भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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५६८ | भक्तिसुधा

अवतारमीमांसा

अवतारके सम्बन्धमें आजकल बहुत-सी शंकाएँ उठायी जाती हैं। कहा जाता है कि 'यदि किसी एक विशिष्ट आकारको भगवान्‌का नित्य स्वरूप माना जाय, तो उस आकारको निर्विकार मानना होगा, परंतु किसी साकारको नित्य कहना दुर्घट ही है, अतः व्यावहारिक जगत्‌में विभिन्न दैहिक आकारोंमें भगवान्‌का अवतार असमंजस है। यह धारणा कैसे कर सकते हैं कि भगवान् उनके स्वभावगत नित्य, अच्युत- स्वरूपका कभी-कभी परित्याग करते हैं? जन्म- मृत्युके अधीन नये-नये आकारोंको ग्रहण किया करते हैं? सर्वशक्तिमत्ताके आधारपर भी ऐसी कल्पना नहीं हो सकती। अवतारोंके आकार परस्पर भिन्न और अपक्षयादिसे युक्त पाये जाते हैं, अतः अपने नित्य रूपके साथ ही भगवान्‌का जगत्‌में अवतरण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता।' परंतु विचार करनेपर उपर्युक्त बातें बेतुकी प्रतीत होती हैं। सर्वशक्तिमान् भगवान् एक रूप या अनेक रूपसे भिन्न-भिन्न कालमें या एक कालमें प्रवृत्त हो सकते हैं। उनके आविर्भाव-तिरोभावको ही अज्ञलोग उत्पत्ति और नाश मान बैठते हैं। भगवान्‌के शरीरमें किसी भी तरहका विकार नहीं माना जा सकता। जैसे मायावीके अंगमें मायासे अनेक विकारोंका स्फुरण हो सकता है, वैसे ही भगवान्‌में भी कल्पना की जा सकती है। भगवान्‌का स्वाभाविक पारमार्थिक स्वरूप निराकार, निर्विकार है। फिर भी भगवान् अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय महाशक्तिके आधार होनेसे सगुण और कारण हैं। उसी शक्तिके योगसे भगवान् सगुण, साकार, एकरूप, अनेकरूपमें प्रतीत होते हैं। यही बात 'अजायमानो बहुधा विजायते।' (यजु० ३१।१९), 'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' (बृहदा० २।५।१९) (परमात्मा अज होकर भी अनेक रूपसे जायमान होता है, इन्द्र—परमात्मा मायासे अनेक रूप होकर प्रतीत होता है) इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध है। कहा जाता है कि 'निराकार परमात्मा साकार किस प्रकार बनता है ? वह शरीरी जीवरूपसे स्वयं परिणामको प्राप्त होता है या विशिष्ट मानस भौतिक देहकी सृष्टि करता है और उसमें आत्मरूपसे प्रवेश करता है, किंवा अपनी विशेष शक्ति और ज्ञानको किसी विशेष शरीरधारीके जीवनमें अभिव्यक्त करता है, जिससे कि वह उसके साथ तादात्म्यापन्न होकर कार्य करता है ? इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि देशकालातीत, समस्त विकार और सीमासे रहित, पूर्ण आध्यात्मिक पुरुष किस प्रकार स्वयं देशकाल-सीमायुक्त और विभिन्न विकाराधीन किसी शरीरविशेषमें परिणामको प्राप्त होता है ? यदि निराकारता आकाररूपसे परिणामको प्राप्त हो सके और भगवत्ता भी सुरक्षित रहे, तो निराकारताको भगवत्स्वरूपके प्रति नित्य और स्वरूपगत रूपसे नहीं माना जा सकता। फिर तो उसके स्वरूपका प्रकार कोई अनित्य और विकारी ही होगा। अनन्त होकर भी अन्तवाले रूपमें परिणामको प्राप्त हो सकता है। नित्यस्वरूप अचिरकालस्थायी पुरुषरूपमें जन्म ग्रहण कर सकता है और साथ ही अपने नित्यस्वरूपको भी अक्षुण्ण बनाये रख सकता है। पूर्ण पुरुष अपूर्ण पुरुषका जीवनयापन कर सकता है, फिर भी अपने पूर्ण स्वरूपमें ही स्थिर रह सकता है। ऐसी धारणाएँ स्पष्ट विरुद्ध हैं।' इसपर कहना यही है कि परमेश्वरका पारमार्थिक रूप अज, अव्यक्त, अनन्त, अनाकार, पूर्ण होनेपर भी अनिर्वचनीय मायासे उसमें साकारता, अपूर्णताकी प्रतीति होती है। वस्तुतः वे अपने पारमार्थिक रूपमें सर्वदा ही प्रतिष्ठित रहते हैं। यह नियम है कि समान सत्तावाले भाव-अभावका ही विरोध होता है, विषम सत्तावाले भाव-अभावका विरोध नहीं होता। अतः पारमार्थिक एवं व्यावहारिक सत्ताके भेदसे साकारता- निराकारता, अनन्तता और एकदेशिताका सामंजस्य