भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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क्यों न हो, सीमायुक्त है तथा उसकी सम्पूर्ण रूपसे अभिव्यक्ति नहीं है। तब व्यावहारिक जगत्के असाधारणसामर्थ्ययुक्त किसी मनुष्य और अवताररूपसे मान्य व्यक्तिमें वस्तुगत भेद क्या रह गया ? सब मनुष्य या प्राणी उस भगवान्की आंशिक अभिव्यक्ति हैं, जो सब व्यावहारिक पदार्थोंका एकमात्र आश्रय, कारण और द्रव्य माना जाता है।' परंतु यह कथन भी सारशून्य है। निराकार, निर्विकार चेतनमें यद्यपि अंशांशिभाव नहीं है तथापि मायारूप उपाधिके भेदसे अंशांशिभाव बन जाता है, अतएव अंशावतार, पूर्णावतार आदि व्यवहार होता है। जहाँ सम्पूर्ण भगवत्ता प्रकट होती है, वहाँ पूर्णावतारका व्यवहार होता है, जहाँ अंशतः भगवत्ताका प्राकट्य होता है, वहाँ अंशावतारका व्यवहार होता है। निराकार चेतनतत्त्व अंशतः या सम्पूर्णतः किसी प्रकार परिणामको प्राप्त नहीं होता, अतः परिणाम-पक्षके सभी दूषणोंका अवकाश ही नहीं है। लोककल्याणार्थ भगवदिच्छासे अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिके द्वारा दिव्य शरीरका निर्माण होता है। उसीमें अपरिणामी परमेश्वर प्रतिष्ठित होकर विविध लीलाओंका अनुसरण करते हैं। जिन अवतारोंमें सीमायुक्त चेतनाका विकास अभीष्ट है, वहाँ सीमित और जहाँ निःसीम चेतनाकी अभिव्यक्ति अभीष्ट है, वहाँ निःसीम चेतनाका आविर्भाव होता है। भगवदिच्छा ही इस भेदकी नियामिका है। सम्पूर्ण रूपसे भी अवतारोंमें ज्ञान-क्रिया-शक्तिका विकास होनेमें कोई आपत्ति नहीं है। अतएव भगवान्के अवतारोंमें प्रतिद्वन्द्विताकी कल्पना केवल अनभिज्ञता ही है। जब योगी अनेक शरीरोंका निर्माण करके उनसे व्यवहार कर सकता है और सर्वत्र अभिमानी एक होनेसे प्रतिद्वन्द्विताको अवकाश नहीं रहता, वैसे ही जब एक ही ईश्वर अनेक अवतारोंमें प्रकट होता है, तब प्रतिद्वन्द्विताको अवकाश ही कहाँ है ? रूपरहित तत्त्व ही विशिष्ट शक्तिके योगसे रूपवान् होता है। विशेषतः अवतार पूर्ण ही होते हैं। जहाँ जैसे कार्यकी आवश्यकता होती है, वहाँ वैसी ही शक्तियोंका प्राकट्य होता है। राम, कृष्णके अवतारमें सभी शक्तियोंका प्राकट्य हुआ है, इसीलिये उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। अंशावतारोंमें भी जीवोंकी अपेक्षा विलक्षणता होती है। जीवोंकी मलिनसत्त्वप्रधाना अविद्या उपाधि होती है, ईश्वरकी विशुद्धसत्त्वप्रधाना माया उपाधि होती है। यद्यपि जड़- चेतन सभी रूपमें एक ईश्वरकी ही अभिव्यक्ति होती है तथापि अवतारोंमें उन सबसे विशेषता इसीलिये होती है। तमःप्रधाना प्रकृतिसे परमेश्वर जड़ जगत्का कारण बनता है, अविशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृतिके द्वारा जीवोंका कारण होता है और विशुद्धसत्त्वप्रधाना प्रकृतिके द्वारा अवतार ग्रहण करता है। जीवोंमें वह बात नहीं होती, जो ईश्वरके अवतारोंमें होती है। जो सृष्टिको विचित्र बतलाकर उसमें अवतारोंके सदृश अनेक जीवोंका होना सिद्ध करना चाहते हैं, उनको इस ओर भी ध्यान देना चाहिये कि जब सृष्टि- वैचित्र्यसे ही, बिना प्रमाणके भी, अन्धश्रद्धासे अवतारोंके सदृश अन्य जीवोंका होना मान लिया जाता है, तब शास्त्रप्रमाणसे अवतारोंके सदृश अन्योंका न होना ही क्यों नहीं मान लिया जाता ? फिर सृष्टिवैचित्र्यसे ही ईश्वरके समान ही सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् अन्य जीव भी क्यों न मान लिये जायें ? जब ईश्वर अनेक नहीं हो सकते, तब अवतारोंके समान जीवदेह नहीं हो सकते, यह भी मान्य ही होना चाहिये। अवतार-देह दिव्य होते हैं, उनमें जरा-मरणादि नहीं होते, वे केवल भगवदिच्छासे आविर्भूत और तिरोभूत होते रहते हैं। अवतारदेह और जीवदेहका पार्थक्य कहा जाता है कि 'भगवान् एक विशेष मानस भौतिक देहकी सृष्टि करते हैं और आत्मरूपसे इसमें प्रवेश करते हैं। जब सभी मानस भौतिक देह भगवान्की ही सृष्टि है, तब फिर इस कथनका क्या अर्थ है कि अवतार-देह एक विशेषरूपसे सृष्ट देह