भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै ? क्या यह अपर देह जिस नियम और पद्धतिसे उत्पादित होते हैं, उसके अनुसार उत्पन्न नहीं हुआ ? यह क्या विशेष काल और देशमें माता-पिताजनित व्यावहारिक देह नहीं है ? यह क्या अपर देहके समान वृद्ध होकर तथा नाना विकारको प्राप्त होकर मृत्युग्रस्त नहीं होता ? फिर कैसे हमलोग अवतारदेह और किसी अपर जीवित देहमें कोई भेद कर सकते हैं?' इसका उत्तर यह दिया जाता है कि अवतारदेहमें जितने विशेष लक्षण रहते हैं, उतने अपर किसी साधारण रीतिसे उत्पन्न जीवित देहमें नहीं पाये जाते। कदाचित् यह सत्य हो, किंतु फिर भी यह सिद्धान्त नहीं किया जा सकता कि ऐसा विशेषलक्षणयुक्त देह, पूर्ण भगवदात्माद्वारा अधिष्ठित होनेके उद्देश्यसे विशेषरूपसे सृष्ट हुआ है। इस वैचित्र्यमय विश्व जगत्में विशेष- लक्षणसहित असंख्य प्रकारके जीवके देह पाये जाते हैं। एक मनुष्यजातिमें ही विभिन्न जातिके पुरुष, विभिन्न प्रकारके भेदसहित स्वस्वजातीय लक्षणयुक्त होते हैं और एक ही जातिके अन्तर्भूत अनेक व्यक्तियोंमें भी परस्पर अत्यन्त भेद पाया जाता है। परंतु यह कथन ठीक नहीं है। भगवान्के शरीरोंमें साधारण शरीरोंसे विशेषता है ही। साधारण शरीर भौतिक होते हैं, परंतु भगवान्का शरीर मायासे (मायोपहितचैतन्यसे) बनता है। जैसे शैत्यके योगसे जल ही घनीभूत हो जाता है, वैसे ही मायाके योगसे निराकार भगवान् साकार होते हैं, किंवा जैसे घृतवर्तिका आदिके योगसे निराकार अग्नि दाहकत्व- प्रकाशकत्वविशिष्ट आकार ग्रहण कर लेता है, वैसे ही अचिन्त्य, अनिर्वाच्य दिव्य शक्तिके योगसे आत्मा सगुणविग्रह धारण कर सकता है। यद्यपि उपर्युक्त दृष्टान्तोंमें कथंचित् परिणाम तथा विकारकी कल्पना की जा सकती है तथापि निर्विकार चेतनमें विकारकी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि वह अनिर्वचनीय मायाके योगसे अविकृत रहकर ही अनेक कार्योंका उत्पादन कर सकता है। जैसे चिन्तामणि, कल्पवृक्ष, कामधेनुको भिन्न-भिन्न अभिलाषकोंको अभिलषित अनेक पदार्थोंके सम्पादनमें विकृत होनेकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही परमात्माको भी प्रपंचोत्पादनमें विकृत होनेकी अपेक्षा नहीं है। अतएव 'सम्पूर्ण रूपसे परिणाम हुआ या एकदेशसे' इत्यादि विकल्प भी निरर्थक ही हैं। 'निराकार साकार नहीं बन सकता' यह शंका भी व्यर्थ ही है। जैसे निर्गन्ध जल गन्धवती पृथ्वीके रूपमें बनता है, जैसे नीरस तेज सरस जल और नीरूप वायु रूपवान् तेजके रूपमें बनता है, वैसे ही निराकार तत्त्व साकाररूपमें और निर्गुण सगुण- रूपमें व्यक्त हो सकता है। जैसे स्पर्शविहीन आकाश स्पर्शवान् वायुके रूपमें प्रकट होकर भी अपने आकाशरूपमें बना रहता है, वैसे ही अनेक रूपोंमें प्रकट होकर भी परमात्मा अपने निर्गुण-निराकार रूपमें बना ही रहता है। अनेक रूपमें प्रकट होकर भी परमात्मा अपने निर्गुण-निराकार रूपमें बना ही रहता है, इसीलिये भगवान् क्रीड़ाके लिये अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे दिव्य देहका निर्माण करते हैं। वह देह सोपाधिक चेतनका कार्य होनेपर भी प्राकृतिक कार्योंसे विलक्षण होता है। जैसे सूर्य मेघसे आवृत हो जाता है, परंतु नेत्र और सूर्यके मध्यमें दूरवीक्षण यन्त्र होनेसे वह उसका आवरण नहीं होता, वैसे ही तामसी या अविशुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृतिसे चैतन्य आवृत हो जाता है, परंतु विशुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृति, माया या दिव्य शक्तिसे निरावरण ही रहता है। अतः तामस, राजस देहोंकी अपेक्षा विशुद्ध सत्त्वमय शरीरोंमें विशेषता रहती ही है। इस दृष्टिसे देहवान् होकर भी भगवान् भगवान् ही रहते हैं। अतएव वे जगदतीत हैं ही। जब अनित्य दिव्य लीलाक्तिके योगसे भगवान्का अवतार बन सकता है, तब उनके द्वारा वेदोंका उच्चारण हो सकता है और इसीलिये शास्त्रप्रमाणसे कलावतार, अंशावतारकी भी