भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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अवतारमीमांसा [५६९]

हो सकता है। इसके अतिरिक्त जैसे नैयायिक, वैशेषिकोंके यहाँ देहदृष्टिसे साकारता होनेपर भी आत्माओंकी व्यापकता है, वैसे ही यह भी व्यवस्था बैठ सकती है। आत्मा व्यापक माना जाय तो अणु माना जाय तो हर दृष्टिसे निराकार ही है। फिर भी जैसे उसका साकार देह बन सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वरमें भी साकारता आदि बन सकती है। फिर भी जैसे अपने रूपसे आत्माका परिणाम नहीं मानना पड़ता, वैसे ही ईश्वरका भी परिणाम नहीं मानना पड़ेगा। भेद यही है कि जीवात्मा कर्मोंके परतन्त्र होकर उसमें अभिमानी होकर फँसता है और परमेश्वर लोकानुग्रहार्थ दिव्य देह ग्रहण करके कार्य करता है, फिर भी अपने निराकार स्वरूपमें सर्वदा प्रतिष्ठित रहता है। अपरिच्छिन्नमें परिच्छिन्नता आदि भी मायाको लेकर बन सकती है, परंतु स्वरूपच्युति न होगी, यही उसकी विशेषता है। भगवान्का पूर्णावतार या अंशावतार कहा जाता है कि 'भगवान् प्रत्येक विशेष अवतारमें स्वयं सम्पूर्ण रूपसे परिणामको प्राप्त होते हैं या आंशिक रूपसे? यदि प्रथम कल्प मान्य है, तब तो यह भी मानना पड़ेगा कि एक अवतार जबतक जीवित रहता है, तबतक निराकार भगवान् नहीं रहता और भगवान् जगत्के एक विशेष स्थलमें आबद्ध रहता है। ऐसा होनेपर यद्यपि अवतरित भगवान्का ज्ञान और शक्ति आन्तरिक रूपसे अनन्त और जगत्प्रपंचके शासन और रक्षणमें समर्थ मानी जाती है तथापि उसका अस्तित्व व्यापकरूपसे नहीं माना जा सकता और वह जगत्में ओतप्रोत भी नहीं माना जा सकता। उसका जगत्के साथ सम्बन्ध भी बाह्य रूपसे मानना होगा। फलतः यह सिद्धान्त कि 'भगवान् जगत्का उपादानकारण है' इस मन्तव्यसे मेल न खायेगा। विशेष रूपसे अवतरित भगवान्का जब तिरोभाव होगा, तब निराकारका पुनः जन्म मानना होगा। फिर निराकारका भी जन्म-मरण मानना होगा, इत्यादि।' परंतु यह विचार भी बालकोंकी ही बुद्धिमें भ्रम पैदा करनेमें समर्थ है; क्योंकि भगवान्का परिणाम न माननेसे उपर्युक्त वक्तव्य ही निराधार हो जाता है। कूटस्थ भगवान् अखण्ड, अनन्त, पूर्ण रूपसे सदा विराजमान रहकर ही दिव्य मायाशक्तिसे दिव्य देह ग्रहण कर लेते हैं। यह भी कहा जाता है कि 'यदि आंशिक रूपसे भगवान् परिणामको प्राप्त होते हैं, तो उसके एक अंशको निराकार और दूसरे अंशको परिणामी मानना पड़ेगा, जो कि स्पष्ट ही विरुद्ध है। परमात्मा निराकार, साथ ही अंशयुक्त और अंशमें विभागके योग्य नहीं माना जा सकता। यदि ऐसी धारणा सम्भव हो तो किसी अंशमें कोई परिणाम होनेपर आत्मा विकारको प्राप्त होगा और इससे वह एक विकारी, अस्थायी और व्यावहारिक पुरुष होगा। यदि इस आपत्तिका त्याग भी करें तो प्रश्न उपस्थित होगा कि अवतार-शरीरमें परिणत भगवद्-अंश, पूर्ण भागवतचेतनासे सम्पन्न है अथवा यह चेतना विशेषित या सीमायुक्त होती है? अवतार क्या स्वयं भगवान्के समान अनन्त ज्ञान और शक्तिको धारण करता है या भगवान्के अंशसे परिणामको प्राप्त (आकारवान्) होनेके कारण उसका ज्ञान और शक्ति अन्तयुक्त होती है? यह स्पष्ट है कि आंशिक अवतार स्वयं भगवान्के समान सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि अंश और सम्पूर्णमें पृथक्ताका लोप होगा अथवा एक ही कालमें दो प्रतिद्वन्द्वी भगवान् होंगे—एक रूपयुक्त और अपर रूपरहित। भगवान्की आंशिक अभिव्यक्तिकी धारणा उनकी शक्ति और ज्ञानकी आंशिक अभिव्यक्तिको बोधित करती है। ऐसा होनेपर यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि अज्ञानका आवरण अवतारी चेतनके ऊपर विद्यमान है तथा उसका ज्ञान और शक्ति, चाहे उसके समकालीन व्यक्तियोंकी तुलनामें कैसा भी उच्च