भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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उपपत्ति हो जाती है। जो क्रिया-ज्ञान-शक्तियाँ साधारण जीवोंमें सम्भव नहीं, उनकी स्थिति जहाँ-कहीं देखी जाती हो और साथ ही आर्ष ग्रन्थोंमें जिसका प्रमाण हो, वहीं अवतारका व्यवहार होता है। कहा जाता है कि 'ईश्वरका शरीर-धारण सम्भावित न हो सकनेसे ईश्वरने शरीर धारणकर वेदकी रचना की है, सो भी मान्य नहीं हो सकता। वेद निराकार ईश्वररचित है, इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है। अतएव वैदिक सम्प्रदायोंका यह सिद्धान्त कि वेद ईश्वररचित हैं, केवल कल्पनामात्र है। निराकार भगवान् किसी व्यक्तिविशेषको शास्त्ररचना करनेमें प्रेरणा करते हैं, यह पक्ष भी विचार-सह नहीं है; क्योंकि इस पक्षका निर्णय हमलोगोंको अनुमानके द्वारा करना पड़ेगा और अनुमान, हेतु और साध्यका नियत-साहचर्य दर्शन-मूलक होता है, अतएव वह (अनुमान) दृष्ट साधर्म्यकी अवश्य अपेक्षा करेगा। सुतरां ज्ञात पदार्थका विधर्मी या विरोधी किसी पदार्थका अस्तित्व अनुमानद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता, अतएव दृष्टान्तकी सहायताके बिना अनुमान किसी अतीन्द्रिय पदार्थको प्रमाणित नहीं कर सकता। प्रकृत स्थलमें निराकार ईश्वर किसीको प्रेरणा करता है, यह प्रमाणित करनेके लिये हमलोगोंको अपने साधारण अनुभवकी सीमाके भीतर अनुभूत किसी दृष्टान्तका निर्देश करना आवश्यक है, जहाँ निराकार पुरुष किसी अन्य पुरुष-विशेषको प्रेरणा करता हो, परंतु ऐसा कोई दृष्टान्त पाया नहीं जाता। सुतरां, निराकार भगवान् किसीको शास्त्रकी रचनामें प्रेरणा करता या शिक्षा देता या शिक्षा देनेके लिये कहीं किसीको भेजता है, यह विचार- विहीन स्वकपोलकल्पना है। ईश्वरका शरीरधारण सम्भव न होनेसे यह स्वयं शरीर धारणकर स्वयं शिक्षा नहीं दे सकता।' इस उपर्युक्त कथनमें भी कोई सार नहीं है; क्योंकि वैदिकोंके मतोंमें निराकार अन्तर्यामी ही सभी भावोंका प्रेरक है। जब साकार देहका भी प्रेरक निराकार ही है, तब केवल साकारमें प्रेरकता कहाँसे आयेगी? जिस तरह श्रवण-दर्शनादि क्रियाद्वारा अतीन्द्रिय इन्द्रियोंका अनुमान होता है तथा जगत्‌का कर्ता सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्‌रूपसे अदृष्ट होनेपर भी अनुमेय होता है, वैसे ही निराकारमें प्रेरकता भी सिद्ध है। निराकार ही मन-देहादिका प्रेरक है। निराकार इच्छाकी भी प्रवर्तकता सिद्ध है, अतः ईश्वरकी प्रेरणासे वेदादिकोंका भान होनेमें भी कोई अनुपपत्ति नहीं है। ऋषियोंसे भी मन्त्रोंका दर्शन हो सकता है। यद्यपि साधारण जीवोंमें विशिष्टज्ञान सम्भव नहीं है तथापि तपस्या और उपासनाओं एवं योगोंकी महिमासे रज और तमका प्रभाव मिट जानेसे स्वभावसे ही सर्वार्थावभासनशाली चित्तमें मन्त्रोंका दर्शन हो सकता है। जैसे दूरवीक्षण, अणुवीक्षण आदि यन्त्रोंकी सहायतासे दूरस्थ और सूक्ष्मतत्त्वोंका ग्रहण हो सकता है, किंवा रेडियोके द्वारा दूर-से-दूरके शब्दोंका ग्रहण बन सकता है, वैसे ही योगकी महिमासे किसी रूपमें, कहीं भी विद्यमान शब्दोंका ग्रहण किया जा सकता है। भावनाकी महिमासे मनमें विशिष्ट शक्तिका आविर्भाव होता है। सामान्य मन-इन्द्रियोंकी सहायतासे ही बाह्य अर्थका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ईश्वरको इन्द्रिय बिना ही बाह्य-अभ्यन्तर, सभी अर्थ प्रकाशित होते हैं, वैसे ही भावना और एकाग्रताकी सहायतासे मनको विशिष्ट ज्ञानमें सामर्थ्य प्राप्त होता है। फिर ऋषियोंको तो 'सुप्तप्रतिबुद्धन्याय' से पूर्वजन्मके अधीत मन्त्रोंका भी दर्शन हो सकता है। इन सब दृष्टियोंसे विचार करनेपर विदित होगा कि निर्गुण, निराकार परमेश्वर सगुण, साकार राम- कृष्ण आदिके रूपमें अवतार-ग्रहण करते हैं और अधर्माभ्युत्थान मिटाकर सन्मार्गस्थ सत्पुरुषोंका रक्षण करते हुए वेदशास्त्रोक्त धर्मका संस्थापन करते हैं।