० १।६।६) इत्यादि श्रुतियोंसे भगवान्का सगुण स्वरूप मालूम पड़ता है। 'यो वेत्ति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मनः। मुखं तस्यावलोक्याऽपि सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ स सर्वस्माद्बहिष्कार्यः श्रौतस्मार्तविधानतः।' 'न भूतसङ्घसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः।' अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि। (श्रीमद्भा० १०।१४।२) इत्यादि 'भारत' 'भागवत' आदिके वचनोंसे भी भगवान्के स्वरूपको अभौतिक कहा गया है, भौतिक माननेवालेको पातकी बतलाया गया है। मधुसूदनजी कहते हैं कि सर्वज्ञ ईश्वरको धर्माधर्म न होनेसे उनका जन्म नहीं बन सकता। नये देहेन्द्रियादिका ग्रहण जन्म और पूर्वगृहीतका वियोग मृत्यु कहलाता है। ये दोनों ही बातें अज, अव्यय परमात्मामें सम्भव नहीं हैं। यदि ईश्वरका शरीर स्थूल भूतकार्य हो या व्यष्टिरूप हो तो जाग्रदवस्थाभिमानी जीवोंके तुल्य ही ईश्वर भी होगा। समष्टिरूप हो तो विराट् जीवरूप होगा। यदि सूक्ष्मभूतका कार्य है या व्यष्टिरूप है तो स्वप्नावस्थाभिमानी होगा और यदि समष्टिरूप हो तो हिरण्यगर्भ होगा। परमेश्वरका
५८२ भक्तिसुधा भौतिक स्वरूप जीवाविष्ट हो ही नहीं सकता। कुछ लोग कहते हैं कि जीवाविष्ट शरीरमें ही 'भूतावेशन्याय' से ईश्वरका प्रवेश होता है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यदि इस शरीरमें जीवको ही सुख-दुःखादि भोग होता है, ईश्वरको नहीं, तब तो अन्तर्यामीरूपसे सर्वत्र ही परमेश्वरका प्रवेश सिद्ध है, फिर ऐसा शरीर-विशेष स्वीकार करना व्यर्थ ही है। यदि उस शरीरमें जीवका भोग नहीं बनता, तब तो उसे जीवशरीर भी नहीं कहा जा सकता, अतः ईश्वरका भौतिक शरीर कथमपि नहीं बन सकता। इन्हीं बातोंका निराकरण करते हुए भगवान् कहते हैं कि 'मैं अज और अव्यय होता हुआ भी, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंका ईश्वर होकर भी, अपनी विचित्र शक्तिवाली अघटितघटनापटीयसी उपाधिभूत मायाको अपने चिदाभाससे वशीभूत करके मायाके परिणामविशेषोंसे ही देहवान्के समान उत्पन्न- सा प्रतीत होता हूँ। अनादि माया ही यावत्कालस्थायी होनेसे नित्य कहलाती है। वही मुझमें जगतकारणता सम्पादन करती है। वह मेरी इच्छासे ही प्रवर्तमान होकर विशुद्ध सत्त्वमयी मेरी मूर्ति कहलाती है। उस मूर्तिसे विशिष्ट मुझमें अजत्व, अव्ययत्व, ईश्वरत्व उपपन्न हो जाता है।' अतएव श्रुति कहती है— 'आकाशशरीरं ब्रह्म' (तैत्तिरीयोपनिषद् वल्ली १ अनुवाक ६) आकाश अर्थात् माया ही भगवान्का शरीर है। यहाँ शंका हो सकती है कि भौतिक शरीर न होनेपर भगवान्में मनुष्यत्वादि-प्रतीति कैसे होगी? इसका समाधान यह है कि आत्ममाया (भगवान्की माया)-से ही लोकानुग्रहके लिये भगवान्में मनुष्यत्वादि- प्रतीति होती है। यही बात 'मोक्षधर्म' में लिखी है— माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद॥ सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि। (महा०, शान्ति० ३३९।४५-४६) एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते॥ इच्छन् मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः। (महा०, शान्ति० ३३९।४४-४५) अर्थात् हे नारद! मुझ कारणोपाधि परमेश्वरको जो भूतगुण-शब्दादिसे युक्त देख रहे हो, यह मेरी माया ही है। मुझ कारणोपाधिको कोई चर्मचक्षुसे नहीं देख सकता। कुछ लोग परमेश्वरमें देह-देहि-भाव ही नहीं मानते। उनका कहना है कि सच्चिदानन्दघन, निर्गुण, परिपूर्ण परमात्मा ही भगवान्का देह है। भगवान्से पृथक् भौतिक या मायिक उनका कोई भी विग्रह नहीं है। 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा अनुच्छित्तिधर्मा' इत्यादि श्रुतियों और 'असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेर्नात्माऽश्रुतेर्नित्य- त्वाच्च ताभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे यही विदित होता है कि वस्तुतः भगवान् जन्म-विनाशरहित, सर्वभासक, सर्वकारण, मायाका अधिष्ठान होनेसे सर्वभूतोंके ईश्वर होकर भी अपने एकरस, सच्चिदानन्दघनस्वभावमें ही अवस्थित रहकर देह-देहिभावके बिना ही देहिवत् व्यवहरण करते हैं। अदेह सच्चिदानन्दघनमें देहकी प्रतीति कैसे होती है? इसका उत्तर 'आत्ममायया' से ही दे दिया है। निर्गुण, शुद्धरस, देहदेहिभावशून्य भगवान्में देहरूपसे प्रतीति मायामात्र है। यही 'श्रीमद्भागवत' में भी— कृष्णमेनंमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (१०।१४।५५) अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥ (१०।१४।३२) इत्यादि वचनोंसे यह स्पष्ट कहा गया है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा श्रीकृष्ण ही हैं, वे ही अपनी मायासे जगत्के हितके लिये देहवान्से प्रतीत होते हैं। नन्दगोपव्रजवासियोंका लोकोत्तर सौभाग्य था कि पूर्ण सच्चिदानन्दघन उनका मित्र होकर प्रकट हुआ था। कुछ लोग निरवयव, निर्विकार परमानन्दका ही अवयवावयविभाव वास्तविक ही मानते हैं, परंतु